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नहीं समझता है इस दुनिया में, अब कोई भी पीर

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कल सुबह भगवान की प्रार्थना करते हुए अनायास ही मुह निकल गया कि “हे प्रभु मेरी माँ को स्वस्थ रखना”

जबकि माँ का देहांत हो के ३ माह और ६ दिन हो चुके थे। पता नही क्यो कभी कभी बहुत बेचैनी सी महसूस करने लगता हूं माँ के लिए, जब कि मै अच्छी तरह से जानता हूं कि मृत्यु एक विश्वसत्य है। कोई बच नही सका काल से।

मुझे मालूम है कि तू नही किसी कोर मेरी माँ,

ढूँढ़ती है निगाहें तुझको फिर भी हर ओर मेरी माँ।

विनीत चौहान की ” माँ तुम्हारा लाड़ला रण मे अभी घायल हुआ है” सुनाने पर नाराज होना, मुझे डाटना, हल्के हल्के हाथों से मारना, बहुत याद आता है।

कहाँ चली गई तुम की अब मिलना तो दूर अब देखने का भी जरिया सिर्फ तस्वीरें हैं,

बच्चे को तो समझाया जा सकता है कि दादी अस्पताल गईं हैं आ जायेंगी, मै खुद को क्या सांत्वना दूं कि तुमने उस राह को पकड़ लिया है जहां मै अपने जीते जी कभी नही जा सकता और ना ही तुमको कभी चलते फिरते देख सकता हू।

मै खुद को कैसे समझाऊँ कि, अब तुम्हारी यादों से मुक्त होने के लिए मेरी मौत तक का इंतजार करना पड़ेगा मुझे।

दिनेश रघुवंशी ने कहा है,

न ये ऊंचाई सच्ची है न ये आधार सच्चा है

न कोई चीज है सच्ची न ये संसार सच्चा है।

मगर धरती से अंबर तक युगों से लोग कहते हैं

अगर सच्चा है जग मे कुछ तो माँ का प्यार सच्चा है।।

पर ये बातें मै तब क्यों नही समझ पाया जब तुम मेरे साथ थी? क्यों क्यों?

तुम्हारी वो बेचैनी मेरे साथ होने पर भईया के लिए और भईया के साथ होने पर मेरे लिए, अब बहुत सताता है मुझे, फूट फूट कर, चिल्ला चिल्ला कर रोने का मन करता है, पर वो भी नही कर सकता लोग नौटंकी करार दे देंगे, अब तुम नही हो ना मेरी तकलीफों को मुझसे भी ज्यादा समझनेवाली।

कैसे बयां करु उन तकलीफों का जो तुम्हारे जाने के बाद मुझे हुई और किससे कहूं कौन समझेगा, तुम्हारे समक्ष एक बार रो मात्र देने से, मेरे दर्द की सीमाओं को नक्शे की तरह कागज पर उकेर सकने तक की तुम समझ रखती थी।

“नही समझता है इस दुनिया मे,अब कोई भी पीर मेरा,

सिल रहा हूं खुद ही अब तो, अपने जख्मो का मै घेरा।”

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