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मील का पत्थर या रास्ते का रोढ़ा ?

युवा- चेतना

युवा- चेतना

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सन १९८४ में इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद , देश का प्रधान-मन्त्री बनने के लिये प्रणव मुर्खजी एक बढ़े दावेदार थे ,पर परदे के पीछे की राजनीति और हालात के कारण ऎसा हो न सका । फिर राजीव गांधी जी की हत्या के बाद एक बार फिर कुछ अदृश्य शक्तियां प्रणव दा के प्रधानमन्त्री बनने के रास्ते में आ गईं । २००४ में तो उनको ही देश का प्रधानमन्त्री होना चाहिए था , नहीं बनाए गए ! २००९ में भी वो मन मसोस कर रह गए होंगे !
पार्टी के योग्य,अनुभवी , पुराने निष्ठावान , किसकी आंख की किरकिरी या रोढ़ा हैं ? प्रणवदा नेहरू/गांधी परिवार के भरोसे के सिपहसलार हैं व उनकी आर्थिक व औद्योगिक नीतीयों के प्रबल समर्थक भी ! नेहरू ने देश को भिलाई इस्पात जैसा सरकारी लौह उद्योग दिया तो इन्दिरा ने बीमा , बैंक उद्योग व रक्षा के क्षेत्र के माध्यम से देश को व मनोविग्यानिक व आर्थिक मज़बूती दी । पता नहीं कैसे , आर्थिक क्षेत्र में लड.खढ़ा रहे पशचिमी व यूरोपीय देशों के चंगुल में हम आ गए ? हमारे देश की सामाजिक संरचना पाशचात्य देशों के सामाजिक परिपेक्षय से पूर्णता भिन्न है , हमारे यहां परिवार है वहां सरकार है ! मां-बाप बच्चों को पालते-पोसतें हैं पढ़ा-लिखा कर कमाने योग्य बनाते ताकि वो अपना जीवन निर्वाह करें व बुढ़ापे में उनकी पेंशन । आज पश्चिमी देशों की जो हालत है कि वो खुद तो डूबने को बैठे हैं हमारे पश्चिम के पिछलगू नेताओं के माध्यम से अपने को बचा हमें डूबोना चाहते हैं । ये नेहरू/इन्दिरा की नीतियों व सपनों के विरुद्ध है । लगता है प्रणवदा इन सबका विरोद्ध करते रहे होंगे ! प्रणवदा को लगता है , याद है कि विदेशी व्यापार के रास्ते से आकर ही देश के शासक बन बैठे और हम गुलाम ! दाद देनी होगी हमारे राजनेताओं की और विदेशी व्यापारीयों की सूझबूझ की ,किस नफ़ासतो अदब से अगले २ साल के लिये अपने मन मुताबिक वितमन्त्री व भविश्य मे युवराज के लिए मार्ग प्रश्स्त कर लिया !

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