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महिलाओं के लिए परिवार नहीं सफल कॅरियर है महत्वपूर्ण !!

career oriented womenअब तक महिलाओं के विषय में यह माना जाता रहा है कि वह स्वभाव की बेहद भावुक और अपने संबंधों के प्रति संजीदा प्रवृत्ति की होती हैं. वह हमेशा अपनी इच्छाओं को पूरा करने से पहले अपने परिवार की जरूरतों के बारे में सोचती हैं. लेकिन आधुनिक दौर की महिलाएं अपनी इस पारंपरिक छवि को दरकिनार करते हुए, परिवार से कहीं ज्यादा खुद पर और अपने कॅरियर पर केन्द्रित होती जा रही हैं.


ऑस्ट्रेलिया में हुए एक नए सर्वेक्षण के अनुसार यह बात सामने आई है कि महिलाएं अब किसी भी ऐसे संबंध में नहीं बंधना चाहतीं जो उनकी आजादी या उनकी व्यावसायिक प्रगति को बाधित करे. विशेषकर 30-40 वर्ष की महिलाएं जो स्वभाव से व्यावहारिक और अपने कॅरियर को ही प्राथमिकता देती हैं, वह अपने वैवाहिक संबंध को तोड़ने से भी नहीं हिचकतीं. उन्हें अगर ऐसा प्रतीत होता है कि विवाह के पश्चात वह पारिवारिक उत्तरदायित्वों से पूरी तरह घिर चुकी हैं, उनके पास अपने लिए और अपने कॅरियर को सही दिशा देने के लिए समय ही नहीं बचा है तो वह किसी भी तरह उससे बाहर निकलना चाहती हैं.


इस शोध में ऐसी कई विदेशी हस्तियों को शामिल किया गया, जो अकेली रह कर भी खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही हैं, इतना ही नहीं उन्हें कभी भी किसी प्रकार की कमी महसूस नहीं होती. एक विदेशी टेलीविजन शो की मेजबानी करने वाली अदाकारा, जिसने कॅरियर की खातिर अपने पति से तलाक ले लिया था, का कहना है कि उनकी 2 बेटियां हैं, उनकी जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ वह अपने टेलीविजन कॅरियर का भी भरपूर आनंद उठा रही हैं क्योंकि उनके ऊपर रोक-टोक करने वाला कोई नहीं है. वह कहीं भी आने-जाने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं. वह अपने जीवन को ऐसे ही जीना चाहती थीं. इसके अलावा उनका यह भी कहना है कि आज के दौर में अकेला रहना दुखदायी नहीं है, बल्कि ऐसी परिस्थितियां महिलाओं को और अधिक सशक्त बनाने का काम करती हैं और साथ ही वह स्वयं के लिए निर्धारित की गई अपेक्षाओं पर भी खरी उतर सकती हैं.


लेकिन अपने कॅरियर के आगे अपने पारिवारिक और व्यक्तिगत जीवन का त्याग करने वाली सभी महिलाएं खुशहाल परिस्थितियों में जी रही हों, ऐसा जरूरी नहीं हैं.


एक अन्य अविवाहित महिला ‘जोडी’, जो जल्द ही अपने जीवन के 40 साल पूरे करने वाली हैं, का कहना है कि कभी-कभी उसे ऐसा लगता है कि इस उम्र तक उसका अपना परिवार होना चाहिए था, लेकिन आप कैसा जीवन व्यतीत करोगे, यह आपकी परिस्थितियां निर्धारित करती हैं ना कि आप. इसीलिए वह एक अच्छे जीवन-साथी के आने और अपने परिवार के बसने की उम्मीद को ना छोड़ते हुए अपने कॅरियर पर ध्यान देती हैं. उनका यह भी कहना है कि वह जो उनके पास नही है, वह उसकी कमी को अपने ऊपर हावी नहीं होने देती, क्योंकि वह ऐसे किसी भी व्यक्ति के साथ संबंध नहीं रखना चाहतीं जिसके लिए उन्हें खुद को बदलना पड़े. जोडी का अपना व्ययसाय है और वह आर्थिक और सामाजिक तौर पर स्वतंत्र हैं और हमेशा रहना चाहती हैं.


सामाजिक हालातों और प्रचलन के विश्लेषक डेविड चल्के का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो वर्ष 2020 तक ऑस्ट्रेलिया में ऐसे लोगों की संख्या अपेक्षाकृत काफी ज्यादा हो जाएगी जो अपना जीवन अकेले व्यतीत कर रहे हैं.


भले ही इस शोध के परिणामों और महिलाओं की अत्याधुनिक मानसिकता का भारत के हालातों से सीधा संबंध ना हो लेकिन हम इस बात को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते कि जैसे-जैसे भारतीय महिलाएं आत्मनिर्भर होती जा रही हैं, उनकी प्राथमिकताएं बहुत हद तक बदलती जा रही हैं. वह अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन होती देखी जा सकती हैं. यहां तक कि वह अपने बच्चों को भी अपना समय देना जरूरी नहीं समझतीं. हालांकि भारत में गृहणियों की संख्या आज भी कार्यशील महिलाओं से कहीं अधिक है. लेकिन भविष्य में संभवत: ऐसे हालात उलट सकते हैं. प्रतिस्पर्धा प्रधान इस युग में महिलाएं भी पुरुषों के समान अपनी अलग पहचान और स्वतंत्रता के लिए लालायित होने लगी हैं. हमारी युवा पीढ़ी जिसे देश के भविष्य की संज्ञा दी जाती हैं, उसमें तो यह स्वभाव अपेक्षाकृत बहुत अधिक देखा जा सकता है.


उपरोक्त चर्चा के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय समाज जो हमेशा से ही विदेशों में व्याप्त प्रचलनों और उनकी जीवन शैली की नकल करता आया है, निःसंदेह वह उनकी संकीर्ण मानसिकता को भी ग्रहण करने की लालसा रखेगा. लेकिन भारतीय परिवारों विशेषकर महिलाओं के विषय में एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि विदेशों की अपेक्षा भारतीय महिलाएं स्वभाव से अधिक भावुक और समर्पित होती हैं. उन्हें संस्कार के रूप में हमेशा यह सिखाया जाता है कि अपनी खुशियों से कहीं ज्यादा महत्व परिवार को देना चाहिए. ऐसी सीख लिए जब वह विवाह बंधन में बंधती हैं, तो उनके लिए केवल अपने कॅरियर को सही दिशा देने के लिए अपने पति और बच्चों की जिम्मेदारियों को नकारना असंभव हो जाता है. हालांकि यहां भी कई ऐसी महिलाएं देखी जा सकती हैं, जो अपने कॅरियर के आगे किसी को महत्व नहीं देतीं. इसीलिए इस शोध के नतीजों को सभी के ऊपर समान रूप से लागू करना व्यवहारिक नहीं है क्योंकि व्यक्तियों के स्वभाव और उनकी प्राथमिकताएं कभी एक समान नहीं रह सकतीं.


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