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मुस्लिम संवेदनाओं का सम्मान हो

मुक्त विचार

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2007 में हुए सीरियल बम ब्लास्ट मामले में गिरफ्तार खालिद मुजाहिद की पिछले शनिवार को पुलिस हिरासत में हुई मौत के मामले मंे पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह सहित कई पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करवाकर इसकी जांच सीबीआई से कराने की संस्तुति राज्य सरकार दिल्ली को भेज चुकी है। फिर भी मुसलमानों का गुस्सा शान्त नहीं हो रहा है। इसके पहले राज्य सरकार ने परीक्षण में पाया था कि खालिद मुजाहिद और उनके साथी तारिक आजमी को सीरियल बम ब्लास्ट मामले मंे बिना किसी आधार के फंसाया गया था। इस कारण उनके विरूद्ध चल रहे मामले को वापस लेने के लिए अदालत में अर्जी भी डाली गई थी जो तकनीकी कमी की वजह से खारिज हो गई थी। अब तारिक आजमी के लिए नई अर्जी दाखिल करने की तैयारी राज्य सरकार द्वारा की जा रही है।
विक्रम सिंह के समय एसटीएफ में रहे उनके कुछ चहेते पुलिस अफसरों ने आतंकवादी घटना होते ही किसी भी मुसलमान को पकड़कर ठोंक डालने का धंधा बना लिया था। जब इस तरह के गुडवर्क से प्रदेश के नौजवान मुसलमानों में पनप रहे गुस्से के कारण आतंकवाद के लिए उत्तर प्रदेश मंे उर्वरा जमीन तैयार होने के अंदेशे से मायावती को वाकिफ कराया गया तो उनके हस्तक्षेप से एसटीएफ का तत्काल शुद्धिकरण हुआ और मुसलमान के नाम पर किसी के भी खिलाफ कार्रवाई करने की कार गुजारी से पुलिस को रोका गया।
एक ओर पुलिस की ओर से याचिका तैयार हुई है कि उसकी हर कार्रवाई को गलत ठहराना फैशन बनता जा रहा है जिससे प्रभावित होकर अदालतें भी उनके खिलाफ संज्ञान ले लेती हैं। फलस्वरूप पुलिस मुश्किलों में घिर चुकी है। दूसरी ओर खालिद मुजाहिद की संदिग्ध मौत को लेकर पुलिस को कटघरे में खड़ा करने का एक और मामला सामने आ गया है। चूंकि मामला मुस्लिम संवेदनाओं का हैै और देश के एक बड़े वर्ग की धारणा मंे मुसलमानों की भावना के हर प्रसंग को देश भक्ति की कसौटी पर कसने के पूर्वाग्रह गहराई से घर किये हुए हैं। इस कारण खालिद मुजाहिद के मामले में भी यह कोंण बनने लगा है।
खालिद मुजाहिद वास्तव मंे सीरियल बम ब्लास्ट में संलिप्त थे या नहीं यह बात तो कोई निष्पक्ष जांच ऐजेसी ही तय कर सकती है। जहंा तक पुलिस का प्रश्न है उसकी कार्रवाई को लेकर व्यापक रूप से संदेह की जो स्थिति बन चुकी है उसमें मुसलमानों का योगदान तो नाममात्र का है। दरअसल पुलिस की विश्वसनीयता का जनाजा निकालने वाले असली लोग दूसरी कौंम और तबकों के हैं। यह आम ढ़र्रा बन चुका है कि अगर कोई संदिग्ध पकड़ा जाता है तो उसकी बिरादरी सड़कों पर आकर पुलिस को इस तरह गलत ठहराने लगती है मानो प्रदर्शन मेें शामिल हर आदमी हुए वाकये का चश्मदीद है। क्या भीड़ के आधार पर किसी मामले में किसकी संलिप्तता थी कि नहीं यह तय करने का काम ठीक हो सकता है। लेकिन यह दलील अगर प्रदर्शन करने वाले मुसलमान हांे तब तो दी जायेगी वर्ना नहीं। अखिलेश सरकार ने हाल मंे सवर्णो पर से मायावती राज में दर्ज हुए एससी एसटी एक्ट के मुकदमें वापस लेने की घोषणा की थी। उक्त मुकदमे दर्ज किसी भी सरकार में हुए हों लेकिन यह एक्शन था तो पुलिस का ही। क्या अखिलेश सरकार ने ऐसी घोषणा करके पुलिस की साख के ताबूत मंे एक और कील ठोकने का काम नहीं किया है। यहां तक कि वकील और मीडिया भी पुलिस के एक्शन को लेकर उसके खिलाफ झंडा उठाने से पीछे नहीं रहते। पिछले दिनों वकीलों ने ऐसे आरोपी को लेकर पुलिस विरोधी हिंसक प्रदर्शन किये हैं जिसका बार में सिर्फ रजिस्ट्रेशन था जबकि उनसे वकालत की एबीसीडी नहीं आती थी। इसी तरह जो कभी खबर नहीं लिखता उस बराये नाम पत्रकार को लेकर पुलिस के विरोध में लोकतंत्र बचाओं की लड़ाइयां लड़ी जाती हैं। पुलिस से लेकर अदालत तक के काम को परे करके पूरी वैधानिक प्रक्रिया को बेमानी बनाने का जो अभियान चल रहा है उसमेें बोलने की जरूरत तभी है जब आक्रोशित पक्ष मुसलमान हों। यही नहीं जिनके खिलाफ पुलिस ने मुकदमें दर्ज किये हों वे ही आज सबसे पहले विधायक और सांसद हो रहे हैं। चूंकि विधायी संस्थाओं में मुस्लिम अनुपात तो न्यून है इसलिए वे इस मामले में पैमाना क्यों बनाये जायें। दूसरे लोग जो शुचिता के ठेकेदार बनते हैं उन्हें देखें तो वे चुनाव प्रणाली को पेशेवर कातिलों, रंगदारी बसूल करने वालों और माफिया राज चलाने वालों को जननायक बनाने वाली प्रणाली में तब्दील कर चुके हैं।
ऐसी हालत मंेे इंसाफ की बात यही है कि अगर मुसलमान यह महसूस कर रहे हैं कि खालिद मुजाहिद को बेकसूर पकड़ा गया था तो जैसे दूसरों के कहने पर मान लिया जाता है वैसे ही मुसलमानों के कहने पर भी यह माना ही जाना चाहिए कि उनकी बात में कुछ न कुछ दम जरूर है। भेदभाव की इंतहा यह है कि जब दूसरे लोग जातिगत संवेदनाओं की वजह से पुलिस द्वारा पकडे गये व्यक्ति की रिहाई के लिए आंदोलन चलाते हैं तो मुसलमान उनका विरोध करें यह तो दूर की बात है बल्कि सबके साथ रहने की भावना के तहत उनके आंदोलन को सक्रिय समर्थन देते हैं। लेकिन जब मुसलमानों के दिल पर चोट लगती है तो उनका साथ देना तो दूर उनकी राष्ट्र भक्ति पर भी उंगलियां उठाई जाने लगती हैं।
दूसरी ओर पुलिस कर्मियों ने अपने मौलिक अधिकारों को लेकर जो याचिका हाईकोर्ट में डाली है उस पर भी गौर फरमाने की जरूरत है। अपराध नियंत्रण के लिए हर व्यवस्था में एक ऐजेंसी काम करेगी भले ही उसका नाम पुलिस न हो कुछ और हो। मामला विशेष को छोड़कर आमतौर पर उसकी साख को मजबूती देना हर नागरिक का फर्ज होना चाहिए ताकि समाज में अराजकतत्व काबू में रहे। भ्रष्टाचार या पद का दुरूपयोग अकेले पुलिस मंे नहीं है। यह तो पूरे सिस्टम का दोष है और यह दोष कैसे दूर हो व्यवस्था के कर्ता धर्ता इस चुनौती में अपने को खरा साबित करें। पुलिस पूरी तरह तभी सुधरेगी जब सिस्टम दुरूस्त होगा। लेकिन पुलिस की विश्वसनीयता को पलीता लगाना अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने की तरह है क्योंकि इस चूक से देश में कानून व्यवस्था पूरी तरह समाप्त होने की ओर अग्रसर हो रही है।

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