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अपनों के साथ में ही निहित है आपकी वास्तविक खुशी

familyअगर आप भी ऐसा सोचते हैं कि केवल यौनाकर्षण (Sexual Attraction)  ही किसी प्रेम-संबंध (Love -Relation) की नींव होता है और एक-दूसरे के प्रति समर्पण (Commitment) और आपसी भावनाएं कोई मायने नहीं रखतीं, तो हाल ही में हुआ एक शोध (Research) आपकी इस धारणा को बदलने में काफी हद तक सहायक हो सकता है.



यूनिवर्सिटी ऑफ बास्क कंट्री (University of Basque Country)  द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में यह साबित हुआ है कि जिन प्रेम प्रसंगों में लोग आपसी प्रतिबद्धता (Commitment) को लेकर आश्वस्त नहीं होते या फिर समय की कमी के कारण एक-दूसरे को पर्याप्त समय नहीं दे पाते, ऐसे संबंधों में शारिरिक आकर्षण भी अपनी अहमियत खो देता है. इसके उलट ऐसे हालात रिश्तों में खटास ही पैदा करते हैं. एक और महत्वपूर्ण बात जो सामने आती है वो यह कि संबंध के उस पड़ाव पर, जब लोग रिश्ते की गंभीरता को कम आंकने लगते हैं, या फिर एक-दूसरे की भावनाओं को अपेक्षित महत्व देना समाप्त कर देते हैं, तब उनके लिए अपने संबंध का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता, वह सिर्फ उसे मात्र एक औपचारिकता (Formality) ही समझने लगते हैं.


शोधकर्ताओं (Researchers) ने पाया कि वैवाहिक संबंधों में जब भावनात्मक लगाव (Emotional Attachment) कम होने लगता है या एक-दूसरे का साथ औपचारिक हो जाता है, ऐसे समय में दंपत्ति के सामने केवल दो विकल्प ही रह जाते हैं, या तो आपसी सहमति से संबंध विच्छेद कर लें और दूसरा वह सामाजिक बंधनों (Social Bondage) और कुछ पारिवारिक मजबूरियों के चलते एक दूसरे से अलग नहीं हो पाते तथा जड़ हो चुके अपने रिश्ते के बोझ को उठाने के लिए बाध्य हो जाते हैं.


भारत (India) के संदर्भ में अगर इस शोध को देखा जाए तो वह संभवत: आर्थिक तौर पर वह पाश्चात्य देशों (Western Countries), जहां पूरी तरह से भौतिकवाद हावी हो चुका हैं और आपसी रिश्तों का कोई खास महत्व नहीं रह गया, से पीछे है. आज भी हमारा समाज भावनाओं और प्रेम (Love) के एक बहुत मजबूत धरातल पर खड़ा है. यहॉ रिश्तों की अहमियत को कम नहीं आंका जा सकता. भारत पर तथाकथित रूप से एक रूढ़िवादी(Orthodox), कट्टर राष्ट्र होने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जबसे वैश्वीकरण (Globalisation) और उदारीकरण (Liberalisation) जैसी नीतियों का आगमन हुआ है, आधुनिकता की ओर इसका झुकाव बढ़ा है. मूल रूप से इसे भारत को एक ग्रहणशील राष्ट्र माना गया है, जो जल्द ही बाहरी चीज़ों से प्रभावित होकर उसे अपना लेता है. एक हद तक तो इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि हमारे समाज में आ रहे मूल्यों (Values) की गिरावट इसी ग्रहणशील प्रवृत्ति का परिणाम है. आपसी रिश्तों के महत्व में दिनोंदिन कमीं आने लगी है. एक-दूसरे के प्रति संजीदगी में आ रही कमी को महसूस किया जा सकता है. अपने व्यक्तिगत हितों की पूर्ति के लिए अन्य लोगों की भावनाओं को आहत करना अब आम हो गया है.


समय तेजी से बदल रहा है और अगर हम भी रूढ़ियों के बंधनों को तोड़ प्रगति (Development) कर रहे हैं तो इसमे कोई हर्ज नहीं है. लेकिन पाश्चात्य देशों की देखा-देखी अगर हम भी केवल अपनी खुशी और खोखले अहम के लिए अपने रिश्तों की मजबूती को कमजोर कर देते हैं तो सफलता का भी कोई महत्व नहीं रह जाएगा. हमें यह समझना होगा कि वास्तविक खुशी किसी वस्तु या भौतिक पदार्थ (Materialistic substance) में नहीं बल्कि अपनों के साथ में हैं.


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