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मिट्टी की खुशबू!

jls

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‘वाजितपुर’ गाँव का नाम आपने सुना ? कल ही सुना होगा न! कल वहां आए थे, मरिसस के राष्ट्रपति ‘राजकेश्वर पुर्र्याग’. उनके परदादा की भूमि है यह. आज से लगभग १५० साल पहले उनके पूर्वज ‘मारिसस’ चले गए थे, मिहनत मजदूरी करने. उनके मिहनत का ही फल है कि वे आज वहां के राष्ट्रपति हैं और अपने पूर्वजों की भूमि को प्रणाम करने आए हैं. यह कहते हुए उनके आँखों में आंसू आ गए. आगे उन्होंने कहा कि अपनी इसी मातृभूमि को तलाश करते हुए २५ साल पहले भी भारत आये थे. तब वे इस भूमि को नहीं खोज पाए थे. आज बिहार के मुख्यमंत्री के प्रयास से अपनी मातृभूमि को खोज पाए और उसे ‘नमन’ करने का मौका मिला!
बिहार के मुख्य मंत्री श्री नितीश कुमार ने कहा कि बिहार की मिट्टी में वह मेधाविता और मिहनत करने का जज्बा है कि यहाँ के लोग दुसरे देश में भी जाकर वहां काफी नाम कमा लेते हैं, यहाँ तक कि उस देश के राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री बन जाते हैं (मारिसस के प्रधान मंत्री नवीन चन्द्र रामगुलाम के पूर्वज भी बिहार मूल के थे). बुद्ध और महावीर, चन्द्रगुप्त और अशोक यहीं के थे. महात्मा गांधी की भी प्रथम कर्मभूमि बिहार का ‘चंपारण’ ही बना! डॉ. राजेंद्र प्रसाद और जय प्रकाश नारायण की यह भूमि सबके लिए सुलभ और शुभकारी है. अब अन्ना भी ३० जनवरी से पटना से ही लोकपाल का बिगुल फिर से फूंकने वाले हैं.
वाजितपुर, पुनपुन रेलवे स्टेसन से ६ किलोमीटर और पटना से लगभग २० किलोमीटर की दूरी पर है. यह वाजितपुर ही है, जहाँ हमने बचपन में दुर्गा जी की प्रतिमा और विजया दशमी का मेला देखा था. इसी मेले में जिलेबियां और कचौरियां खाई थी. बाबूजी ले जाते थे, हम लोगों को मेला घुमाने और खिलौने भी खरीद देते थे. उसी दुर्गा मैदान में श्री राकेश्वर पुर्र्याग और नितीश कुमार का स्वागत हुआ. मुझे सब कुछ याद हो आया. दुर्गा जी के विसर्जन के दिन गाँव के ही लोग लाठी और तलवार भांजते थे और हम लोग खूब मजा करते थे. भीड़ ज्यादा होने पर बाबूजी हमलोगों को कंधे पर बिठा लेते थे और हम लोग आराम से करतब देखते थे. यह ‘वाजितपुर’ हमारे गाँव ‘बसियावां’ से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है. वहीं पर हमारे गाँव के लोग अब भी ‘सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान’ से चीनी, मिट्टी का तेल आदि लेने जाते हैं.
कहते तो यह भी हैं कि ठाकरे परिवार भी बिहार मूल के ही हैं, पर ये बिहारियों को कोई भी गाली देने से परहेज नहीं करते!…. पर कभी कभी ऐसा होता है कि बेटा अपने बाप-दादा को नहीं पहचानता. कुछ लोग राज ठाकरे को मानसिक रूप से बीमार बतलाते हैं, इसलिए उनकी बातें बहकी बहकी होती हैं! यहाँ पर सबको बोलने की स्वतंत्रता मिली हुई है, इसलिए कुछ भी बोल सकते हैं … यह हमारे मौलिक अधिकार में है, पर उसमे भी सीमा बनी हुई है … ‘बाँटो और राज करो’ के सिद्धांत को माननेवाले तो यही करेंगे. हम भी ऐसा करेंगे क्या?…………

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