Menu
blogid : 313 postid : 1491

बच्चों को समझने दें उनकी जरूरतों और ख्वाहिशों का मोल!!

father and kidआमतौर यह माना जाता है कि बच्चों की खुशियों का ध्यान रखना और उनकी हर जरूरत को पूरा करना माता-पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य है. वैवाहिक जीवन में बच्चे के आगमन के बाद अभिभावकों की प्राथमिकताएं भी उसी पर केन्द्रित हो जाती हैं. खासतौर पर मां जो पूरा समय अपने बच्चे के साथ ही बिताती है, वह उसके पसंद-नापसंद को समझकर उसी के अनुसार काम करती है.


लेकिन क्या माता-पिता द्वारा बच्चों की हर ख्वाहिश को पूरा करना, उनकी पसंद को सबसे ज्यादा अहमियत देना या उनके प्रति अत्याधिक लाड़-प्यार रखना सही है?


हाल ही में हुए एक शोध पर नजर डालें तो यह बात प्रमाणित हो जाती है कि अभिभावकों का बच्चों के प्रति अत्याधिक लाड़-प्यार ना केवल बच्चों के आत्म-निर्भर बनने में रुकावट बनती है बल्कि उनके वैवाहिक जीवन में भी कई तरह की परेशानियों को पैदा कर सकती है.


कैंब्रिज यूनिवर्सिटी द्वारा कराए गए इस सर्वेक्षण पर नजर डालें तो यह बात साबित हो जाती है कि जिन बच्चों ने अपना बचपन खुशहाल और मधुर वातावरण में बिताया है और जो अपने माता-पिता के दुलार में बड़े हुए हैं, उनके वैवाहिक जीवन में कड़वाहट आने की संभावना अपेक्षाकृत ज्यादा होती है और यही कड़वाहट आगे चलकर तलाक का रूप भी ले सकती है.


शोधकर्ताओं ने पाया कि ऐसे बच्चे जो अपने माता-पिता के साथ को लेकर आश्वस्त होते हैं और उन्हें यह भरोसा होता है कि किसी भी परिस्थिति में उनके अभिभावक उनका साथ नहीं छोड़ेंगे, वे अपने जीवन साथी की अहमियत को नहीं समझ पाते. ऐसे बच्चे अपने अभिभावकों पर इतना ज्यादा निर्भर होते हैं कि अपने वैवाहिक जीवन में मनमुटाव के हालातों में भी वह उन्हें सुलझाने की बजाए माता-पिता के पास चले जाते हैं. उनका ऐसा व्यवहार संभवत: उनके साथी को नागवार गुजरता है, जिसके परिणामस्वरूप संबंध-विच्छेद की नौबत आ जाती है.


इस शोध की निर्देशिका फेलिसिआ हुपर्ट का कहना है कि ऐसे सकारात्मक वातावरण में पले-बढ़े बच्चों में आत्म-सम्मान की प्रवृत्ति भी अपने साथी की अपेक्षा अधिक होती है, जिस कारण वह छोटी-छोटी बातों को भी बहुत ज्यादा तरजीह देते हैं. उनकी प्राथमिकताएं स्वयं तक केन्द्रित हो जाती हैं. उनके माता-पिता उनकी हर आवश्यकता को पूरा करते थे लेकिन अगर उनका साथी उनकी जरूरतों को नहीं समझता और संबंध में संतुष्टि का अभाव हो तो ऐसे में वह अपने असफल रिश्ते को ठीक करने की बजाए संबंध समाप्त करने को एक बेहतर विकल्प मानते हैं. उनके इस कदम से उनके साथी पर क्या बीतेगी, वह इस बात को महत्व भी नहीं देते.


इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात जो सामने आई है वो यह कि जिन बच्चों को उनके माता-पिता अपने शौक और आदतों को संतुष्ट करने की पूरी आजादी देते हैं, बच्चे कहीं भी जाएं, कितने बजे भी घर वापस आएं, वह कोई रोक-टोक नहीं लगाते, भले ही अभिभावकों का ऐसा व्यवहार बच्चों को कुछ पल की खुशी प्रदान करता हो लेकिन इसके दूरगामी परिणाम चिंता का विषय हो सकते हैं. ऐसे बच्चों का मित्र समूह और सामाजिक संपर्क भी बहुत विस्तृत हो जाने के कारण वह अपने जीवन-साथी को समय देना भूल जाते हैं और अगर कोई परेशानी उत्पन्न होती है तो उसे सुलझाने की जगह वह अपने मित्रों के साथ समय बिताना पसंद करते हैं.


बच्चों के ऐसे व्यवहार के पीछे सबसे बड़ा कारण है कि अभिभावकों की बच्चों की खुशियों और जरूरतों के विषय में अत्याधिक रुचि, बच्चों को परिपक्व नहीं बनने देती. कहीं ना कहीं उनमें बचपना विद्यमान रहता ही है, परिणामस्वरूप वह समस्याओं का निपटारा करने में सक्षम नहीं हो पाते और उनसे भागने लगते हैं.


यद्यपि यह शोध एक पाश्चात्य संस्थान द्वारा करवाया गया है, लेकिन अगर हम इसे भारतीय परिदृश्य के साथ जोड़ कर देखें, तो इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि इसकी स्थापनाएं भारतीय परिवारों पर भी समान रूप से लागू होती हैं. ऐसा अकसर देखा जाता है कि माता-पिता बच्चों की छोटी-बड़ी सभी जरूरतों और ख्वाहिशों को पूरा करने में दिन-रात एक कर देते हैं. इतना ही नहीं वह उन्हें ऐशो-आराम के सारे संसाधन उपलब्ध करवाने की भी बहुत कोशिश करते हैं. माता-पिता का ऐसा व्यवहार उनके बच्चों को यह समझने नहीं देता कि उन्हें जीवन में आगे कितनी चुनौतियों का सामना करना है. ऐसा माना जाता है कि जो चीजें मेहनत और जद्दोजहद से प्राप्त होती हैं, उनकी अहमियत कहीं ज्यादा बढ़ जाती है. अगर अभिभावक बच्चों को सब चीजें आसानी से उपलब्ध करवा देंगे तो बच्चे उन खुशियों का मोल नहीं समझ पाएंगे. इसके विपरीत अभिभावकों को यह समझना चाहिए कि अत्याधिक लाड़-प्यार भी बच्चों को बिगाड देता है. बच्चों की हर गलती को नजर-अंदाज करना आपके प्यार को नहीं बल्कि आपकी उपेक्षा को दर्शाता है. अगर आज आप अपने बच्चों को जीवन की वास्तविकता से परिचित नहीं करवाएंगे, तो आगे चलकर वह आज के प्रतिस्पर्धा प्रधान समय में अपनी पहचान और अस्तित्व साबित करने में सफल नहीं हो पाएंगे.


Read Comments

Post a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *