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विधानसभा चुनाव की बजाय पारिवारिक जंग की फतह मुख्य निशाना

मुक्त विचार

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समाजवादी पार्टी में क्षणिक युद्ध विराम के बाद विग्रह का नया अध्याय लिखा जाने लगा है। यह पार्टी परिवार के न थमने वाले कलह के लिए अभिशप्त हो चुकी है। हाल तक लगा था कि परिवार में एक-दूसरे के लिए सबके मन का मैल छंट गया है लेकिन अब साबित हो रहा है कि यहां तो पारिवारिक सम्बंधों में भी सियासत हो रही है। इस परिवार कथा के सभी पात्र चालाकियों से प्रेरित अभिनय कर रहे हैं इसलिए इस कथा का पटाक्षेप बेहद अनिश्चित मालूम हो रहा है। कथा और उपन्यास का मजा तो इसी में है। जब इसे पढ़ने वाले इसके उपसंहार का अंदाजा न लगा पाएं।
बरेली रैली से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिताश्री की बदली भृकुटियां फिर सामने आयी हैं। गाजीपुर की रैली में तो उन्होंने सिर्फ इतना ताना दिया था कि अखिलेश जिद्दी हैं। वे इस बात से आहत थे कि उनके द्वारा सम्बोधित इस रैली से अखिलेश ने इसलिए किनारा किया क्योंकि उन्हें अपनी इमेज बाप से ज्यादा ऊंची लग रही है। मुख्तार अंसारी के परिवार की सपा में आमद रोकने के नाम पर उन्होंने अपनी आदमकद मूर्ति गढ़ने की जो कवायद की थी गाजीपुर की रैली में शामिल होकर वह बेमानी न हो जाए इसलिए वे पिता का लिहाज भूल गए। लेकिन केवल सीएम के जिद्दी होने की बात कहकर उन्होंने अपने दर्द को खत्म कर लिया और जता दिया कि बेटे के लिए उन्हें इतना तो सहना ही पड़ेगा लेकिन बरेली रैली में न आने के पीछे ऐसी कोई दलील, ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी इसलिए अखिलेश के रवैये में उन्हें बेअदबी की बू महसूस हुई और उनका सब्र जवाब दे गया।
इसके बाद वे जिस रौ में आ गए उसमें पिता के नाते जो मुलायमियत उन्हें अपरिहार्य लग रही थी उसे उन्होंने खूंटी पर टांग दिया और वे अखिलेश के चिर प्रतिद्वंद्वी जैसे तेवर में आ गये। उन्होंने इस रैली में अपने बेटे पर निर्मम निशाने साधे। अखिलेश ने अपने चाचा शिवपाल और उनके नजदीकी ओमप्रकाश सिंह को मंत्रिमंडल से बाहर किया था। यह जताने की कोशिश करके कि इन लोगों के विभाग में ठीक से काम नहीं हो रहा था पर मुलायम सिंह ने इस रैली में सार्वजनिक रूप से कहा कि शिवपाल और ओमप्रकाश सिंह जितना बेहतर काम कर रहे थे उतना काम करने की सलाहियत अखिलेश मंत्रिमंडल के वर्तमान किसी सदस्य में नहीं है। सिर्फ इतना कहने का मकसद तो यह माना जा सकता था कि यह चुनाव के मौके पर शिवपाल को साधे रहने का पैंतरा हो सकता है लेकिन उन्होंने नौजवानों को उकसाने के लिए जो कहा उससे तो यह जाहिर हुआ कि वे अखिलेश के खिलाफ बुरी तरह भड़के हुए हैं और उनको सबक सिखाना उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है।
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे के एक हफ्ते पहले ही हुए लोकार्पण समारोह में उन्होंने अखिलेश की तारीफ के पुल बांध दिए थे लेकिन बरेली की सभा में उन्होंने यह जताया कि अखिलेश ने उनकी मंशा की परवाह न करते हुए पुलिस की ढाई लाख भर्तियां करने में लापरवाही बरती जिससे नौजवानों को नौकरी देने की पार्टी की प्रतिबद्धता को चोट पहुंची। नौजवानों के बीच चुम्बकीय चेहरा बन जाने की वजह से ही अखिलेश अपने को खुद मुख्तार समझने लगे हैं इसलिए मुलायम सिंह ने तोते की जान पर निशाना लगाने की कोशिश की। मतलब साफ है कि मुलायम सिंह का गुस्सा आत्मघात की हद तक बरेली रैली में बढ़ चुका था। इसलिए उन्होंने अखिलेश पर ऐसा प्रहार किया कि उनकी पूरी सरकार सकते में आ गई। अगले ही दिन अखिलेश सरकार के मुख्य सचिव राहुल भटनागर को मीडिया के सामने आना पड़ा। यह बताने के लिए कि इस सरकार ने साढ़े चार लाख लोगों को नौकरियां दी हैं। साथ ही एक आदेश जारी किया गया कि चयन प्रक्रिया पूर्ण हो जाने के बावजूद जो विभाग नियुक्ति पत्र जारी करने में आनाकानी कर रहे हैं उऩके लिए 13 दिसंबर तक का अल्टीमेटम है कि वे इस कार्यवाही को पूर्ण कर दें। इस आदेश से उन अभ्यर्थियों की बांछें खिल गई हैं जिन्हें हाथ में आई नौकरी खिसकने का खतरा नजर आ रहा था और इससे वे बेहद निराश थे।
इसके पहले पारिवारिक संघर्ष के सुखद समापन की कई तस्वीरें सामने लाई गईं, जिनमें रामगोपाल यादव की वापसी और इसके बाद उनकी और शिवपाल की एकांत में लम्बी मंत्रणा के दृश्य शामिल रहे। लेकिन मधुर मिलन का यह भ्रम तब टूटा जब प्रो. रामगोपाल यादव ने इटावा में कुछ ही दिन पहले यह बयान दिया कि प्रदेश विधानसभा के चुनाव के उम्मीदवारों की सूची उनके स्तर पर ही फाइनल होगी। जाहिर था कि वे और अखिलेश ऐसा महसूस कर रहे थे कि सुलह और सौहार्द के नाम पर उऩकी बलि चढ़ाने का ताना-बाना बुना जा रहा है इसलिए पेशबंदी में रामगोपाल का बयान आया और इसके बाद कलह के नये अध्याय का सूत्रपात हो गया। शिवपाल ने रामगोपाल का तो स्पष्ट प्रतिवाद नहीं किया क्योंकि शायद वे यह मानते हैं कि उनकी कोई स्वतंत्र हैसियत नहीं है लेकिन उन्होंने अखिलेश के संदर्भ में कहा कि उम्मीदवार तय करते समय उनकी सलाह भी मानी जाएगी पर आखिरी फैसला उऩका होगा। इसके बाद सपा के रजत जयंती समारोह में शिवपाल द्वारा धकियाये गए जावेद अब्बास आब्दी को अखिलेश जानबूझ कर सिंचाई विभाग का सलाहकार बनाते हुए मंत्री का दर्जा दे दिया। यह शिवपाल के जख्मों को दोबारा कुरेदने जैसा उपक्रम था क्योंकि शिवपाल के पास लम्बे समय से सपा की हर सरकार में लोक निर्माण के साथ-साथ सिंचाई विभाग भी रहता आया था। इससे शिवपाल को और ज्यादा हमलावर होने की चुनौती महसूस हुई और तत्काल उन्होंने बिना रामगोपाल व अखिलेश की कोई परवाह किए 23 नये प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी। इसमें उन्होंने ऐसे चयन किए जिससे अखिलेश को जमकर चिढ़ाया जा सके।
अखिलेश ने माफियाओं से पार्टी की दूरी बनाने की नीति पिछले चुनाव के पूर्व से अपना ली थी। इसीलिए डीपी यादव का प्रवेश नहीं हो सका था और उनकी पैरवी करने की वजह से मोहन सिंह को अपने जीवन के अंतिम समय में अखिलेश के हाथों अपमानित होना पड़ा था जबकि वे समाजवादी विचारधारा का बहुत बड़ा नाम थे। इसी नीति की निरंतरता बनाए रखते हुए उन्होंने कौमी एकता का सपा में विलय रद्द कराने की जिद ठान ली थी। अखिलेश के साफसुथरी राजनीति के इस अभियान को कोई भाव न देने की रणनीति के तहत शिवपाल ने उम्मीदवारों की नई सूची में इलाहाबाद के माफिया अतीक अहमद को कानपुर महानगर की कैंट सीट से टिकट देने का ऐलान कर दिया। अतीक को पार्टी की उम्मीदवारी से नवाजने के और भी निहितार्थ हैं। अखिलेश ने 2012 के विधानसभा चुनाव में अतीक को भी पार्टी में लेने का विरोध किया था। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में वे पार्टी द्वारा प्रत्याशी बना दिए गए थे और हार गए थे। फिर भी अखिलेश ने उन्हें किनारे पर ही रखा। अखिलेश की मंशा के कारण ही मुलायम सिंह को भी अतीक के मामले में उदासीनता बरतनी पड़ी थी। इसलिए यह अब पूछा जा रहा है कि क्या अतीक उम्मीदवारी घोषित करने के पीछे जावेद अब्बास आब्दी को मुख्यमंत्री द्वारा पुरस्कृत किए जाने की शह का जवाब देने की मंशा भी है।

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