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कोरोना महामारी और चीन के साथ सीमा पर तनाव के बीच आत्मनिर्भर भारत अभियान

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चीन के वुहान शहर से निकले कोरोना वायरस ने पूरे विश्व के साथ ही भारत में भी भारी तबाही मचायी है। कोविड 19 नाम के इस महामारी से  पूरे विश्व में ताजे आँकड़े के अनुसार तकरीबन 120  लाख लोग संक्रमित हुए हैं और 5.5  लाख लोग मारे गए हैं। भारत में संक्रमितों की संख्या 8  लाख के पार पहुँच चुकी है औरे मरने वालों की संख्या 20  हजार के पार जा चुकी है। सबसे अधिक तबाही यूरोप और अमेरिका के बाद एशिया में मची है। जन  जीवन तो अस्त  व्यस्त है ही, पूरी अर्थव्यवस्था थम सी गई है। आज जबकि सारा विश्व इस वायरस से लड़ रहा है, वहीं चीन में आर्थिक गतिविधियां सामान्य रूप से चल रहीं हैं और वह पूरे विश्व को संकट में डालकर अपनी विस्तारवादी एजेंडे के तहत  भारत के अलावा कई पड़ोसी देशों के साथ सीमा पर आक्रामक रुप से उलझा हुआ है। 2017 में डोकलाम के बाद 5-6 मई को झड़प और 15 जून को गलवान घाटी मे हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए। एक अनुमान के मुताबिक तकरीबन 40 सैनिक भी मारे गए जिसे चीन ने पहले तो स्वीकार नहीं किया लेकिन बाद में 30 सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि की। उस दिन की घटना मे चीनी सैनिक जिस तरह आयरन रॉड और अन्य नुकीले हथियार लेकर आये थे उससे उनकी मंशा जाहिर है। एक तरफ बात चीत में उलझाए रखना और दूसरी तरफ दो कदम आगे और एक कदम पीछे की नीति तथा पीठ पीछे विश्वासघात चीन का चाल चरित्र है। अभी सीमा पर तनाव तो है ही, दोनों ओर से सैनिक तैयारियों की गतिविधियां भी तेज हैं और रविवार 5 जुलाई को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित डोवल और चीनी विदेश मंत्री के बीच बात चीत के बाद चीन ने गलवान घाटी के अलावा गोगरा और हॉट स्प्रिंग से अपनी सेनाएं पीछे हटाना शुरु कर दिया है। लेकिन चीन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। अभी यह देखना बाकी है कि चीन भारत के सख्त रुख के चलते पीछे गए हैं या मौसम की चुनौती की वजह से। पांगोंग त्से लैक तथा डेपसांग जैसे इलाकों में चीनी सैनिक अभी भी अपने साजो सामान के साथ बने हुए हैं। मामले सुलझने के आसार कम ही हैं। तनातनी का माहौल अभी लंबा चलेगा।

फिलहाल चीन कई तरफ से घिरा हुआ है एक तो अपनी सीमा से लगे सभी देशों के साथ सीमा विवाद तो दूसरे दक्षिण चीन सागर में अपने प्रभुत्व को लेकर। कोरोना वायरस के संबंध में जानकारियाँ छुपाने और डब्ल्यू एच ओ के साथ संदिग्ध संबंधों को लेकर सवालों के घेरे में है। उत्तरी कोरिया और पाकिस्तान को छोड़कर विश्व के करीब करीब सभी देश चीन के खिलाफ हैं। भारत सरकार ने 59 चीनी एप्प्स पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। चीन में बनी वस्तुओं का बहिष्कार हो रहा है। प्रधान मंत्री ने आत्म निर्भर भारत के लिए स्वदेशी अपनाने, लोकल के लिए वोकल होने का नारा दिया है। लद्दाख की अग्रिम चौकी से चीन को साफ शब्दों में संदेश दे दिया है की देश की रक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। चीन का नाम लिए बगैर और इतिहास का हवाला देते हुए साफ शब्दों में बता दिया है कि उसके विस्तारवाद का अंत होगा या उसे मुड़ जाना होगा। यह भी कहा की पूरा लद्दाख भारत का मस्तक है। इशारा साफ है। सामरिक, आर्थिक और राजनयिक हर मोर्चे पर चीन को घेरने की कोशिश की जा रही है। चीन को भारत की और से ऐसे कदम की उम्मीद नहीं रही होगी। ऐसे समय में जबकि चीन भारत की प्रतिक्रिया से बौखलाया हुआ है, हमारे ही देश के कुछ नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी जिस तरह से व्यवहार कर रहे हैं वह हास्यास्पद और निंदनीय तो है ही, उनके इस तरह के व्यवहार से उनके एजेंडे का साफ पता चलता है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी जिसने कई दशकों तक शासन किया उसके पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा सदस्य राहुल गांधी प्रधान मंत्री से ऐसे बेहूदा सवाल करते हैं जिससे देश का मनोबल गिरता है या नहीं और सेना के शौर्य का अपमान होता हो या नहीं लेकिन उनकी  अपरिपक्व बुद्धि परिहास का विषय जरुर बन जाती है। देश की सुरक्षा से जुड़े सवाल जरुर करते है लेकिन सुरक्षा मामलों की संसदीय समिति की एक भी बैठक में शामिल नहीं होते ! यह जाहिर है कि अब उन्हे कोई गंभीरता से नहीं लेता, हाँ जो काम चीन या पाकिस्तान को करना चाहिए, ये खुद करके उनका काम जरुर आसान कर देते हैं। उनकी ऐसी ही हरकतें पाकिस्तान के साथ जुड़े मुद्दों पर भी होती है।

इधर वामपंथी व छद्म धर्मनिरपेक्षतवादी लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी अपने लेख व ब्लॉग में भारत के राजनैतिक नेतृत्व और रणनीतिकारों के सोच और समझ को अपरिपक्व बताते हुए सवाल खड़े करते हैं। उनकी भाषा चीन के ग्लोबल टाइम्स की भाषा लगती है। चीन की जी डी पी, उसकी सैन्य शक्ति, उसकी उन्नत टेक्नॉलजी की तुलना ग्लोबल टाइम्स द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के आधार पर भारत की जी डी पी, सैन्य शक्ति और टेक्नॉलजी से करते हैं।  आर्थिक मोर्चे पर चीन के विरुद्ध उठाए गए मामलों को देश की अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक मानते हैं। कोरोना काल के संकट को अवसर में बदलने की प्रधानमंत्री की सोच और मुहिम को रफ्तार देने की पहल को धीमा करने की सलाह देते हैं। भारत की सारी बुराइयों को गिनाते हुए चीन के उत्पादों विकल्प के तौर पर स्वदेशी उत्पादों के लिए आवश्यक संसाधन और कल पुर्जे स्थापित करने की कोशिश को असंभव प्रायः साबित करने की भरपूर दलील देते हुए आर्थिक मोर्चे पर उठाए गए कदमों को धीमा करने की सलाह देते हैं, जिससे की धीरे धीरे ये कदम कमजोर पड़ जाएं और चीन पर हमारी निर्भरता बनी रहे। आश्चर्य तो तब होता है जब चेतन भगत जैसे लेखक बताते हैं की चीनियों को सम्मान (फेस) बहुत प्रिय है और वे सलाह देते हैं कि भारत को चीन को अपने  फेस बचाने में साथ देकर बदले में द्विपक्षीय शांति प्राप्त करनी चाहिए। भारतीयों के टैक्स के पैसे से आईआईटी दिल्ली एवं आईआईएम अहमदाबाद से पढ़ने वाले, हॉँगकॉंग में इनवेस्टमेंट बैंकिंग में अनुभवी ये महान लेखक (?) अपने को चीन को समझने वाले सबसे बड़े जानकार मानते हैं, उनकी यह सलाह चीनी प्रॉपगंडा का ही खेल लगता है। (संदर्भ: जुलाई 4 को टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा गया ब्लॉग)। जबकि इसके उलट, उनसे उनके शिक्षा एवं अनुभव के आधार पर उम्मीद थी कि वे भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कुछ मौलिक सुझाव देते! इन सारे लोगों का एजेंडा यही है कि प्रधान मंत्री की आत्मनिर्भर भारत बनाने का सपना फेल हो जाए, चीन का दबदबा बना रहे, भारत कभी अपने पैरों पर खड़ा न हो सके और वह चीन का एक बाजार मात्र बनकर रह जाए। दरअसल चीन ने भारत में अपने एजेंडा चलाने के लिए हर उस मीडिया हाउस, एन जी ओ इत्यादि में इनवेस्टमेंट किया है जो हमेशा भारत की अस्मिता और  उसकी शक्ति को कमतर दिखाते हुए उसका मनोबल गिराने में लगा रहता है।

अब समय आ गया है कि चीन का एजेंडा चलाने वाले ऐसे तत्वों को बेनकाब किया जाए। सन 1962 के युद्ध के बाद से भारतीय सरकारें चीन के साथ ऐसे ही समझौते कर शान्ति उनके शर्तों पर ही हासिल करती रहीं हैं। भारत की नीति नियंताओं और सरकारों को लगता रहा है कि चीन सुपर पावर है और उससे अपनी शर्तों पर बॉर्डर पर शांति नहीं हासिल कर सकते। भारत की इस कमजोरी का फायदा चीन अपना विस्तारवादी एजेंडा बढ़ाने में उठाता रहा है। शुरु में मोदी जी ने भी दोस्ती का हाथ बढ़ाया। मोदी जी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम से चीनी कंपनियों ने सबसे ज्यादा फायदा उठाया लेकिन चीन ने उलटे पीठ पर छुरा भोंकने का काम किया। अब जब से मोदी जी की सरकार ने अपनी रणनीति बदली है, तब से चीन बौखलाया हुआ है। एक के बाद एक लगातार उठाए जा रहे कदमों से चीन को अब खतरा महसूस होने लगा है। चीन को अब भारत में उभरती हुई एशियाई शक्ति का एहसास होने लगा है।

आपदा को अवसर में बदलने के लिए प्रधानमंत्री का आत्मनिर्भर भारत का नारा जिसका मूलमंत्र स्वदेशी अपनाना और लोकल के लिए वोकल होना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गेम चेंजर साबित होगा। प्रधान मंत्री के संदेश में आत्मनिर्भरता और लोकल के लिए वोकल होने का मतलब देश, राज्य, जिला एवं पंचायत स्तर पर आत्मनिर्भर होना, जिसका मतलब है आवश्यक एवं जरूरी समान स्थानीय या आस पास में उपलब्ध हों। एक ऐसी अर्थव्यवस्था  जिसमें स्थानीय वस्तुओं का उपयोग बढ़ेगा और सूक्ष्म, लघु और माध्यम उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार का सृजन होगा, कामगारों का पलायन भी रुकेगा। इससे भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना  ररबन (रुरल +अर्बन) मिशन का सपना पूरा होगा। गावों में रोजगार का सृजन होगा तो वहाँ मूलभूत सुविधाएं भी विकसित होंगी। गाँव और शहर के बीच विकास की असमानता घटेगी। शहरों पर जनसंख्या का दवाब घटेगा जिससे पर्यावरण में संतुलन आएगा। भारत जैसी जनसंख्या वाले देश के लिए विकास का यह मॉडेल आदर्श होगा। इस दिशा में कार्य जितनी जल्दी और तेज गति से होगी, अर्थव्यवस्था उतनी ही जल्दी पटरी पर आएगी। वैसे भी चीन जैसे देश से, जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को धता बताता हो, जहाँ एक पार्टी का शासन हो, जहां का राष्ट्रपति अपने को मृत्युपर्यन्त अपने को राष्ट्राध्यक्ष घोषित कर चुका हो, पार्टी और सरकार का मुखिया एक हो, जहाँ न तो प्रेस की आजादी हो और न क्रियाकलापों में पारदर्शिता हो वैसे देश पर से निर्भरता जितनी जल्दी खत्म हो जाए उतना ही अच्छा।  चीन को लेकर आज तक हम जितनी गलतियाँ करते आये हैं और उनसे हमें जो सबक मिला उन्हे हमें कभी नहीं भूलना चाहिए।

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