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महसूस करना कितना सुखद

meriabhivyaktiya

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बारिश से धुली-धुली सुबह, ठंडी हवाओं के झोंकें,चाय का कप,मन मे उठते गिरते कितने ख़्याल,,,,और क्या चाहिए एक सुबह को सुहानी होने के लिए।
हाथों मे नोटपैड और तेज़ी से टाइप करती अंगुलियां,,मन मे उठते हर ख़्याल को लपक कर टाइप करती हुईं,,एक पल की भी देरी हुई तो ख़्यालों की चिड़िया एक डाल से दूसरी पर फुदक जाएगी।
कोई विषय नही है आज,,कोई रूपरेखा नही निर्धारित,,,आज सब आवारा है,,मेरे मन की तरह,,। मौसम के मिजाज़ से तबीयत तर है या कोई और कारण हो भी तो मुझे खुद नही पता,,। कभी-कभी बिन बात के ही सब कुछ रोमानी लगता है,,जैसे जगजीत सिंह जी की प्रेम-गज़ल सुनकर ,, मन तड़प उठता है,, पल मे लगने लगता है हर पंक्ति मेरे लिए है,,भले ही ‘प्रेम’ का ‘ प’ भी जीवन मे प्रवेश ना पाया हो।
एक ठंडी हवा का नर्म झोंका टकराया मेरे गालों से,,,,, उँगलियां जगजीत सिंह की गज़ल का विवरण छोड़,,इस झोंके के एहसास पर लपक पड़ी,,कहीं ओझल ना हो जाए। महसूस करना भी कितना सुखद होता है,,,!!! दो विपरीत परिस्थितियों मे रहना और उसको महसूस करना,,,कमरे मे थोड़ी गरमी है,,,और बाहर से आई ठंडी हवा का झोंका जो गालों से टकराया,,, सुखद लगा,,महसूस हुआ,,और लिख गया।
बारिश फिर से होने लगी,,आज कुदरत रिझाने पर अमादा है,,।जैसे कोई सुन्दर कामिनी,,आंचल मे छुपाए हो दामिनी,हवा के झोंके से जो लहरा जाए आंचल फट पड़े बादल गरज उठे मौसम जामुनी,,,,,। बारिश क्यों रिझाती है??? बिजली के तारों पर बूँदों की वो लड़ियां,,,,!!!! कैसी पंक्तिबद्ध,,,जैसे मुक्ता की माला,,उस पर से सावन जैसे मधुशाला मे हाला,,,!
गाती भी हैं बूँदें और थिरकती भी हैं,, सुर मे आरोह भी है और अवरोह भी,,लयबद्धता है ,,,,महसूस करना कितना सुखद होता है,,,,,,,! मेरे साथ कर के देखिए। रफ्तार पकड़ती हैं एक साथ कितनी कितनी जलधार ,,सीधी बादलों के अन्तर से निकलती हुई,,तेज़ कभी मद्धम्,,,। क्या बादल रोते हैं,,,? कितने जलकुन्ड और समन्दरों का जल धूप की तपिश मे वाष्पित होकर मेघ बने होंगें,,,!!! कितना लम्बा सफर तय कर ये मेघ पर्वतों से टकराए होंगें,, फिर से मेरे शहर तक आए होंगें,,,,,!! महसूस करना कितना सुखद,,,,,,,,,,,। रोते हैं क्या ,,,? पर क्यों रोते हैं? ये मिलन की सुखद अनुभूति का क्रन्दन है क्या? जल बिन्दुओं का धरती से पुनः मिलन की सुखद अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है क्या,,,? पर शायद सभी जल बूँदें भाग्यशाली नहीं। कुछ परम विषाद में हाऊँ-हाऊँ कर के रोती हैं,,। तभी कभी-कभी मुझे तेज़ बारिश मे दर्द की अनुभूति होती है।
भाग्यशाली नही होतीं???? ऐसा क्यों आया मन में,,?? लगता है मेरा प्रश्न इनके दिल को छू गया,,फिर से एक सौम्य झोंका मेरे चेहरे को छू गया,,। जैसे कह रहा हो,,, बोलो ना क्यों भाग्यशाली नही मैं,,? वो चाहती हैं मुझसे सुनना,,जैसे कुछ बातें हम स्वयं नही कहना चाहते ,पर यह भी चाहते हैं कि सब समझ जाएं,और उसे हमसे ही कहें। आज बूँदें मुझसे कहलवाना चाहती हैं। तो सुन ओ बारिश की बूँदों-” तुम रोती हो परम विषाद में हाऊँ-हाऊँ करके,, और तुम भी अपने आंसुओं को बारिश मे छुपाने की कोशिश करती हो,, थिरकते हुए एक लयबद्ध सुर मे धरती पर गिरती हो। अपने क्रन्दन स्वर को छुपाने के लिए। पर मुझे सुनाई देता है तुम्हारा रोना। तुम अपने भाग्य पर रोती हो,, ना जाने किस जलराशि का अंश हो और किस सूखी धरा पर बरस पड़ी हो,,नियति के नियम से बंधी हो। जहाँ से तुम्हारा उद्गम है वहाँ तुम्हारा मिलन नही। जिसका अंश हो उससे बिछड़ चुकी हो,,कहीं और बरस चुकी हो,,। जहाँ तुम्हारी आवश्यकता है तुमने खुद को समर्पित कर दिया है,,तुम कर्तव्य पथ पर हो। यही तुम्हारा कर्म है नियति लिखित।”
देखो बंद हो गई बारिश उसके मन की अनकही लिख दी ना मैने,, आंसू रूक गए उसके। अंतर शान्त हो गया उसका। महसूस करना भी कितना सुखद ,,,,,,,!
अब और नही बरसेगी शायद ,पंक्षियों की चहचहाहट शुरू हो गई है,,।हवाओं ने बिजली के तारों पर सजी पंक्तिबद्ध बूदों की लड़ियों को गिरा दिया है। हल्की हल्की सुबुकने की आवाज़े आ रही हैं रुक-रुक कर,,मकानों के छज्जों पर रुके हुए पानी की कुछ बूँदे टपक रही हैं ,अभी भी।
विषय सोचा नही था,,आज सब आवारा था ,मतवाला था। बारिश तब नही थी जब लिखना शुरू किया, पर मेरे मन के साथ वह भी बरस पड़ी,,उसको आज अपने मन की मुझसे कहलवानी थी शायद। अब देखो फिर से बंद हो गई। संतुष्टी की महक है हवा के झोंकों मे,,,,,। महक,,,,,,भी आने लगी मुझे हा-हा-हा-हा,,,,,,! महसूस करना कितना सुखद होता हैं,,,,,, है ना!

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