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मूर्ति घटना ने बढ़ाया माया का कद

मुक्त विचार
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मायावती ने जीवित रहते हुये भी अपनी प्रतिमा लगवाकर वितृष्णा पैदा करने वाला काम किया था लेकिन इसके बावजूद उनकी प्रतिमा तोड़े जाने की घटना का जिस तरह विरोध हुआ और मुख्यमंत्री व सपा सुप्रीमो ने भी निंदा में देर नहीं की वह एक तरह से पूरी तरह उचित है।
बसपा के संस्थापक कांशीराम और उनके प्रेरणास्रोत बाबा साहब डा. अंबेडकर ने व्यक्तिगत स्तर पर त्याग के बहुत बड़े उदाहरण को अपने जीवन में प्रस्तुत किया था इसी कारण समता का आंदोलन अकाट्य नैतिक शक्ति से परिपूरित हुआ। समता की लड़ाई लडऩे के कारण जो लोग बाबा साहब को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे उन्होंने घोषित कर दिया था कि स्वतंत्रता संग्राम में बाबा साहब ने अंग्रेजों के एजेंट की भूमिका निभाई थी और बदले में काफी धन अर्जित किया था। उनके झूठ के मुंह पर तब तमाचा लगा जब बाबा साहब दिवंगत हो गये और यह तथ्य सामने आया कि विरासत में वे उत्तराधिकारियों के लिये कर्जा छोड़ गये हैं। बाबा साहब ने जितनी लड़ाई दलितों को अधिकार दिलाने के लिये लड़ी उससे कम कटिबद्धता श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का संरक्षण करने के लिये नहीं दिखाई थी। उन्होंने नेहरू मंत्रिमंडल से तो इस्तीफा ही महिलाओं के अधिकारों के सवाल पर दिया था न कि दलित राज की मांग के लिये।
कांशीराम का जीवन भी सामाजिक आंदोलन के प्रति समर्पण का बहुत बड़ा उदाहरण रहा है। उन पर अनुसूचित जाति जनजाति के अधिकारियों, कर्मचारियों से चंदा वसूल कर ऐश्वर्यपूर्ण जीवन बिताने का आरोप लगाया गया। यहां तक कहा गया कि देश में गृह युद्ध कराने के लिये उन्हें सीआईए से वित्त पोषित किया जा रहा है लेकिन अब सब जान चुके हैं कि वे पूरी तरह सादगी से रहते थे। आंदोलन के लिये परिवार से पूरी तरह नाता तोडऩे का संकल्प उन्होंने अक्षरश: निभाया। मिशन के पैसे से उन्होंने न तो खुद कभी कोई अय्याशी की न एक पैसा परिवार के लोगों को दिया।
मायावती भी दावा तो यह करती हैं कि वे अपने गुरू कांशीराम जी के आदर्शों पर चल रही हैं लेकिन उनमें और कांशीराम में जमीन आसमान का फर्क है। उनके मुख्यमंत्री रहते हुये उनका परिवार समृद्ध हुआ जबकि मिशन के सिपाही बर्बाद हो गये। स्वयं उनके ठाठ-बाट के तो कहने क्या हैं। कांशीराम जी अक्खड़ थे लेकिन अहंकारी नहीं। मायावती में यह भी गुण नहीं है। जहां तक मायावती का सवाल है सामंतवादी मानसिकता में किसी भी समकालीन नेता से वे बहुत ज्यादा हैं। अपने को दलितों पर महामानव के रूप में आरोपित करने की जिद की वजह से ही उन्होंने जीवित रहते हुये अपनी प्रतिमा लगवाने का अशोभनीय आचरण किया। नैतिक आंदोलन के प्रणेता में जो शील होना चाहिये मायावती उससे पूरी तरह परे हैं लेकिन इस देश में प्रतीक की राजनीति का बड़ा महत्व है और मायावती दलित शक्ति की प्रतीक के रूप में स्थापित हो चुकी हैं। उन पर जो लोग किसी भी तरह के हमले का इरादा बनाते हैं वे उनकी व्यक्तिगत खामियों से चिढ़े लोग नहीं होते बल्कि वे जानते हैं कि मायावती का मान मर्दन करने से दलितों का मनोबल गिरेगा और इस तरह की सोच को कदापि बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
मायावती की मूर्ति को तोडऩे वाले सिरफिरे नौजवान भी समता के मूल्यों के दुश्मन वर्ग के हैं। उन्होंने यह कृत्य करके मायावती की तमाम कमियों को परे कर उनके कद को और ऊंचा करने का काम कर दिया है। मायावती की सबसे बड़ी अच्छाई यह है कि गांव-गांव में आज उनके समाज के लोगों को चौधरी साहब, जाटव जी या इस तरह के सम्मानजनक संबोधनों से पुकारा जाने लगा है। किसी की हिम्मत नहीं रह गयी कि उनके प्रति हेय भावना प्रदर्शित करे। मायावती ने महापुरुषता के संकुचित चौखटे को तोड़कर अपनी सरकार के कार्यकाल में बाबा साहब अंबेडकर, कांशीराम के साथ-साथ ज्योतिबा फुले, नारायण गुरू और साहू जी महाराज को राजकीय तौर पर पूजित कराया। लखनऊ में जब भी पार्टी या सरकार की रैली हुयी तथाकथित सर्वमान्य राष्ट्रीय महापुरुषों की बजाय समता के उक्त महारथियों को बैनर, होर्डिंग, पोस्टर में प्रदर्शित किया गया और कोई चूं तक नहीं कर पाया।

मुलायम सिंह और उनकी पार्टी को विधान सभा चुनाव में उन लोगों ने भी समर्थन दिया था जिन्होंने मायावती के समय बहुत माल काटा था। मायावती ने उनके लिये व्यक्तिगत रूप से कोई ऐसा काम नहीं किया था जो पीड़ादायक हो फिर भी वे मायावती के प्रति उग्र शत्रुता के भाव पनपाने के लिये मजबूर हुये तो वजह थी मात्र समता विरोधी मानसिकता। यह मानसिकता पराजित होनी चाहिये इसलिये मायावती की मूर्ति तोड़े जाने की घटना सर्वथा निंदा करने योग्य है और इसे अंजाम देने वाले लोग सामाजिक बहिष्कार के पात्र हैं।

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