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केरल और हाउसबोट के मजे

Jagran Yatra

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नदी की धारा, हल्की हवा के झोंके, चारो तरफ शांति और नदी में हाउसबोट के मजे. सोचते ही मन में एक उमंग सी उठती है दिल पानी की लहरों पर जैसे हिचकोले खाने लगता है. हाउसबोट का मजा जितना केरल में आता है वह कहीं और मिल पाना मुश्किल हैं.



केरल जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्व भर में पहचान बना चुका है उसकी खासियत ही हाउसबोट है. आज के समय के केरल के पारंपरिक हाउसबोट का तो रुप बदल गया है, लेकिन फिर भी नदी के वेग में बहती कश्ती की सवारी गांव के लोग करा ही देते हैं. केतुवलम के नाम से मशहूर केरल की पारंपरिक नाव की शुरुआत वैसे तो चावल और अन्य अनाज ढ़ोने के लिए हुई थी लेकिन वक्त के साथ समय बदला है.

आज के समय वहां जिस नाव का इस्तेमाल हो रहा है वह पुरानी केतुवलम का ही नया रुप लगती है. केतुवलम को ऐसा इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि पूरी नाव शुरु से अंत तक रस्सियों से बंधी होती है.

केतुवलम को ऊपर से ढ़कने के लिए छप्पर का इस्तेमाल किया जाता है. जिससे यह नीचे की सतह में अन्य नाविकों को पूरी तरह सुरक्षित रखता है. खाना नाव पर ही पकाया जाता है और ताजा-ताजा नदी की मछली के साथ परोसा जाता है. यानी नदी पर रहते समय खाने की चिंता भी नहीं.

केरल की हाउसबोट की कहानी काफी लंबी है जो प्राचीन सर्पाकार नाव से नवीन मोटर बोट तक चलेगी. आज तो हाउसबोट कई केरल वासियों की जीविका का प्रमुख साधन बन चुकी है. आज के समय में भी अधिकतर नाव जहां आज भी हाथों द्वारा खींची जाती हैं वहीं कुछ में 40 एचपी का मोटर लगा होता है.

पर कहते हैं जो मजा असली में है वह कहीं और नहीं, केरल की हाउसबोट में घूमना हो तो नाव में पारपंरिक चीजों का इस्तेमाल कर आप ज्यादा आनंद उठा सकते हैं.

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