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अरुचि और निराशा के बाद वितृष्णा की बारी

जनार्दननामा

जनार्दननामा

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इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि अब राजनैतिक गतिविधियों और विवादों के चलते लोगों में इनमे संलिप्त और इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों के प्रति अरुचि और निराशा बलवती होने लगी है. इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अरुचि और निराशा की पराकाष्ठा का परिणाम यह होगा कि वितृष्णा व्याप्त होने में देर नहीं लगेगी. हमें इस बात को दरकिनार नहीं करना चाहिए कि यह बात केवल नेताओं के बारे में नहीं है और इसके दायरे में उनके सहयोगी अपराधी, मीडिया में लगातार तर्क और कुतर्क का सहारा लेते अपना चेहरा चमकाते पार्टियों के प्रवक्ता, बाबा,संत,इमाम और आन्दोलन के तथाकथित प्रेरक ,प्रणेता और संचालक भी आने लगे हैं. दरअसल इनका प्रयोजन और लक्ष्य भले ही लोकहित और लोकशाही में आवश्यक परिवर्तन और सुधार हो पर ये पूरी तरह निष्पक्ष,निरपेक्ष और निस्पृह नहीं लगते. सिलसिला यही और ऐसे ही चलता रहा तो सबसे पहले मिडिया को ही लोगों की अरुचि और अलोकप्रियता के दायरे में आने की संभावना होगी. सरकार, सेना, नेता,अधिकारी,समाजसेवी और समाजसुधारक, योग और अध्यात्मिक के धुरंधर के साथ मीडिया पर भी सवाल उठता है तो यह गंभीर है, चिंतनीय है,दुखद है,निंदनीय है. अब सभी को हमाम में ही अच्छा लगने लगा है, लुभाने और सुहाने वाला है.

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