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पति-पत्नी का आपसी विश्वास और शोबिज़ की चकाचौंध के पीछे का सच (पुस्तक-समीक्षा – साज़िश)

जितेन्द्र माथुर
जितेन्द्र माथुर
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प्रसिद्ध हिन्दी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने ऐसे कई उपन्यास लिखे हैं जिनको उनकी बेहतरीन कहानी और प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण के बावजूद समुचित प्रशंसा नहीं मिली, वो तारीफ़ वो वाहवाही नहीं मिली जिसके वे हक़दार हैं । ऐसा ही एक उपन्यास है ‘साज़िश’ जो उनके द्वारा रचित थ्रिलर उपन्यासों की श्रेणी में आता है ।
जिन दिनों ‘साज़िश’ प्रकाशित हुआ था, यानी दिसंबर 1999 में, उन्हीं दिनों मेरी नौकरी महाराष्ट्र में स्थित तारापुर परमाणु बिजलीघर में लग गई और मैं वहाँ जा पहुँचा जहाँ कॉलोनी से कुछ ही दूर ‘चित्रालय’ नामक बाज़ार में एक पुस्तकें किराए पर देने वाला अपना कारोबार चलाता था । मैं उससे सुरेन्द्र मोहन पाठक के पुराने उपन्यास किराए पर ला-लाकर पढ़ने लगा । जनवरी 2000 में उसके पास जब मैंने नया उपन्यास ‘साज़िश’ देखा तो उसे किराए पर लेने की जगह मैंने उस नई प्रति को उसकी पूरी कीमत देकर ख़रीद ही लिया और रात को हमेशा की भांति अपने क्वार्टर में उसे एक ही बैठक में पढ़कर समाप्त किया । वह प्रति एक दशक से भी ज़्यादा समय तक मेरे पास रही और मैं गाहे-बगाहे उसे बार-बार तब तक पढ़ता रहा जब तक कि मेरी नादानी से वह मेरे पास से चली नहीं गई ।

saazish

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने ‘साज़िश’ के लेखकीय में लिखा था कि उन्होंने यह उपन्यास अपनी विभिन्न सीरीज़ अर्थात् सुनील, विमल, सुधीर और थ्रिलर के उपन्यासों की एक नियमित रोटेशन बनाने की कोशिश में लिखा था । बहरहाल चाहे कैसे भी लिखा हो, बिना किसी शोरगुल और पूर्वापेक्षा के एकाएक आया यह उपन्यास एक निहायत ही उम्दा थ्रिलर है जिसे अपनी मुनासिब तारीफ़ नसीब नहीं हुई ।
‘साज़िश’ एक बेदाग़ उपन्यास है जिसमें लाख ढूंढने पर भी कोई खामी निकालना मुमकिन नहीं लगता । जहाँ तक खूबियों का सवाल है, यह उपन्यास बेशुमार खूबियों का मालिक है । पाठक साहब ने ख़ुद एक बार फ़रमाया है कि उनके बहुत से उपन्यास केवल इसलिए जासूसी उपन्यास कहलाते हैं क्योंकि उन पर जासूसी उपन्यासकार का ठप्पा लगा हुआ है वरना उनके ऐसे कई उपन्यास हैं जिनको सहज ही सामाजिक उपन्यासों की श्रेणी में रखा जा सकता है । ‘साज़िश’ भी एक ऐसा ही उपन्यास है जिसे आप चाहें तो जासूसी उपन्यास मान लें और चाहें तो सामाजिक उपन्यास मान लें ।
‘साज़िश’ कहानी है अनिल पवार नाम के एक युवक की जो लोनावला स्थित एक कारखाने में इंडस्ट्रियल केमिस्ट की नौकरी करता है । उसका वर्तमान एम्पलॉयर अविनाश जोशी कुछ अरसा पहले उसे पूना से वहाँ लेकर आया था । आने के बाद उसकी मुलाक़ात बिना माँ-बाप की दो बेटियों – मुग्धा पाटिल और नोनिता पाटिल से हुई थी जिसमें से छोटी बहन मुग्धा से उसने विवाह कर लिया । इन दोनों बहनों का एक बुआ के अतिरिक्त कोई और रिश्तेदार नहीं है । मुग्धा को विवाह से पहले दौरे पड़ते बताए जाते थे । इस बात की रू में मुग्धा के साथ-साथ अनिल की साली नोनिता भी मानो मुग्धा के दहेज में उसके घर चली आई थी ताकि वो मुग्धा की देखभाल कर सके । शादी के बाद अब अनिल की समस्या यह हो गई कि उसकी आमदनी के मुक़ाबले उसकी बीवी और साली का रहन-सहन बहुत खर्चीला था । ‘तेते पाँव पसारिए जेती लांबी सौर’ वाली कहावत में उन दोनों बहनों का कोई यकीन नहीं था और उनके पाँव सदा अनिल की आमदनी की चादर के बाहर ही पसरे रहते थे ।
‘साज़िश’ का श्रीगणेश एक तूफ़ानी रात को होता है जब अनिल एक जुए की फड़ में रमा हुआ है और पीछे से उसकी बीवी यानि मुग्धा और साली यानि नोनिता उसके घर से रहस्यमय ढंग से गायब हो जाती हैं । अब क्या अनिल का एम्पलॉयर अविनाश जोशी, क्या स्थानीय पुलिस चौकी का इंचार्ज मुंडे और क्या उसका पड़ोसी दशरथ राजे; सबकी एक ही राय है कि अनिल की मौजूदा पतली माली हालत के मद्देनज़र उसकी बीवी और साली उसे छोड़कर अपने यारों के साथ भाग गई हैं । लेकिन अनिल को सूरत-अ-हवाल की यह तर्जुमानी मंज़ूर नहीं क्योंकि उसे अपनी बीवी के प्यार पर अटूट विश्वास है और वह किसी सूरत में यह कबूल नहीं कर सकता कि उसकी बीवी उसे छोड़कर किसी ग़ैर के पास चली गई है । तड़पकर वह अपनी बीवी की तलाश में निकलता है । उसके पास पैसा नहीं है लेकिन वह कुछ उधार अपने मेहरबान पड़ोसी दशरथ राजे से लेता है और कुछ पैसा उसे छुट्टियों के साथ-साथ उसका एम्पलॉयर अविनाश जोशी देता है । उसे पता चलता है कि उसके उनकी ज़िंदगी में पैबस्त होने से पहले दोनों बहनें फ़िल्म अभिनेत्रियां बनने के लिए घर से भागकर मुंबई चली गई थीं । इसलिए वह अपनी तलाश मुंबई से ही शुरू करने का फ़ैसला करता है । दोनों बहनों के गायब होने के रहस्य की परत-दर-परत उधेड़ता हुआ अनिल आख़िर सच्चाई की तह तक कैसे पहुँचता है, यही ‘साज़िश’ का मुख्य भाग है । अनिल की यह तलाश इतनी दिलचस्प और पाठकों को बांधकर रखने वाली है कि पढ़ने वाले के लिए इस उपन्यास को इसके आख़िरी सफ़े तक मुक़म्मल पढ़े बिना बीच में छोड़ना तक़रीबन नामुमकिन है । केवल छः दिनों के घटनाक्रम पर आधारित यह उपन्यास तेज़ रफ़्तार है और साहित्य के सभी रसों को अपने में समेटे हुए हैं ।

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सुरेन्द्र मोहन पाठक ने यह बात अपने कई उपन्यासों में रेखांकित की है कि पति-पत्नी का संबंध विश्वास पर आधारित होता है जिसमें कोई दुई का भेद नहीं होना चाहिए, कोई छुपाव नहीं होना चाहिए । अगर दोनों के बीच भरोसा ही नहीं  है तो इस नाजुक रिश्ते को नहीं निभाया जा सकता । उनके कई उपन्यास इसी थीम पर हैं । ‘साज़िश’ भी इसी श्रेणी में आता है लेकिन कथावस्तु और परिवेश के हिसाब से यह अपने आप में एक बिलकुल अलग तरह का उपन्यास है जिसकी तुलना किसी और उपन्यास से नहीं की जा सकती ।
उपन्यास का नायक अनिल आधे-अधूरे तथ्यों और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर अपनी बीवी पर कोई तोहमत थोपने को तैयार नहीं । इसीलिए वह हक़ीक़त का पता ख़ुद लगाना चाहता है और जो कुछ हुआ है या हुआ था, उसकी बाबत अपनी बीवी का बयान उसकी जुबानी जानना चाहता है । वह ऐसा खाविंद है जो अपनी बीवी पर शक़ नहीं, एतबार करता है । मियां-बीवी का रिश्ता ऐसा ही होना चाहिए । ‘साज़िश’ की कहानी प्रथम पुरुष में है और इसीलिए वह अनिल के साथ-साथ चलती है । उपन्यास पढ़ने वाला उतना ही जानता है जितना कि इस कहानी का नायक अनिल जानता है । अतः उपन्यास पढ़ते समय पाठक अनिल के साथ मानसिक रूप से जुड़ा रहता है ।
‘साज़िश’ में लेखक ने लगभग सभी किरदारों को अपने आप उभरने और अपनी छाप छोड़ने का पूरा मौका दिया है । कथानायक अनिल ही नहीं, अन्य किरदार जो कि सहायक चरित्र ही कहे जा सकते हैं, भी कथानक के फ़लक पर  अपना अलग वजूद बरकरार रखते हैं और पाठकों पर अपना विशिष्ट प्रभाव छोड़ते हैं । जो किरदार दिखाए भी नहीं गए हैं, जिनका महज़ ज़िक्र  किया गया है, वे भी अपनी अलग पहचान रखते हैं और पाठक उन्हें बड़ी आसानी से विज़ुअलाइज़ कर सकता है, उनके अक्स को अपने ज़हन पर उतार सकता है ।
लेखक ने अखिलेश भौमिक नाम के एक विलक्षण चरित्र के माध्यम से पाठकों को हास्य-रस की भरपूर ख़ुराक  दी है । अखिलेश भौमिक एक निर्देशक है जो मूल रूप से तो थिएटर में खेले जाने वाले नाटकों का निर्देशन करता है लेकिन अब वह ‘कौन किसकी बांहों में’ नाम का टी॰वी॰ धारावाहिक बनाने की फ़िराक़ में है बशर्ते कि उसे कोई उसमें धन लगाने वाला मिल जाए । वह अल्कोहलिक है और अपने दफ़्तर में बैठे-बैठे भी पीता रहता है । उसकी और अनिल की मुलाक़ात पाठकों को हँसा-हँसा कर लोटपोट कर देने में कोई कसर नहीं छोड़ती । इस किरदार और कुछ अन्य किरदारों के माध्यम से पाठक साहब ने शोबिज़  की चमक-दमक के पीछे की सच्चाईयों को उजागर किया है जो कि इस दुनिया में घुसने के ख़्वाहिशमंद नौजवानों के लिए एक सबक है ।
‘साज़िश’ में लेखक ने औरत-मर्द के प्यार के दो बिलकुल जुदा पहलू पेश किए हैं । एक पहलू यह है कि अगर मोहब्बत को उसका सिला न मिले, अगर उसे लगातार ठुकराया जाए और दूसरे द्वारा बार-बार अपमानित किया जाए तो वह नफ़रत में भी बदल सकती है । लेकिन दूसरी ओर मोहब्बत का एक पहलू यह भी है कि सच्चा आशिक़ अपने महबूब के लिए अपनी जान तक दे सकता है । लेखक ने प्रेम के इस दूसरे रूप को जो कि उदात्त है, पवित्र है, बलिदानी है; उपन्यास के अंत में प्रस्तुत किया है और साथ-साथ यह बात भी रेखांकित की है कि जुर्म में शरीक़ होने वाला भी बुनियादी तौर पर एक नेक इंसान हो सकता है । उपन्यास की अंतिम पंक्ति में इसके मुख्य किरदार भारी कदमों से बाहर निकलते हैं और इसे पढ़ने वाला भी अंतिम पंक्ति पढ़कर भारी मन से ही पुस्तक को बंद करता है ।
‘साज़िश’ पाठकों को कैसा लगा, इस बात का ज़िक्र कभी कहीं नहीं आया और यह हर नुक़्तानिगाह से इस असाधारण ख्याति प्राप्त लेखक का एक लो-प्रोफ़ाइल उपन्यास ही साबित हुआ । लेकिन चर्चित हिंदी उपन्यासकार की इस कम चर्चित कृति की गुणवत्ता बहुत ऊंची है और मैं इसे लेखक के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में शुमार करता हूँ ।

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