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यूं बनें अपने बच्चों के लिए एक आदर्श पिता

father and sonएक पुरानी कहावत है, ‘जैसा बाप वैसा बेटा’. हो सकता है कि कुछ लोग इसको सही न भी मानते हों. लेकिन हाल ही में हुए एक अध्ययन (Research) ने इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि माता-पिता (Parents) दोनों की तुलना में बच्चे मुख्य रूप से अपने पिता से ही प्रभावित होते हैं, खासतौर पर पुत्र बचपन से केवल पिता के स्वभाव, उनकी आदतों से ही प्रभावित होकर अपने चरित्र का निर्माण करता है.


अध्ययन के परिणाम

चार्ल्स विश्वविद्यालय (Charles University) द्वारा कराए गए इस अध्ययन (Study) से यह बात साबित हो जाती है कि लड़कियों की अपेक्षा लड़के अपने आस-पास के वातावरण (Environment) से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं. इसके अलावा यह भी देखा गया है कि पुत्र अच्छे-बुरे सभी मामलों में पिता को ही अपना आदर्श मान लेते हैं. बिना यह समझे कि वह सही है या गलत, पिता की आदतों को वह जल्द से जल्द अपनाने का प्रयास करते हैं.


जहां एक ओर तो वह ऐसा कर पिता के प्रति अपने सम्मान को दर्शाते हैं, लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि ऐसा करने से वह अपने पिता द्वारा की हुई गलतियों को भी दोहरा दें. अकसर देखा गया है कि अगर पिता अपने से बड़ों को सम्मान देता है और दूसरों के प्रति नम्र व्यवहार रखता है तो पुत्र भी अपने पिता को देखते हुए ऐसा ही करता है. लेकिन यदि पिता झगड़ालू या गुस्सैल (Aggressive) प्रवृत्ति का हो तो बेटे के स्वभाव में भी यह त्रुटियां (Flaws)  शामिल हो सकती हैं.


एक और महत्वपूर्ण बात जो इस शोध द्वारा सामने आती है वो यह कि यदि बेटे की बढ़ती उम्र में पिता अपनी जीवन साथी के प्रति गंभीर या वफादार (Loyal) ना हों तो उनकी इस प्रवृत्ति का नकारात्मक प्रभाव (Negative Impacts)  खासतौर पर उनके बेटे पर पड़ता है. परिणामस्वरूप इस बात की आशंका बढ़ जाती है कि वह भी भविष्य में अपनी पत्नी के प्रति वफादार ना रहे और अवैध संबंधों में संलग्न हो जाए या फिर अपनी पत्नी के प्रति पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध (Committed) ना रह पाए.


मूलतः यह सर्वेक्षण (Research) एक विदेशी संस्थान (Institution)  द्वारा कराया गया है, जहां आपसी संबंधों के मायने बेहद कम रह गए हैं और भावनाओं की जगह औपचारिकता (Formality) ने हथिया ली है. विदेशों में एक उम्र बाद बच्चे भी अपने माता-पिता के साथ रहना पसंद नहीं करते, क्योंकि सबके साथ रहने से उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Individual Liberty) का हनन होता है. वह घर के बाहर अपनी नई दुनिया बसा लेते हैं और उनकी उस दुनिया में उनके माता-पिता का दखल न्यूनतम (Minimum Interference) रहता है. ऐसे में उनके पिता की आदतों का प्रभाव उन पर कम और उन लोगों का प्रभाव अधिक पड़ता हैं जिनके साथ वह अधिक समय व्यतीत करते हैं.


भारत की स्थिति

लेकिन अगर भारत के संदर्भ में इस सर्वेक्षण की बात की जाए तो यहां स्थिति बिल्कुल अलग है, क्योंकि यहां आपसी रिश्तों (Mutual Relationship) के मायने आज भी कम नहीं हुए हैं. यहॉ पिता को आश्रय-दाता का दर्जा दिया जाता है. बच्चों का जीवन पिता की छत्रछाया में ही बीतता है, यहां तक ही व्यस्क (Adult) होने और विवाह के बाद भी बच्चों के जीवन में माता-पिता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ऐसे परिवेश में बच्चों की अपने पिता के स्वभाव से प्रभावित होने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है. इसीलिए बच्चों के भविष्य को उज्जवल और उन्हें सभ्य (Civilized) बनाने की ज़िम्मेदारी पूर्ण रूप से माता-पिता की ही होती है. अभिभावकों (Guardian) को जरूरत है कि वह अपने रिश्तों की संजीदगी को बनाए रखें और एक दूसरे के लिए कोई मनमुटाव न रखें. खासतौर पर अपने बच्चों को किसी भी बुरी आदत या व्यवहार से दूर रखने के लिए पिता का यह कर्तव्य बन जाता है कि वह अपनी नकारात्मक आदतों (Negative Habits) पर जितना हो सके उतना नियंत्रण रखें और या फिर अपने ब्च्चों के सामने ऐसे किसी भी व्यवहार और आदतों को उजागर न करें जिनका उन पर पर बुरा असर पड़ सकता है.


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