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कॉर्पोरेट (व्‍यंग्‍य)

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कॉर्पोरेट जगत में गधे ज्यादा होते हैं ओर घोड़े कम। फिर भी घोड़ों को गधों के बराबर माना जाता है या उनको जबरदस्ती गधों वाला काम करने पर मजबूर किया जाता है। कुछ गधे अपने आप को घोड़ा साबित करने के लिए कुत्ते बन जाते हैं। घोड़े जानते हैं कि वो गधे ही हैं पर मालिक समझता है कि वो वफादार कुत्ते हैं जबकि वो सिर्फ चाटने वाले कुत्ते होते हैं। ऐसे कुत्ते वाकई किसी के वफादार नहीं होते, जहां बोटी दिखी वहीं मुंह मार लेते हैं। मालिक की नासमझी ओर कुत्तों की वफ़ादारी साबित करने की कला के कारण घोड़े को कमतर समझा जाता है। नासमझ मालिक की नज़र में सब जानवर हैं और उसे लगता है की गधे भी घोडों के बराबर ही काबिल हैं।
मालिक को ये समझना चाहिए कि गधों को चने खिलाने से वो घोड़े नहीं बन जाते। अगर बन जाते है तो एक बार काम का बोझ डालकर लीजिये।  कमर लचक जाएगी गधों की, जबकि घोड़े आखिर तक डटे रहते हैं और काम को करके ही दम लेते हैं। जहां घोड़े अपनी बुद्धिमानी और साहस के लिए जाने जाते हैं, वहीं गधे अपनी मूर्खता और कामचोरी के लिए। मालिक को समझना चाहिए की घोड़े की सवारी आपकी शान समझी जाएगी वहींं, गधे की सवारी आपकी जगहंसाई करवाएगी। गधे को खरीदकर कभी भी घोड़े के दाम पर नहीं बेचा जा सकता।
किसी शादी या जंग में गधों को ले जाइये फिर देखिये क्या हाल होता है। कमाल इस बात का है की मालिकों ने घोड़ों की गुणवत्ता परखने के लिए गधों को उन पर नजर रखने के लिए रख छोड़ा है। इस काम को बखूबी निभाते हुये कुछ गधे घोड़ों से भी बड़ा मुकाम हासिल कर चुके हैं। मालिक आज भी जानता है कि वो गधा ही है मगर घोड़ों को हताश करने और अपने काम को बेहतर बनाये रखने और खुद को गधों से बेहतर साबित करने में व्यस्त रखने को ही संघीय राजनीती (कॉर्पोरेट पॉलिटिक्स या ऑफिस पॉलिटिक्स ) कहते हैं। घोड़े को खुद को घोड़ा साबित करने से रोकना ही उनकी सच्ची कारीगरी है।
डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्‍य की पुष्टि नहीं करता है।

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