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कामयाबी और नाकामयाबी को कैसे संभालें ?

जितेन्द्र माथुर
जितेन्द्र माथुर
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६३ वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों की घोषणा हो गई है जिनमें हिमाचल प्रदेश के एक छोटे-से कस्बे से आने वाली तथा बिना किसी फ़िल्मी पृष्ठभूमि के केवल अपने साहस, आत्मविश्वास और पुरुषार्थ से फ़िल्मोद्योग में सफलता और सम्मान पाने वाली कंगना रानाउत ने सभी को चमत्कृत करते हुए अनवरत दूसरे वर्ष सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत लिया है । विगत वर्ष उन्हें यह सम्मान फ़िल्म ‘क्वीन’ के लिए मिला था तो इस वर्ष फ़िल्म ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ के लिए मिला है । कंगना ने वर्ष २००९ में भी सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मधुर भंडारकर की फ़िल्म ‘फ़ैशन’ (२००८) के लिए जीता था । इस फ़िल्म में उन्होंने मॉडलिंग के व्यवसाय में पहले सफल और कालांतर में असफल होने वाली एक कुंठित युवती की भूमिका निभाई थी (जो कि एक वास्तविक मॉडल गीतांजलि नागपाल के जीवन से प्रेरित थी) जो जीवन से हताश होकर आत्मघात कर लेती है। वस्तुतः महत्वाकांक्षी युवतियों द्वारा अपने जीवन में सफलता और असफलता का भलीभाँति प्रबंधन न कर पाना ही ‘फ़ैशन’ फ़िल्म की विषय-वस्तु थी जिसका केन्द्रबिन्दु एक छोटे शहर से मुंबई आई एक महत्वाकांक्षी युवती थी जिसकी भूमिका प्रियंका चोपड़ा ने निभाई थी और उन्होंने इसी फ़िल्म के लिए उसी वर्ष सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था । रोचक तथ्य यह है कि प्रियंका स्वयं भी उत्तर प्रदेश के एक अपेक्षाकृत कम आधुनिक शहर बरेली से हैं और जब वर्ष २००० में उन्होंने विश्वसुंदरी बनने का गौरव पाया था तो इससे उनके पुरातन विचारों से ओतप्रोत गृहनगर में किसी विशेष प्रसन्नता या उत्साह का संचार नहीं हुआ था ।

बहरहाल कुल मिलकर एक अच्छी फ़िल्म मानी जा सकने योग्य ‘फ़ैशन’ इस तथ्य को रेखांकित करती है कि एक सार्थक और प्रसन्न जीवन के लिए मनुष्य को सफलता और असफलता दोनों का ही कुशल और विवेकपूर्ण प्रबंधन करना आना चाहिए । ऐसा इसलिए है क्योंकि सफलता और असफलता दोनों एक ही मुद्रा के दो पक्ष हैं जिन्हें जुड़वां बहनों की तरह देखा जा सकता है । इन दोनों ही के उद्गम के पीछे मानव के पुरुषार्थ और उसके प्रारब्ध दोनों ही की अपनी-अपनी स्वतंत्र भूमिका होती है । प्रायः इन दोनों ही का साक्षात्कार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में होता है । इनमें से किसी एक से भी वह बच नहीं सकता । एक स्थान पर बच भी गया तो किसी दूसरे स्थान पर उनसे साक्षात् होकर ही रहेगा । तो फिर क्यों न दोनों का ही स्वागत बाहें पसारकर प्रसन्नतापूर्वक मुक्तचित्त से किया जाए ? क्यों सफलता को अपने सर पर चढ़ने दिया जाए और क्यों असफलता के कारण विषाद में मग्न हो जाया जाए ? ‘फ़ैशन’ फ़िल्म की मुख्य नायिका (प्रियंका) इस वास्तविकता को समय रहते समझ जाती है और इसी ज्ञानोदय के कारण जब जीवन उसे दूसरा अवसर देता है तो वह उसका उचित उपयोग करके सफलता के सोपान पुनः चढ़ती है जबकि फ़िल्म की सहनायिका (कंगना) ऐसा नहीं कर पाती और असफलता तथा एकाकीपन से उपजी उसकी कुंठा का अतिरेक उसे आत्महनन के मार्ग पर ले जाता है ।

लिखते हुए बहुत दुख होता है लेकिन इस व्यावहारिक संसार का अत्यंत पीड़ादायक यथार्थ यही है कि असफलता के लिए कहीं कोई स्थान नहीं है । ऐसा आभास होता है मानो यह भौतिक संसार केवल सफल व्यक्तियों के निमित्त ही है । सफल व्यक्ति को सर्वगुणसंपन्न मानते हुए उसका यशोगान करने में लोग कोई न्यूनता नहीं रखते जबकि असफल व्यक्ति के गुणों पर कोई दृष्टिपात तक नहीं करता । सफल के साथ सभी चिपकना चाहते हैं जबकि असफल का साथ तो संभवतः उसकी प्रतिच्छाया भी छोड़ देती है । स्वयं कंगना ने इस यथार्थ को भोगा है और कुछ समय पूर्व ही उन्होंने एक साक्षात्कार में स्पष्ट कहा था कि विजय और सफलता बहुत ओवररेटेड हैं अर्थात उनका मूल्य अनुचित रूप से अधिक आँका जाता है । सफलता में परिवर्तित न हो तो संघर्षशील व्यक्ति के संघर्ष को कोई सराहना नहीं मिलती । संसार की इसी दोषपूर्ण मानसिकता का प्रभाव व्यक्तियों पर पड़ता है जिसके कारण सफल व्यक्ति अपने आपको गुणी और दूसरों को उपदेश देने की अर्हता रखने वाले मानने लगते हैं जबकि असफल व्यक्ति निराशा एवं अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं । दुनिया की इसी ग़लत सोच के कारण कामयाबी अकसर गुमराह करती है । सच तो यह है कि इससे ज़्यादा गुमराह करने वाली शै कोई दूसरी नहीं । ज़्यादातर कामयाब लोग हौले-हौले हक़ीक़त से आँखें मूंदने लगते हैं और समझने लगते हैं कि वे जो करते (या कहते या सोचते) हैं, बस वही ठीक है, बाकी कुछ नहीं । वे दूसरों को स्वयं से तुच्छ मानने लगते हैं एवं उनका व्यक्तित्व अहंकार में डूब जाता है । प्रायः इन्हीं कारणों से उनका पतन भी होता है । जब उनका बुरा वक़्त आता है तो उन्हें ख़बर भी नहीं लगती कि कब वे अर्श से फ़र्श पर पहुँच गए । ‘फ़ैशन’ फ़िल्म में मधुर भंडारकर ने इसी तथ्य को बड़े प्रभावशाली ढंग से प्रतिपादित किया था ।

इसके विपरीत नाकाम शख़्स के साथ दुनिया कितनी बेरहमी से पेश आती है, यह स्वर्गीय गुरुदत्त ने अपनी बेहतरीन  फ़िल्म ‘कागज़ के फूल’ (१९५९) में बड़ी बेबाकी से दिखाया था । असफलता के प्रति संसार के तिरस्कार के कारण ही असफल व्यक्ति हीनभावना से पीड़ित होकर स्वयं का अवमूल्यन करने लगते हैं । वे अपने दोषों को अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से परखने लगते हैं जबकि अपने गुणों और क्षमताओं को भूलने लगते हैं । जब यह सिलसिला हद से आगे बढ़ जाता है तो उनके दिलोदिमाग में कुछ ऐसे ही ख़याल बार-बार गूंजने लगते हैं – ‘ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं’ । उनकी यह मनोदशा उनका ब्रेकिंग प्वॉइंट होती है जब वे पूरी तरह से टूट जाते हैं क्योंकि दिल में पूरा हो सकने लायक कोई सपना नहीं होता और नज़दीक कोई अपना नहीं होता । तभी ख़ुदकुशी की नौबत भी आती है जैसी कि गुरुदत्त के ही साथ १९६४ में आ गई थी जब महज़ उनतालीस साल की उम्र में वे अपनी ज़िंदगी से आजिज़ आ गए थे ।

अतः उत्साह और प्रसन्नता से परिपूरित एक सामान्य जीवन जीने के लिए सफलता और असफलता दोनों को ही सहज भाव से स्वीकार करने की कला प्रत्येक सांसारिक व्यक्ति को अपने भीतर विकसित करनी चाहिए क्योंकि ये दोनों ही वरदान भी बन सकती हैं और अभिशाप भी । कामयाबी और नाकामयाबी दोनों को ही ठीक से संभालना न आए तो दोनों ही आख़िरकार भारी नुकसान पहुँचाती हैं । कामयाबी मिलने पर यह एहतियात ज़रूर बरतनी चाहिए कि उसका नशा दिमाग में न चढ़ जाए जो कामयाब इंसान को घमंडी बना दे, उसके रवैये और नज़रिये को ग़ैर-पेशेवराना बना दे । अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर जैसे लोग सफलता को दीर्घकाल तक अपने पास इसीलिए रख पाए क्योंकि उन्होंने प्रारम्भिक सफलता मिलने पर अपनी विनम्रता और संयमित व्यवहार को नहीं खोया । जब कालचक्र परिवर्तन के कारण उन्हें असफलता मिली, तब भी उन्होंने अपने दृष्टिकोण, वाणी और व्यवहार को पूर्णरूपेण संतुलित बनाए रखा और समय के पुनः अपने पक्ष में परिवर्तित होने की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की । और इस सब्र का इनाम उन्हें मिला भी जब उनका अच्छा वक़्त लौटा और वे फिर से कामयाब हुए । नाकामयाबी मिलने पर इंसान को यह याद रखना चाहिए कि वक़्त हमेशा बदलता रहता है और इसी वजह से बुरा वक़्त भी हमेशा टिका नहीं रह सकता । उसका भी गुज़र जाना उसी तरह तय है जिस तरह से हर रात के बाद दिन का आना तय है । अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जीवन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है । जीवन में अनेक कार्यों और अनेक क्षेत्रों में असफल होने के उपरांत अंततः अमरीका का राष्ट्रपति निर्वाचित होकर उन्होंने अपनी इस एक ही उपलब्धि से पूर्व की सभी असफलताओं और निराशाओं को धो डाला । नाकामयाब शख़्स यह न भूले कि ज़िंदगी बेशकीमती है और जान है तो जहान है । बाहर हार हो तो हो, मन में नहीं होनी चाहिए क्योंकि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत । ज़िंदगी तो दूसरा मौका कभी भी दे सकती है मगर ग़म में ही डूबे रहे तो उसे कैसे पकड़ेंगे ? नयन अश्रुओं से भरे हों तो अपनी ओर आता हुआ सुअवसर कैसे दिखाई दे सकता है ? असफलता के कारणों का विश्लेषण किया जाए और यह देखा जाए कि कौनसे कारणों को दूर किया जा सकता है । फिर उन्हें दूर करके नवीन प्रयास किया जाए क्योंकि जीवन तो चलने का ही नाम है । फिर जो कामयाबी बिना मशक़्क़त और बिना इंतज़ार के मिल जाए, उसका लुत्फ़ ही क्या ? वो राही क्या जो थककर बैठ जाए, वो मंज़िल क्या जो आसानी से तय हो ?

गीता में श्रीकृष्ण ने मनुष्य को स्थितप्रज्ञ बनने का जो परामर्श दिया है, वह अमूल्य है । स्थितप्रज्ञ का अर्थ है – वह मनुष्य जो अपने जीवन के प्रत्येक समय एवं प्रत्येक स्थिति में अपना मानसिक संतुलन बनाए रखे तथा चाहे सौभाग्य आए अथवा दुर्भाग्य, सुख मिले अथवा दुख, हानि हो अथवा लाभ; कभी असंतुलित न हो । जो सफलता मिलने पर प्रसन्नता में उन्मादित न हो तथा असफलता मिलने पर अवसादग्रस्त न हो जाए, वही स्थितप्रज्ञ है । ऐसा व्यक्ति ही जीवन-नौका को संसार-सागर में सहज रूप से खे सकता है क्योंकि उसके पास दो पतवारें हैं – सफलता के चढ़ाव के लिए आत्म-नियंत्रण की तथा असफलता के उतार के लिए धैर्य की । अपने जीवन में बहुत संघर्ष करने वाली तथा कठिन समय देखने वाली कंगना को उनकी इस उपलब्धि पर हार्दिक बधाई देते हुए मैं उनके लिए भी तथा हम सबके लिए भी स्थितप्रज्ञता की ही प्रार्थना करता हूँ ।

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