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भाषा से ही पहचान

KUSHAGRA SAXENA

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किसी भी व्यक्ति की प्रार्थमिक पहचान उसकी भाषा से ही होती है. लेकिन इस पूरे विश्व में एक राष्ट्र ऐसा भी है जिसके नागरिकों का शिक्षण–सामर्थ्य मात्र दूसरी भाषाओँ के ज्ञान से सिद्ध होता है और इस देश का नाम है. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र “भारत”.

एक भारतीय होने के नाते मुझे बड़ा दुःख होता है जब कोई हमारी मातृभाषा की तुलना दूसरी भाषा से करता है. क्या हमारी मातृभाषा हिंदी उत्तम नहीं है? ऐसा क्यों है कि हमारे देश के नागरिक एक दुसरे के ज्ञान कि गणना भाषा के आधार पर करते है.

क्या जर्मनी में केवल जर्मन जानने वाला व्यक्ति जिसे दूसरी प्रमुख भाषाओँ का ज्ञान नहीं है, उसे दूसरों से कमतर समझा जाता है या फ्रांस किसी को भी नौकरी तभी मिलती है जब उसे दूसरी प्रमुख भाषाओँ का ज्ञान होता है?

अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्यों भारत में अंग्रेजी भाषा को जायदा प्रार्थमिकता दी जाती है, क्यों यहाँ नौकरियां केवल अंग्रेजी भाषा में दक्षता रखने वाले अभ्यर्थियों को ही दी जाती हैं. इसी कारण अंग्रेजी में दक्षता न रखने वाले अभ्यर्थी असफल हो जाते हैं और उनका मनोबल भी क्षीण हो जाता है.
अब यहाँ एक प्रश्न उठता है कि क्या केवल अपनी मातृभाषा का ज्ञान होना किसी व्यक्ति को सफल बनाने के लिए परिपूर्ण नहीं है.

मित्रों अब आप ही इस पर विचार करें!

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