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कानून का तीसरा हाथ : निर्भीक, निर्लोभी, निष्पक्ष पत्रकारिता

जितेन्द्र माथुर

जितेन्द्र माथुर

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अदालत में खड़ी इंसाफ़ की देवी की आँखों पर पट्टी बंधी होती है, इसलिए वह हक़ीक़त को देख नहीं सकतीं। सिर्फ़ उन दो पलड़ों पर रखे गए सबूतों और काग़ज़ात के वज़न से यह जाँच सकती है कि कौन सा पलड़ा भारी है जिसके हक़ में उसे फ़ैसला देना है। इसीलिए कहा जाता है कि कानून अंधा होता है जो सच्चे-झूठे में फ़र्क़ नहीं कर सकता। ऐसे अंधे कानून की मदद के लिए सरकारी अमलदारी उसे दो हाथ मुहैया करवाती है। पहले हाथ का नाम है – ‘पुलिस’ और दूसरे हाथ का नाम है ‘वकील’। लेकिन इस अख़लाक़ से कोरे ज़माने में जब सब कुछ बिकाऊ है, अगर ये दोनों हाथ किसी अमीर और ताक़तवर ज़ालिम के हाथों बिक जाएं तो उनके बिना अपाहिज हो चुका कानून क्या करे ? ऐसे में इंसाफ़ की देवी इंसाफ़ किस बिना पर करे ?
और तब मज़लूम और कानून, दोनों की ही मदद के लिए मौजूद होना चाहिए एक तीसरा हाथ – कानून का तीसरा हाथ।  मुजरिमों से मिले हुए बेहिस हाकिमों के आगे बेबस अवाम की आवाज़ बनकर इंसाफ़ की देवी के कानों में हक़ीक़त फूंकता है यह तीसरा हाथ जिसे हिंदुस्तान में जम्हूरियत यानी लोकतंत्र का चौथा खंभा भी कहा जाता है। इसका नाम है प्रेस या अख़बारनवीसी या पत्रकारिता। पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस से पहले भी और उसके बाद भी अगर इस मुल्क में इंसाफ़ और इंसानियत का झंडाबरदार बनकर अगर कोई खड़ा हुआ है तो वह है प्रेस, जनता की आवाज़ बनकर अगर किसी ने हुकूमत को ललकारा है तो वह है प्रेस, आम लोगों के जानोमाल और हक़ूक़ की हिफ़ाज़त के लिए अगर किसी ने मुतवातर और बेहिसाब क़ुरबानियां दीं है तो वह है प्रेस।
कुछ साल पहले तक बड़ी इज़्ज़त हुआ करती थी प्रेस की लोगों की निगाहों में क्योंकि प्रेस की छवि ऐसी थी कि चाहे कोई बिक जाए, अपने उसूलों के पक्के अख़बार और अख़बारनवीस कभी नहीं बिक सकते। देश की आज़ादी के पहले के पत्रकारों में गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम एक प्रकाश स्तंभ की तरह है जिन्होंने क्रूर विदेशी शासन के होते हुए भी निर्भीक पत्रकारिता का ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत किया तथा साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के प्रयास में अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया। उस युग में निष्पक्ष एवं सत्यनिष्ठ पत्रकारिता के उदाहरण लोकमान्य तिलक एवं मोहनदास कर्मचंद गांधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं के माध्यम से भी जनता के समक्ष उपस्थित हुए। देश स्वतंत्र हुआ तो उसके उपरांत भी भारतीय प्रेस सत्ताधारियों अथवा धनिकों का चाटुकार नहीं बना। अतएव जनमानस में उसकी धवल छवि निष्कलंक ही बनी रही।
वह प्रेस ही रहा जिसने शोषण, दमन एवं अत्याचार के विरूद्ध निर्भय होकर स्वर उठाया एवं अपने सत्य के बल पर सत्ताधारियों को भी झुकने पर विवश किया। समाजकंटकों के हाथों न जाने कितने ही सत्य एवं न्याय के लिए संघर्ष करने वाले पत्रकारों ने अपने परिवार एवं जीवन तक बलिदान होने दिए किन्तु सत्य एवं न्याय को पराजित नहीं होने दिया । लुगदी साहित्य के उस युग में ऐसे आदर्शवादी पत्रकारों पर ढेरों कथाएं रची गईं एवं कई फ़िल्में भी बनाई गईं। उनकी तुलना समाज को सत्य का दर्शन करवाने वाली प्रज्वलित मशाल से की जाती थी जिसकी अग्नि में असत्य भस्म हो जाता था। न्याय के रक्षक चाहे जिसे अनदेखा कर देते, समाचार-पत्रों को अनदेखा नहीं कर सकते थे; चाहे जिसे अनसुना कर देते, चहुँओर गुंजायमान होती पत्रकारिता की ध्वनि को अनसुना नहीं कर सकते थे।
अख़बारनवीसों की कलम की ताक़त तलवारों और बंदूकों की ताक़त से ज़्यादा हुआ करती थी, इस बात को जिस तरह अंग्रेज़ी हुकूमत समझती थी, उसी तरह आज़ाद देश के नए हुक्मरान भी समझते थे। अज़ीम शायर अक़बर इलाहाबादी ने तो बहुत पहले ही कह दिया था –
                                                खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो
                                                जब तोप मुक़ाबिल हो, अख़बार निकालो
सत्तर के दशक के अंतिम वर्षों में पंजाब में जरनैलसिंह भिंडरांवाले की अगुवाई में आतंकवाद ने सर उठाया और एक-के-बाद-एक हिंसक वारदातें होने लगीं, निर्दोष मरने लगे, हरा-भरा पंजाब जलने लगा और उस आग की लपटें पंजाब के बाहर भी झुलस पैदा करने लगीं। आम लोगों की तो बात ही क्या की जाए, पुलिस अधिकारी तक उस आतंकवाद से सुरक्षित नहीं रहे (२५ अप्रैल, १९८३ को जालंधर रेंज के डी.आई.जी. पुलिस अवतार सिंह अटवाल की पवित्र स्वर्ण मंदिर की सीढ़ियों पर ही सरेआम हत्या कर दी गई थी)। हाल यह था कि चाहे केन्द्रीय सरकार हो या राज्य सरकार, हथियारबंद दहशतगर्दों के सामने हुकूमत बेबस लग रही थी।
लेकिन ऐसे में भी निडर पत्रकार अपने फ़र्ज़ से पीछे नहीं हटे थे। अलगाववादी हिंसक आंदोलन तथा उससे जुड़े आतंकवाद के विरूद्ध आवाज़ बुलंद करने वाले अख़बारों में प्रमुख था ‘पंजाब केसरी’ जो ‘हिंद समाचार-पत्र समूह’ से निकलने वाले अख़बारों में से एक था। इस समूह के मुखिया थे देश के कद्दावर पत्रकार लाला जगत नारायण। स्वतंत्रता सेनानी रह चुके वयोवृद्ध लालाजी की आवाज़ को भिंडरांवाले और उनका दल नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे। नतीजतन उन पर हमले शुरु हो गए। आख़िर नौ सितंबर उन्नीस सौ इक्यासी को लालाजी दहशतगर्दों की गोलियों के शिकार होकर शहीद हो गए। मगर …
मगर क्या उनकी शहादत के साथ ‘हिंद समाचार-पत्र समूह’ की निर्भीक पत्रकारिता ने चुप्पी साध ली ? नहीं ! पिता के न रहने पर पुत्र ने उनके आदर्शों के साथ उनके काम को संभाल लिया। लालाजी के ये पुत्र थे रमेश चंद्र। रमेश चंद्र ने ‘हिंद समाचार-पत्र समूह’ की कमान संभाली और पंजाब केसरी के सम्पादक के रूप में अपने स्वर्गीय पिता के छोड़े हुए काम को उन जैसी ही निडरता से आगे बढ़ाया। आख़िर अपने पिता की राह पर चलते हुए रमेश चंद्र पिता की ही तरह शहीद हो गए जब बारह मई उन्नीस सौ चौरासी को उनकी भी गोलियां मारकर हत्या कर दी गई।
उन दिनों हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकारों में सुरेन्द्र मोहन पाठक का सितारा बुलंदी पर था। अपने उपन्यासों में सुनील नामक एक आदर्शवादी पत्रकार को नायक के रूप में स्थापित करने वाले सुरेंद्र मोहन पाठक को संभवतः रमेश चंद्र की शहादत ने द्रवित किया जिससे प्रेरित होकर उन्होंने अपनी सुनील सीरीज़ के अंतर्गत ही पत्रकारिता के आदर्शों को चित्रित करने वाला हिंदी उपन्यास लिखा – ‘मैं बेगुनाह हूँ‘ जो कि उनके पत्रकार नायक सुनील का नब्बे वां कारनामा था।
मैं बेगुनाह हूँ‘ कहानी कहता है अपने ‘जनता जागृति दल’ की गतिविधियों द्वारा राजनगर नामक (काल्पनिक) महानगर की राजनीति को स्वच्छ करने का बीड़ा उठाए हुए एक उभरते हुए आदर्शवादी राजनेता सत्येन्द्र पाराशर को एक कैबरे नर्तकी नताशा की हत्या के झूठे आरोप में फँसा दिये जाने की जिसे निर्दोष प्रमाणित करता है आदर्शवादी पत्रकार सुनील जो ‘ब्लास्ट’ नामक एक राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र में नौकरी करता है। उसका सौभाग्य है कि इस समाचार-पत्र के मालिक तथा प्रधान संपादक श्री बी.के. मलिक स्वयं आदर्शवादी हैं तथा उसे मात्र अपना कर्मचारी न समझकर पुत्रवत् स्नेह करते हैं।
सरल हिंदी में लिखा गया ‘मैं बेगुनाह हूँ‘ न केवल रोचक है वरन प्रेरणास्पद भी है। रमेश चंद्र की शहादत के अतिरिक्त यह अन्य यथार्थ घटनाओं एवं तथ्यों से भी अपने आप को जोड़ता है। इसमें अपराधियों, राजनेताओं तथा व्यवसायियों के अनैतिक गठजोड़ को दर्शाया गया है जो इतना ताक़तवर हो जाता है कि अपने किसी भी विरोधी को बरबाद कर दे और ऐसी मिसाल बना दे कि फिर कोई और ऐसे गठजोड़ के ख़िलाफ़ सर उठाने की जुर्रत न कर सके। आज भी तो हालात ऐसे ही हैं जैसे तब (१९८४ में) थे जब यह उपन्यास छपा था। उपन्यास में सत्येन्द्र पाराशर को मूल रूप से फ़िल्म अभिनेता बताया गया है जो अभिनय से राजनीति में उतरता है तथा सफल हो जाता है। संभवतः इस संदर्भ में लेखक के समक्ष कुछ ही समय पूर्व लोकप्रिय तेलुगु अभिनेता एन.टी. रामाराव के तेलुगु देसम नामक राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ने तथा जीत लेने का उदाहरण था। लेकिन उपन्यास में सत्येन्द्र पाराशर का राजनीति को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने का संकल्प एवं इस निमित्त ‘जनता जागृति दल’ का गठन वस्तुत: लगभग तीन दशक के अंतराल के उपरांत अरविंद केजरीवाल की भ्रष्टाचार-विरोधी गतिविधियों एवं उनके द्वारा ‘आम आदमी पार्टी’ के गठन से बहुत समानता रखता है। इस संयोग को अद्भुत ही कहा जा सकता है ।
मैं बेगुनाह हूँ‘ का अधिकांश भाग सत्य के अनुयायी एवं आदर्शों को अपने जीवन एवं व्यक्तित्व में ढालने वाले पत्रकार सुनील की गतिविधियों का वर्णन करता है। उपन्यास के अंत में एक दुखद घटना घटती है जो पाठक के मन में एक टीस छोड़ जाती है। बहरहाल उपन्यास श्रेष्ठ है, पठनीय है, प्रेरक है और स्पष्ट शब्दों में रेखांकित करता है कि एक सच्चे पत्रकार का धर्म क्या होता है।

सुरेंद्र मोहन पाठक की तुलना में एक कम लोकप्रिय हिंदी उपन्यासकार ‘टाइगर’ के अनेक जासूसी उपन्यास नब्बे के दशक तथा इक्कीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में प्रकाशित हुए। ‘टाइगर ‘ लेखन के लिए उनका छद्म नाम था, उनका वास्तविक नाम (जैसा कि मुझे इंटरनेट से पता चला) जगदीश कुमार वर्मा है। उपन्यासों की व्यावसायिक सफलता निरंतर कम होती चली जाने के कारण अब उन्होंने उपन्यास लिखना छोड़ दिया है लेकिन उन्होंने जब तक लिखा, प्रायः श्रेष्ठ ही लिखा। मैंने उनके कई उपन्यास पढ़े जिन्हें मैंने अत्यंत रोचक ही नहीं, हृदयस्पर्शी भी पाया। ऐसा ही एक उपन्यास है – ‘कानून का तीसरा हाथ‘। मेरे इस लेख का शीर्षक इस उपन्यास के शीर्षक से ही लिया गया है जिसके लिए तथा कानून के दो पारंपरिक हाथों एवं तीसरे अ-पारंपरिक हाथ संबंधी ज्ञान की प्राप्ति के लिए मैं लेखक का आभारी हूँ।
कानून का तीसरा हाथ‘ एक बेहतरीन सस्पेंस-थ्रिलर है जिसमें रहस्य को अंतिम पृष्ठों तक बनाए रखने में लेखक सफल रहा है। घटनाएं बहुत तेज़ी से घटती हैं और पढ़ने वाले के हाथ से पुस्तक तब तक नहीं छूट सकती जब तक वह उसे पूरा न पढ़ ले। पाठक को आदि से अंत तक बाँधे रखने वाला यह उपन्यास निश्चय ही प्रशंसनीय है। कथानक आरंभ होता है दर्शना नामक एक साधारण गृहिणी की हत्या से जो विनोद कोठारी नामक धनी व्यवसायी के घर में नौकरानी का कार्य करती है। शक़ की सुई मुड़ती है विनोद कोठारी की ओर लेकिन उसे मोनिका सान्याल नामक एक चालाक वकील पैसे की ताक़त और अपनी तिकड़मों से बचाकर मरने वाली के पति को ही इस आरोप में फँसा देती है। ईमानदार न्यायाधीश कामताप्रसाद द्वारा साक्ष्यों के आधार पर उसके विरूद्ध निर्णय दे दिए जाने पर जब वह उनके समक्ष अपनी निर्दोषिता एवं उनके द्वारा अनुचित निर्णय दिए जाने की बात करता है तो व्यवस्था के कारण हुई अपनी भूल को व्यवस्था के माध्यम से ही सुधारने के लिए कामताप्रसाद इस सारे प्रकरण में लेकर आते हैं कानून के तीसरे हाथ अर्थात् प्रेस को। वे अपने पत्रकार मित्र से (जो कि एक प्रसिद्ध समाचार-पत्र का स्वामी है) आग्रह करते हैं कि इस हत्याकांड का गहन अण्वेषण करवाए तथा सत्य को प्रकट करे। उसके उपरांत जो होता है, वही ‘कानून का तीसरा हाथ‘ का मुख्य भाग है जो पाठक को एक अत्यंत रहस्य तथा रोमांच से युक्त यात्रा करवाने के पश्चात् वास्तविकता को अनावृत करता है।
मुझे ऐसा लगता है कि ‘कानून का तीसरा हाथ‘ को ही ‘कानून नहीं बिकने दूंगा‘ के नाम से भी प्रकाशित किया गया था। बहरहाल इस उपन्यास की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है। किसी बॉलीवुड सस्पेंस फ़िल्म की तरह ही मनोरंजक इस उपन्यास में हास्य भी पिरोया गया है लेकिन उपन्यास के मूल उद्देश्य के साथ कोई समझौता नहीं किया गया है, न ही कथानक को कहीं भटकने दिया गया है। लेखक ने उपन्यास को उन शहीदों को सादर समर्पित किया है जिन्होंने एक पत्रकार बनकर ईमानदारी से देश और समाज की सेवा की। जिन्होंने हर चुनौती का डटकर मुक़ाबला किया तथा अंत में अपने फ़र्ज़ पर क़ुरबान हो गए। उपन्यास में चमनलाल नामक एक सत्यनिष्ठ पत्रकार के बलिदान के माध्यम से इस बात को भलीभांति स्थापित किया गया है कि सच्ची पत्रकारिता वास्तव में क्या होती है। लेखक ने उपन्यास के प्रथम पृष्ठ पर ही उपन्यास के परिचय के रूप में लिख दिया है – ‘जब कानून के दोनों हाथ अपना फ़र्ज़ भूलकर टके-टके में बिकने लगते हैं तो उन्हें सबक सिखाने के लिए कानून के तीसरे हाथ को हरकत में आना ही पड़ता है’।
मेरे इस लेख का उद्देश्य केवल इन दोनों हिंदी उपन्यासों की समीक्षा करना या इन्हें पढ़ने की अनुशंसा करना नहीं है बल्कि आज निर्भीक, निर्लोभी, निष्पक्ष पत्रकारिता की पुनर्स्थापना की आवश्यकता पर बल देना भी है। टी.वी. और इंटरनेट के इस ज़माने में पत्रकारिता शब्द ही कहीं सुनाई नहीं देता, केवल ‘मीडिया’ शब्द सुनाई देता है – मीडिया जो बहुत ताक़तवर है, जो किसी को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है लेकिन… लेकिन जो बिक गया मालूम होता है, जो तोते की तरह उनकी बोली बोलता है जो उसका दाम दे चुके हैं; जो आज़ाद नहीं रहा, हुकूमत की मशीन का पुरज़ा बन गया है, हुक्मरानों के पैर की जूती बन गया है । ऐसे में ज़ुल्मोसितम से पिसते अवाम की आवाज़ कौन बनेगा ? कानून के दो हाथ तो कभी के बिक चुके हैं, यह तीसरा हाथ भी न बचा तो कानून केवल एक झाँसा बनकर रह जाएगा, इंसाफ़ महज़ एक ढोंग बनकर रह जाएगा । कानून के इस तीसरे हाथ को बचाइए वरना न कानून बचेगा, न मुल्क, न इंसानियत ।
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