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जानें जरूरत और शौक के बीच का अंतर

mall culture मनुष्य की इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती. प्रकृति ने उसे बनाया ही ऐसा है कि वह कभी अपनी सम्पत्ति (Property) को लेकर संतुष्ट नहीं रहता. एक समय था जब मनुष्य जीवन केवल मूलभूत आवश्यकताओं (Basic Needs) की पूर्ति करने में ही बीत जाता था. लेकिन जबसे उदारीकरण (Liberalisation) और वैश्वीकरण (Globalisation) जैसी नीतियों का आगमन भारत जैसे प्रगतिशील राष्ट्र में हुआ है, भौतिकवाद जैसी परिस्थितियां भी अपने पैर पसारने लगी हैं. अब व्यक्ति की इच्छाएं केवल रोटी, कपड़ा, मकान तक ही सीमित नहीं रहीं, बल्कि इससे कहीं अधिक महंगी, और बहुमूल्य (Expensive)  हो चुकी हैं.


लेकिन अगर आप यह सोचते हैं कि इच्छाएं केवल पुरुषों की ही विस्तृत हुई हैं, तो हाल ही में हुए एक शोध (Research)  और उसके नतीजे अपको आश्चर्यचकित जरूर कर सकते हैं. क्योंकि इस सर्वेक्षण द्वारा यह बात सामने आई है कि महिलाएं और पुरुष दोनों ही कुछ ऐसी इच्छाएं (Desires) रखते हैं जिसे अत्याधिक महंगी होने के बावजूद वे कभी न कभी पाना जरूर चाहते हैं. परिणामों पर गौर करें तो यह साबित हो जाता है कि  जहां महिलाएं बेशकीमती गहनों और बहुमूल्य कपड़ों की ओर अधिक आकृष्ट होती हैं और अपने घर को भव्य रूप देने के लिए उसकी साज-सज्जा कीमती चीज़ों से ही करना चाहती हैं, वहीं पुरुष महंगी और बेशकीमती गाड़ियों (Expensive Automobiles)  के सपने देखते हैं, इसके अलावा बड़े बजट वाले मोबाइल फोन (Cell Phone)  और विदेश में छुट्टियां मनाना उनकी सूची में शामिल हैं.


एक और महत्वपूर्ण बात जो सामने आई है वो ये कि पुरुष खुद को अधिक प्राथमिकता (Priority) देते हुए दूसरों की भावनाओं को न्यूनतम महत्व देते हैं. वह अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने साथी की अपेक्षाओं को को आहत करने से भी नहीं हिचकिचाते. इसके उलट महिलाएं दिखावे को अधिक महत्व देती हैं, वह केवल अपने मित्रों और सहयोगियों के बीच आकर्षण का केंद्र बनने के लिए फिज़ूल खर्च करती हैं.


यद्यपि यह सर्वेक्षण एक विदेशी एजेंसी द्वारा किया गया है, लेकिन हमारा समाज जो तेज़ी से बाहरी चीज़ों को ग्रहण कर रहा है और तीव्र गति से परिवर्तित हो रहा है, वह ऐसी मानसिकता (Mentality) से अछूता नहीं रह सकता. बड़े बुज़ुर्ग हमेशा कहा करते हैं कि हमें केवल खुद से नीचे लोगों को ही देखना चाहिए ताकि हम यह समझ सकें कि जो हमारे पास है, वह भी पर्याप्त है, जिसके परिणामस्वरूप हम अधिक संतुष्ट रह सकेंगे. लेकिन अब ऐसा मुमकिन नहीं है, क्योंकि अवसरों (Opportunities) की अधिकता ने हमें लालची बना दिया है. हम दूसरों की देखा देखी अपनी इच्छाओं को एक नया आयाम देने लगे हैं. अपने शौक को अपनी जरूरत समझने लगे हैं, भारत जैसा देश जहां आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) में इतनी असमानता है कि अगर एक व्यक्ति आए दिन महंगे होटलों मे खाना खाता है, तो दूसरी ओर ऐसे कई लोग हैं जिन्हें आसानी से दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती.


इसी बात से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर हम आज अपनी इच्छाओं पर काबू नहीं रखेंगे तो आगे चलकर स्थिति कितनी गंभीर हो सकती है. इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी जरूरतों (Needs) और शौक के बीच के अंतर को समझें इसके बाद ही कोई इच्छा रखें.


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