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स्वावलंबी महिलाएं बदल रहीं बीहड़ का माहौल

मुक्त विचार

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ग्राम असहना में समूह की बैठक करतीं महिलायें।
ग्राम असहना में समूह की बैठक करतीं महिलायें।

बीहड़ की जिन महिलाओं को कभी पढऩे या रहने लायक अच्छा माहौल नहीं मिला अब वे अपने साथ बीहड़ की किस्मत भी बदल रही हैं। बुंदेलखंड के जनपद जालौन के माधौगढ़ तहसील के असहना गांव की इन महिलाओं को देखकर किसी को भी यह जानकर हैरत हो सकती है कि वे बाजारवाद, आधुनिकीरण से दूर रहीं परंतु सुविधाओं के अकाल में भी उन्होंने स्वावलंबन से जो परिवर्तन किया है उसकी महक अब आसपास के गांवों तक फैल रही है। यह गांव दस्यु आतंक से वर्षों ग्रसित रहा फलस्वरूप यहां मूलभूत सुविधाएं भी मुहैया नहीं थी।

वर्ष 2004 में यहां की 10 महिलाओं ने जब लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह का गठन किया उसी समय बदलाव का बीजारोपण हो चुका था।जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों से सम्पर्क कर उन्होंने यहां जूनियर हाईस्कूल खुलवाया। साथ ही पेयजल, आवागमन के लिए मार्गों का निर्माण करवाया। महज 50 रुपये की छोटी बचत कर उन्होंने सुनहरे भविष्य की कल्पना की और यह अब हकीकत बन चुका है। अपनी स्वयं की बचत और एक स्वैच्छिक संस्था के सहयोग से उन्होंने चार साल पहले 70 हजार रुपये की लागत से टेंट हाउस खोला। चार साल में ही इस टेंट हाउस के रजाई, गद्दों, कढ़ाई, बाल्टी समेत अन्य सामानों की मांग इतनी बढ़ गई है कि अब आसपास के ज्यादातर समारोहों में यहीं से ग्रामीण सामान किराये पर ले जाते हैं। हर साल करीब 50 हजार रुपये का लाभ उनको मिल रहा है।

समूह की अध्यक्ष ऊषा देवी उत्साहित होकर कहती हैं कि टेंट के संचालन ने उनके अंदर आत्मविश्वास भरा है। साथ ही घर-परिवार ही क्या पूरे गांव में उनका सम्मान बढ़ा है। सचिव कुसमा ने कहा कि पहले लगा था कि पता नहीं उनका काम सफल होगा या नहीं, परंतु आज उन्हें संतोष है कि वे जितनी सफल चौखट के अंदर के कामों में थीं उतनी ही बाहर कारोबार जमाने में हुयी हैं। वे कहती हैं कि अब परिवार के लोग भी उनकी कामयाबी से बेहद उत्साहित हैं। आसपास के गांवों में उनकी देखादेखी कई महिलाओं को खुद का व्यवसाय स्थापित करने की प्रेरणा मिली है।

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