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आखिर कब आएगा ‘हाउस हसबैंड’ का जमाना

नीतू और गौरव की अभी-अभी शादी हुई है. दोनों ही कामकाजी हैं और सुबह साथ ही ऑफिस के लिए निकलते हैं. नीतू का ऑफिस थोड़ा दूर है और आने-जाने में उसे काफी थकान भी होती है और सास-ससुर के साथ रहने की वजह से नीतू को घर का सारा काम देखना पड़ता है लेकिन उसकी परेशानियों को समझने के बावजूद उसका पति उसकी कोई मदद नहीं करता.  बेचारी को सुबह भी घर का सारा काम अकेले करना पड़ता है और शाम को भी.


नीतू और गौरव की कहानी हजारों विवाहित जोड़ों की कहानी है जो पति-पत्नी दोनों ही घर से बाहर काम करने जाते हैं. औरतें तो घर के साथ-साथ बाहर की जिम्मेदारियां संभाल लेती हैं लेकिन इस मामले में पुरुष मात खा जाते हैं.


आपको जानकर हैरानी होगी कि ब्रिटेन में बहुत सी ऐसी सफल महिलाएं हैं जो अपनी कामयाबी का सार श्रेय अपने हाउस हसबैंड..जी सही सुना आपने हाउस हसबैंड को देती हैं. उनका कहना है कि अगर घर संभालने के लिए उनके पति ना होते तो आज वे सफलता के इस पायदान पर कभी ना पहुंच पातीं. खैर यह तो बात हुई विदेशों की लेकिन भारत के हालात इससे कुछ जुदा ही है.


आजकल की बदलती जीवनशैली में जब महिलाएं और पुरुष दोनों ही समान रूप से गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान कर रहे हैं वहां बहुत जरूरी होता है कि दोनों में एक सामंजस्य स्थापित हो. लेकिन अकसर देखा यही जाता है कि महिलाएं तो घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारियां संभाल लेती हैं लेकिन जब बात पुरुष की आती है तो घर की जिम्मेदारियों में उसका हाथ बंटाना किसी को भी रास नहीं आता. हमारा समाज तो उसे निठल्ला कहता ही है लेकिन परिवार के भीतर भी उसकी छवि जोरु के गुलाम की तरह हो जाती है.


भारतीय परिदृश्य में तो पुरुषों का घर का काम करना निषेध सा ही माना गया है. पुरुष इसे अपने पुरुषत्व के खिलाफ समझते हैं वहीं समाज में तो उन्हें निंदनीय और हसी का पात्र ही बना दिया जाता है.निश्चित तौर पर यह एक बड़ी विडंबना है कि अगर पत्नी,मां, बेटी,बहन या बहू पारिवारिक सदस्यों की जरूरतों को पूरा करने के लिए घर से बाहर कदम निकाल रही है तो हम क्यों रूढ़िवादी मानसिकता का परिचय देते हुए पुरुषों के घर का काममें हाथ बटाना निंदनीय क्यों मानते हैं. अगर पुरुष की कामयाबी के पीछे एक औरत का हाथ हो सकता है तो एक औरत की कामयाबी के पीछे पुरुष का हाथ क्यों नहीं भो सकता.


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