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बंद हुआ लंचबॉक्स ! थम गया कारवां !

जितेन्द्र माथुर

जितेन्द्र माथुर

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इरफ़ान नहीं रहे । अभी उम्र ही क्या थी उनकी ? केवल तिरेपन साल ! और छोड़ गए वे इस दुनिया को, अपने चाहने वालों को । उनके देहावसान के उपरांत ही मैंने जाना कि वे मूल रूप से राजस्थान में टोंक के रहने वाले थे अन्यथा इन बातों की ओर ध्यान ही क्या जाता और क्यों जाता ? हम तो रजतपट पर उनका अद्वितीय अभिनय देखकर ही मंत्रमुग्ध हो जाते थे । उनके जाने के बाद किसी ने यूट्यूब पर रजत शर्मा द्वारा निर्मित ‘आपकी अदालत‘ में उनसे संबंधित एपीसोड को अपलोड किया तो मैंने देखा कि उन्होंने किस आत्मविश्वास के साथ उस कार्यक्रम में किए गए प्रश्नों के उत्तर दिए थे और कथित अदालत में ख़ुद पर चले मुक़दमे का सामना पूरी ज़िंदादिली के साथ किया था । उनके जवाबों से ही मैंने उनकी अभिनय के प्रति लगन को जाना और पाया कि जो संदेश राजकुमार हिरानी की फ़िल्म ‘थ्री इडियट्स‘ में दिया गया था – अपनी धुन (पैशन) को ही जीवन में ढाल देने का, उस पर इरफ़ान ने बरसों पहले ही अमल कर लिया था और जयपुर के राजस्थान कॉलेज में अध्ययन करते-करते राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) में प्रवेश लेने तथा कलाकार बनने की ठान ली थी ।

मेरे प्रिय उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने अपनी अत्यंत लोकप्रिय सुनील सीरीज़ के पिछले उपन्यास ‘कॉनमैन‘ में एक पात्र के माध्यम से इरफ़ान की इस बात के लिए प्रशंसा की है कि उन्होंने अपने नाम में से इरफ़ान को छोड़कर बाकी भाग इसलिए निकाल दिया था क्योंकि वे जाति एवं धर्म पर आधारित पहचान और भेदभाव में विश्वास नहीं करते थे । मैंने जब उनके देहान्त (उनतीस अप्रैल दो हज़ार बीस) के उपरांत जब  ‘आपकी अदालत‘ में उन पर रजत शर्मा द्वारा चलाए गए मुक़दमे को यूट्यूब पर देखा तो न केवल इस तथ्य की पुष्टि हुई बल्कि उनकी यह बात मानो मुझे अपने ही विचारों की प्रतिध्वनि लगी कि विभिन्न फ़ॉर्मों में ‘धर्म‘ संबंधी कॉलम रखा ही क्यों जाता है जो कि पूरी तरह अनावश्यक है तथा फ़ॉर्म भरने वाले को यह स्मरण करवाता है कि वह किसी विशिष्ट धर्म का सदस्य है तथा इस पहचान के बिना व्यावहारिक संसार में उसका काम नहीं चलने वाला । मैं स्वयं यही कहता हूँ कि विभिन्न आवश्यक प्रारूपों या फ़ॉर्मों में ‘धर्म‘ संबंधी कॉलम को हटा दिया जाना चाहिए तथा प्रत्येक नागरिक को केवल एक मनुष्य के रूप में मानवता व संवेदनशीलता को ही अपना धर्म मानने की छूट होनी चाहिए । ‘धर्म‘ का कॉलम भरवाकर हम निर्दोष बालकों के मन में भेदभाव का भाव भर देते हैं, उन्हें ‘हम‘ और ‘वे‘ की बाँटने वाली अवधारणा से परिचित करवाते हैं जिसमें भावी सामाजिक विभाजन तथा वैमनस्य के बीज छुपे होते हैं । मैं चाहता हूँँ कि यही सिद्धांत जाति के कॉलम पर भी लागू किया जाए लेकिन हमारे भाग्य-विधाताओं ने आरक्षण के द्वारा समाज को खंड-खंड करने का ठेका ले रखा है, अतः जाति नहीं तो श्रेणी (सामान्य तथा विभिन्न आरक्षित वर्ग) का कॉलम तो अनंत काल तक सभी छोटे-बड़े (सरकारी) प्रारूपों में रहेगा ही ।

बहरहाल बात इरफ़ान की हो रही थी जो कि जन्म से मुस्लिम थे लेकिन हृदय से एक संपूर्ण मानव, जाति-धर्म की दीवारों से ऊपर एक संवेदनशील मनुष्य, एक सच्चा भारतीय नागरिक, एक वास्तविक कलाकार जो इन बाँटने वाली बातों से परे केवल कला के प्रति समर्पित था । एन.एस.डी. से अभिनय की शिक्षा लेने के उपरांत इरफ़ान ने इक्कीस वर्ष की आयु में मीरा नायर की फ़िल्म ‘सलाम बॉम्बे‘ (१९८८) में एक पलक झपकने जैसी भूमिका से अपनी कला-यात्रा आरंभ की । इससे पूर्व कि यह प्रतिभाशाली कलाकार छोटी-मोटी भूमिकाओं में कहीं खो जाता, भारत में केबल टी.वी. के अवतरण ने इरफ़ान के लिए टी.वी. धारावाहिकों में नवीन अवसर उत्पन्न किए । उन्होंने रूसी नाटककार मिखाइल शात्रोव के नाटक ‘लाल घास पर नीले घोड़े‘ में लेनिन की भूमिका निभाकर दर्शकों तथा समीक्षकों का ध्यान अपनी ओर खींचा तथा उसके बाद ‘भारत एक खोज‘, ‘चाणक्य‘, ‘कहकशां‘ आदि कई टी.वी. धारावाहिकों में दिखाई दिए । बाबू देवकीनंदन खत्री के कालजयी उपन्यास ‘चन्द्रकांता‘ पर आधारित नीरजा गुलेरी के इसी नाम वाले धारावाहिक में उनके बद्रीनाथ के चरित्र को इस धारावाहिक को देखने वाला कौनसा दर्शक भूल सकता है ? लेकिन जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मेरी नज़र में इरफ़ान आए ज़ी टी.वी. पर नब्बे के दशक के मध्य में प्रसारित अत्यन्त लोकप्रिय धारावाहिक ‘बनेगी अपनी बात‘ से जिसके निर्माता थे टोनी एवं दीया सिंह ।‘बनेगी अपनी बात‘ में इरफ़ान ने एक युवा लड़के के पिता की भूमिका की थी जबकि उस समय उनकी अपनी आयु छब्बीस-सत्ताईस वर्ष से अधिक नहीं थी । लेकिन अपने मुख पर चरित्र के अनुरूप जो प्रौढ़ता उन्होंने दर्शाई थी, वह अद्भुत थी । धारावाहिक देखते समय मुझे कभी लगा ही नहीं कि यह भूमिका कोई नवयुवक ही निभा रहा है । इसमें कोई मेकअप का कमाल नहीं था । यह कमाल इरफ़ान की कला का था जिससे वे निभाए जा रहे चरित्र को स्वयं में आत्मसात् कर लेते थे । उनकी संवाद अदायगी ने भी उन दिनों मेरा ध्यान खींचा था । पर तब मैं नहीं जानता था कि छोटे परदे का यह अभिनेता एक दिन भारतीय रजतपट के सर्वकालीन श्रेष्ठ कलाकारों की सूची में अपना नाम सम्मिलित करवाएगा ।

इरफ़ान जब जहाँ जैसी मिल जाए, छोटी और कम महत्व की ही सही, भूमिकाएं करते हुए अपने सही समय की प्रतीक्षा करते रहे । और उनका समय आया ब्रिटिश फ़िल्मकार आसिफ़ कपाड़िया की फ़िल्म ‘द वॉरियर‘ (२००१) से । कई पुरस्कार जीतने वाली इस फ़िल्म में निभाई गई योद्धा की शीर्षक भूमिका ने इरफ़ान के करियर को वो उछाल दिया जिसके वे हमेशा से हक़दार थे । फिर इरफ़ान ने पीछे मुड़कर नहीं देखा । मुझे उन्होंने भट्ट कैम्प की फ़िल्म ‘कसूर‘ (२००१) में सरकारी वकील की भूमिका में प्रभावित किया तो समीक्षकों को भट्ट कैम्प की ही फ़िल्म ‘गुनाह‘ (२००२) में खलनायक की की भूमिका में अपने प्रभावशाली अभिनय के कसीदे पढ़ने पर विवश कर दिया । निर्देशक के रूप में तिग्मांशु धूलिया की प्रथम फ़िल्म ‘हासिल‘ (२००३) में उनके अभिनय को चौतरफ़ा वाहवाही हासिल हुई और इस फ़िल्म को उनकी अभिनय-यात्रा में मील का पत्थर माना जा सकता है । संगीतकार से निर्माता-निर्देशक-लेखक बने विशाल भारद्वाज की विलियम शेक्सपियर के अमर नाटक ‘मैकबेथ‘ पर आधारित फ़िल्म ‘मक़बूल‘ (२००४) ने यह सिद्ध कर दिया कि इरफ़ान किसी भी भूमिका में प्राण फूंक सकते थे तथा कठिन-से-कठिन भूमिका को अपने लिए सरल बना लेना उनके लिए सहज संभव था । इरफ़ान द्वारा अपनी लगन एवं परिश्रम से अर्जित इन उपलब्धियों का परिणाम यह निकला कि भट्ट कैम्प ने  अपनी सस्पेंस-थ्रिलर  फ़िल्म ‘रोग‘ (२००५) में इस साधारण चेहरे-मोहरे वाले कलाकार को नायक की भूमिका दी जिसमें उनकी नायिका बनीं अफ़्रीकी अभिनेत्री इलने हैमन । अनुराग बसु की फ़िल्म ‘लाइफ़ इन ए मेट्रो‘ (२००७) में उन्होंने कॉमेडी को भी सहजता से किया तो भट्ट कैम्प की फ़िल्म ‘द किलर‘ (२००६) में अपने अभिनय के विविध रंग बिखेर कर अपने दम पर ही उस फ़िल्म को दर्शनीय बना डाला । झुम्पा लाहिड़ी के उपन्यास पर मीरा नायर द्वारा बनाई गई बहुप्रशंसित फ़िल्म  ‘द नेमसेक‘ (२००७) में किए गए अभिनय के लिए भी बहुत-सी तारीफ़ इरफ़ान की झोली में आई ।

इरफ़ान की कला-सरिता ऑस्कर विजेता फ़िल्म ‘स्लमडॉग मिलियनेअर‘ (२००८), मुम्बई मेरी जान (२००८), न्यू यॉर्क (२००९), बिल्लू (२००९), राइट या रांग (२०१०), सात ख़ून माफ़ (२०११), लाइफ़ ऑव पाई (२०१२), डी-डे (२०१३), साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स (२०१३), द लंचबॉक्स (२०१३), गुंडे (२०१४), पीकू (२०१५), तलवार (२०१५), जज़्बा (२०१५),  मदारी (२०१६), हिंदी मीडियम (२०१७), कारवां (२०१८) आदि अनेक कूलों को स्पर्श करती हुई कला-प्रेमियों के मन और आत्मा को तृप्त करती हुई चलती रही और अंग्रेज़ी मीडियम (२०२०) तक पहुँची । ‘पान सिंह तोमर‘  (२०१२) में निभाई गई शीर्षक भूमिका के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता ।

इरफ़ान नामचीन सितारों के साथ काम करते हुए भी सदा सहज रहे चाहे वे शाहरुख़ ख़ान हों (बिल्लू) या जूही चावला (साढ़े सात फेरे) या जॉन अब्राहम (न्यू यॉर्क) या सनी देओल (राइट या रांग) या प्रियंका चोपड़ा (सात ख़ून माफ़ व गुंडे) या ऋषि कपूर (डी‌-डे) या अमिताभ बच्चन व दीपिका पादुकोण (पीकू) या ऐश्वर्य राय (जज़्बा) । उन्होंने किसी भी सितारे को स्वयं पर हावी नहीं होने दिया और अपनी भूमिका का महत्व तथा फ़िल्म में अपनी पहचान बनाए रखी ।

इरफ़ान की जो फ़िल्में मेरे हृदय पर अमिट छाप छोड़ गईं, वे हैं – द लंचबॉक्स, पीकू और कारवां । इनमें पीकू और कारवां में उनकी भूमिकाएं मिलती-जुलती ही थीं । इनमें वे फ़िल्म के मुख्य पात्रों को अपने वाहन में लंबी सड़क यात्रा करवाने वाले मस्तमौला ड्राइवर बने थे जो अपनी ज़िंदादिली से फ़िल्म के पात्रों की जीवन की कुछ लुकी-छुपी सच्चाइयों से पहचान करवाता है और उनके इस सफ़र को उनकी ज़िन्दगी के सफ़र से कुछ इस तरह जोड़ देता है कि उनकी ज़िन्दगी फिर पहले जैसी नहीं रहती । कारवां ऐसी ही फ़िल्म है जिसका कारवां फ़िल्म की कहानी में अपनी मंज़िल तक पहुँच गया लेकिन फ़िल्म के दर्शकों के साथ वह फिर भी जारी रहा । वाहन-चालक इरफ़ान से ज़िन्दगी की तमाम दुश्वारियों के बीच अपने हास्य-बोध को संभाले रखने का हुनर सीखा फ़िल्म को देखने वालों ने । और कुछ-कुछ ऐसा ही सबक सीखा पीकू फ़िल्म की नायिका ने अपने आगे के जीवन के लिए जब उसके पिता संसार से चले गए लेकिन वाहन-चालक इरफ़ान के रूप में उसे एक मित्र मिल गया ।

द लंचबॉक्स एक अद्भुत फ़िल्म है जिसकी तुलना साधारण फ़िल्मों से की ही नहीं जा सकती । उम्रदराज़  इरफ़ान खाने के डिब्बे के माध्यम से एक उपेक्षित गृहिणी (निमरत कौर) के संपर्क में आते हैं और वही डिब्बा पत्रों के माध्यम से भावनाओं तथा विचारों का आदान-प्रदान करवाता है जिससे एकदूसरे को देखे बिना ही दो अनजान व्यक्ति मानसिक रूप से निकट आ जाते हैं । इस फ़िल्म में अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त होने जा रहे साजन फ़र्नांडीस की भूमिका में इरफ़ान ने कमाल किया है जो नायिका इला (निमरत कौर) द्वारा हिंदी में लिखे गए पत्रों का उत्तर अंग्रेज़ी में देता है तथा धीरे-धीरे उसके हृदय में स्थान बना लेता है । प्रेम की एक नवीन परिभाषा गढ़ने वाली इस कथा को देखना ही अपने आप में एक अविस्मरणीय अनुभव है ।

इरफ़ान यदि स्वाभाविक रूप से एक दीर्घ जीवन जीते तो वे ऐसी न जाने कितनी ही और सौगातें कला-प्रेमियों के लिए सृजित कर जाते । पर कुदरत को कुछ और ही मंज़ूर था । वे चले गए – हमें और इस दुनिया को छोड़कर । लंचबॉक्स बंद हो गया है लेकिन उसमें से आने वाली महक फ़िज़ा में घुल चुकी है । कारवां थम गया है लेकिन अपने सफ़र की ढेरों यादें उसने रख छोड़ी हैं उनके लिए जिन्हें आने वाले वक़्त में नए कारवां बनाकर नए सफ़र करने हैं ।

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डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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