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कोरोना का कोहराम

KDforINDIA

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बहुत कठिन समय चल रहा है, कब कौन कोरोना की गिरफ्त में आ जाएगा इस डर से सभी आशंकित हैं। कहीं ऑक्सीजन की कमी है, तो कहीं जीवन रक्षक दवाइयों की कमी है और तो और अब तो डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ की कमी भी महसूस की जा रही है। नेता हो या अभिनेता सभी वर्ग के लोग इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं और अभी भी आ रहे हैं। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार परेशानी ज्‍यादा है और कोरोना का कोहराम भी। जो अभी तक अप्रभावित हैं वो ईश्वर का धन्यवाद ज्ञापित कर रहे हैं और आगे के लिए प्रार्थना भी। कुछ अपनी जान की परवाह किए बगैर सेवा- सहायता में लगे हुए हैं।
कोरोना से वे सभी देश भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं जिनको विकास का स्वर्ग समझा जाता रहा है। हम भारतीयों की एक बुरी आदत है जो पश्चिम में होता है उसको श्रेष्ठ समझने के तर्क ढूँढते हैं और जो यहाँ देश में होता है उसमें कमियाँ ढूँढने की आदत से बाज नहीं आते और साथ ही उसे कोसने से भी बाज नहीं आते।
पिछले वर्ष जब मोदी सरकार ने समय से देशव्यापी lockdown लगाया लोगों की ज़िंदगी बचाने के लिए, यह सोचकर कि हमारे यहाँ लोग अभ्यस्त नहीं मास्क, sanitizer इस्तेमाल करने के। दूसरा यह सोचकर कि नया pandemic है तो Test kit, PPE किट न के बराबर थे तथा docters और हॉस्पिटल को भी इस पान्डेमिक की जानकारी अधूरी थी तब।
तो मीडिया ने बाद में खूब कोसा कि lockdown करके पूरी अर्थव्यवस्था चौपट कर दी। लोगों की नौकरियाँ छिन गयीं … गरीब विरोधी करार दे दिया गया उस lockdown को।
अब जब दूसरी कोरोना वेव ने भारत में कदम रखा तो मोदी सरकार को भरोसा था कि इस बार हमारे पास जानकारियाँ हैं, PPE किट हैं, अनुभवी doctors हैं, हेल्थ care सिस्टम को मज़बूत बनाने के लिए फण्ड भी आवंटित कर चुके हैं इत्यादि। लेकिन यह भरोसा नाकाफ़ी साबित हुआ।
तो इसमें फेल केवल मोदी जी ही हुए ? क्या राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी नहीं कि वे अपने स्तर से भी तैयारियाँ करें? कोई भी राज्य यह दावा करने की स्तिथि में नहीं कि हमने pandemic के अनियंत्रित प्रसार को रोकने के लिए केंद्र सरकार से ये माँगा… मगर केंद्र ने नहीं दिया या कि देर से दिया।
यह भी हम सभी को ध्यान में रखना चाहिए कि वैक्सीन जो इस लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार थीं, उनके प्रति हमारे दुराग्रह और शंका ने आज के दृश्य को और भी गम्भीर बना दिया। तथा केंद्र द्वारा भेजी गयीं वैक्सीन का लगभग 10% राज्यों में बर्बाद हो गया।  वस्तुतः फेल हम सब एक साथ हुए हैं।
जो व्यक्ति 18 घंटे काम करने का आदी हो उसके लिए यह कोरोना का हाहाकार एक चीत्कार बनकर सदैव सालता रहेगा।  क्या हम उन लोगों को पहचानते हैं जो हमारे मध्य ही हैं…. जो दवाई की कालाबाजारी, oxygen की कालाबाज़ारी, हास्पिटल में बेड की कालाबाज़ारी कर रहे हैं. अपने फ़ोन की contact लिस्ट खंगालिएगा उसमें 2-3 जरूर मिल जायेंगे। वैसों से हम सभी के सम्बंधों में कभी अंतर आएगा क्या? उनसे दूरी बनाना समाज कभी सीखेगा क्या? समाज कभी उनसे उसका हिसाब माँगेगा क्या?
ऑक्सीजन तो टटोल ही रहे हैं।
मन को भी टटोला जाए !!
डिस्क्लेमर- उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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