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प्यार पर नहीं आपसी समझ पर आधारित होते हैं वैवाहिक संबंध

married coupleकिस्से कहानियों और फिल्मों में तो आपने कई बार सपनों के शहजादों का वास्तविक जीवन में आगमन देखा होगा. बचपन में दादी-नानी ने भी अपनी परी कथाओं में कई बार सपनों के राजकुमार का जिक्र जरूर किया होगा, जिसके आने से सारी परेशानियां और रुकावटें स्वत: ही दूर हो जाती हैं. जिसके परिणामस्वरूप जीवन में सिर्फ खुशहाली और संपन्नता का ही वास रहता है.


लेकिन क्या सपनों की दुनियां में रहने वाले शहजादों का वास्तविक जीवन में भी कोई औचित्य और महत्व है या फिर यह मात्र एक निरर्थक परिकल्पना ही है?


आमतौर पर यह देखा जाता है कि महिलाओं को फिल्मी प्रेम-कहानियां और सपनों के राजकुमार से जुड़े किस्से बहुत अधिक रोचक और दिलचस्प लगते हैं. लेकिन एक हकीकत यह भी है कि वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए वे महिलाएं जो युवावस्था में अपने सपनों के राजकुमार के आने का इंतजार करती हैं उम्र के एक परिपक्व पड़ाव पर पहुंचने के बाद यह भली-भांति समझ जाती हैं कि हकीकत और सपनों की दुनियां में बहुत बड़ा अंतर होता है. वह ऐसे किस्से कहानियों को सिर्फ मन बहलाने का ही एक जरिया मानने लगती हैं.


मनोचिकित्सकों का मानना है कि जो महिलाएं ऐसे किस्सों के वास्तविकता में तब्दील होने का इंतजार करती हैं वह अकसर अपने मिस्टर राइट के ही कारण खुद को मानसिक प्रताड़ित महसूस करती हैं. प्रेम-विवाह में अत्याधिक रुचि और विश्वास रखने वाली महिलाओं को जब अपने परी कथाओं सरीखा तथाकथित राजकुमार मिल जाता है तो वह हर हाल में उसे ही अपना जीवन साथी बनाना चाहती हैं. उसके लिए चाहे फिर उन्हें अपने परिवार वालों की नाराजगी और क्रोध का ही सामना क्यों ना करना पड़े, वह उस राजकुमार को छोड़ना वहन नहीं कर सकतीं. लेकिन जब समय गुजर जाने के बाद आपसी प्यार फीका पड़ने लगता है तब उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है और वह इस बात का पछतावा करने लगती हैं कि उन्होंने विवाह करने के लिए अपने ही परिवार का दिल दुखाया था.


मैरिज काउंसलर डॉक्टर गीतांजली शर्मा का कहना है कि प्रेम विवाह की शुरुआत बड़े-बड़े वायदों और दुनियाभर की कसमों के साथ होती है. लेकिन विवाह के कुछ समय बाद जब पति-पत्नी एक दूसरे की कमियों को जानने लगते हैं तो उन्हें यह महसूस होने लगता है कि शायद उन्होंने विवाह का निर्णय लेने में थोड़ी जल्दबाजी की है. परिवारवालों की मर्जी के खिलाफ संबंध जोड़ा है तो अपनी कोई भी तकलीफ उन्हें बता भी नहीं सकते. ऐसे हालातों में उन्हें अपने बीच का प्यार बेमतलब नजर आने लगता है और उनके सारे सपने टूटने लगते हैं.

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ऐसा नहीं है कि ऐसे जटिल हालात सिर्फ प्रेम-विवाह में ही मौजूद रहते हैं. भारतीय समाज में पारंपरिक विवाह का महत्व कहीं अधिक है. लेकिन पारंपरिक विवाह संस्कार इतने अधिक जटिल हैं कि शादी से पूर्व युवक-युवती को मिलने की अनुमति तक नहीं मिलती. ऐसे में संभवत: वे दोनों एक-दूसरे को जान-समझ नहीं पाते और विवाह के बाद उन्हें इस बात का अहसास होने लगता है कि उन दोनों के स्वभाव में कोई संतुलन नहीं हैं. वह प्रेम जैसी भावनाओं को महत्व देते हुए आपसी समझ को विकसित करना भूल जाते हैं. परिणामस्वरूप वे एक-दूसरे के साथ सहज नहीं महसूस करते और संबंध को बोझ समझने लगते हैं.


उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सपनों के राजकुमार के आने के इंतजार में अपने जीवन को दयनीय बनाने से कहीं बेहतर है कि अपने पति के साथ आपसी समझ बढ़ाने और उसका सम्मान करने जैसी प्रवृत्ति को अपनाया जाए. क्योंकि पति-पत्नी के रिश्ते में प्यार से कहीं ज्यादा अहम है एक-दूसरे को समझना और एक-दूसरे के गुण-दोषों को स्वीकारना. कमियां हम सभी में होती हैं, उन्हें नजरंदाज ना भी कर पाएं लेकिन सिर्फ उन्हीं पर ध्यान केंद्रित करने से भी रिश्तों में कड़वाहट पैदा होने लगती है. इसीलिए वैवाहिक जीवन को सफल और स्थिर बनाए रखने के लिए आपसी भावनाओं को विकसित करना एक-दूसरे के साथ अपने संबंध को स्वीकारना बहुत जरूरी है. गुण और दोष हम सभी में होते हैं. जरूरत है बस कमियों को ढक कर खूबियों को पहचानने की.

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