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लाखों खर्च करती हैं महिलाएं अपने मेक-अप पर!!

make-upमहिलाएं हमेशा से ही अपनी सुंदरता को लेकर जागरुक रही हैं. हालांकि पहले वे सिर्फ अपने परिवार की खातिरदारी में ही अपना अधिकांश व्यतीत करती थीं, जिसके कारण वह स्वयं पर ध्यान नहीं दे पाती थीं. लेकिन उस समय भी सजने-संवरने की प्रवृत्ति उनमें प्रबल रूप से विद्यमान रहती थी. लेकिन वर्तमान परिदृश्य इसके बिल्कुल उलट है. आज तो महिलाएं घर के बाहर काम करने जाती हैं, बहुत सारे लोगों से मिलती हैं तो ऐसे में उनके सुंदर और आकर्षक दिखने की उनकी चाह और अधिक हिलोरे लेने लगती है. जिसके परिणामस्वरूप वह अधिकांश खर्च मेक-अप के विभिन्न उत्पादों पर करके खुद को संतुष्ट महसूस करती हैं. सुंदर दिखने की चाह उनमें इस कदर प्रबल हो चुकी है कि बिना मेक-अप किए वह घर से बाहर निकलना सोच भी नहीं सकतीं.


वैसे तो हम सभी जानते हैं कि महिलाओं और श्रृंगारिक साजो-सामान का चोली दामन का साथ होता है, लेकिन हाल ही में हुआ एक शोध इस कथन को तथ्यात्मक ढंग से पेश करने में बहुत सहायक हो सकता है.


ब्रिटेन में हुए इस सर्वेक्षण की मानें तो महिलाएं अपने जीवन काल में औसतन 86 लाख रूपए खर्च करती हैं. शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि एक वयस्क महिला हर साल डेढ़ लाख रूपए और हफ्ते भर में लगभग 30,00 रूपए अपने मेक-अप पर खर्च कर देती है. इतना ही नहीं, महिलाएं अपने मेक-अप के प्रति इतनी अधिक सचेत और सुंदर दिखने के लिए इतनी अधिक गंभीर रहती हैं कि बिना तैयार हुए, सजे-संवरे वह अपने साथी के साथ बाहर जाना भी मंजूर नहीं करतीं. उनके मेक-अप में कितने और क्या-क्या समान रहते होंगे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी मेक-अप कलेक्शन में 54 सामग्रियां शामिल होती हैं.


हालांकि यह अध्ययन विदेशी संस्थान द्वारा और विदेशी महिलाओं पर ही कराया गया है, इसीलिए इसे ठीक ऐसे ही भारतीय परिदृश्य के साथ जोड़कर देख लेना सही नहीं कहा जा सकता. भारत के संदर्भ में बात की जाए तो, भारतीय महिलाएं समान रूप से अपने सौंदर्य को लेकर सचेत रहती हैं और आकर्षक दिखने के लिए काफी मेहनत भी करती हैं, लेकिन शायद ही किसी भारतीय परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी सशक्त होगी कि 86 लाख रूपए अतिरिक्त व्यय के तौर पर खर्च कर सके.


भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी सुदृढ़ नहीं है कि यहां के नागरिक इस कदर धन का अपव्यय करें. प्रगतिशील राष्ट्र होने के कारण, पाश्चात्य देशों की तुलना में भारत की प्रति-व्यक्ति आय बहुत कम है. इसीलिए केवल सजने-संवरने पर ही धन व्यय करना किसी समझदार महिला की पहचान नहीं हो सकती. भारतीय महिलाओं के विषय में यह माना जाता है कि वह खुद से पहले अपने परिवार के बारे में सोचती हैं. ऐसे में वो कभी भी अपनी परिवार और बच्चों की जरूरतों को ताक पर रखते हुए ऐसे फिजूल खर्चों को अंजाम नहीं दे सकतीं.


वैसे भी अर्थव्यस्थाएं चाहे किसी भी देश की क्यों ना हों, वैश्वीकरण के बाद सभी एक-दूसरे के साथ जुड़ गई हैं. ऐसे में अगर किसी एक देश के नागरिक धन का अनुचित व्यय करते हैं, तो निःसंदेह उसके दूरगामी परिणाम सभी को भुगतने पड़ सकते हैं.



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