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क्या जनता को मोहरा बनाकर राजनीति में आना चाहते हैं केजरीवाल ?

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जनलोकपाल बिल लाने के लिए विख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में टीम अन्ना का गठन किया गया लेकिन टीम में आपसी मतभेद बढ़ने लगे तो टीम अन्ना को भंग कर दिया गया। अन्ना टीम के खण्डित होने के बाद इस दल के अन्य सदस्य यदा-कदा ही खबरों में आते हैं लेकिन एक व्यक्ति हैं जो सामाजिक-राजनैतिक क्षेत्र में अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं। अन्ना टीम के प्रमुख सदस्य और मैगसेसे अवार्ड विजेता अरविंद केजरीवाल पहले ही अपना अलग राजनीतिक दल बनाने जैसी महत्वकांक्षा को बयां कर चुके हैं और टीम अन्ना के विघटन के बाद अब वह अपने दम पर केन्द्रीय और राज्य स्तर पर होते भ्रष्टाचारों को दुनिया के सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में उनकी इसी सक्रियता पर सवालिया निशान लग गया है। एक ओर जहां कुछ लोग केजरीवाल और महात्मा गांधी की तुलना यह कहकर कर रहे हैं कि जिस तरह महात्मा गांधी ने जनता की मूलभूत जरूरतों को अपने आंदोलनों का विषय बनाया था उसी तरह अरविंद केजरीवाल भी बिजली-पानी जैसी आम जरूरतों के मामलों सहित भ्रष्टाचार जैसे मसले पर एक बड़ी लड़ाई छेड़े हुए हैं। वहीं दूसरी ओर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि खुद को राजनीति में स्थापित करने के लिए ही अरविंद केजरीवाल ऐसा कर रहे हैं।


अरविंद केजरीवाल द्वारा चलाए जा रहे आंदलनों और उनके द्वारा दिनोंदिन उजागर होते घोटालों के विषय में लोगों का कहना है कि ऐसा वह केवल जनता के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए ही कर रहे हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के आने से पहले ही वह अपनी एक मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि स्थापित कर लेना चाहते हैं ताकि संसद तक पहुंचने का उनका रास्ता साफ हो जाए। पहले वह कांग्रेस के विरोधी बनकर सामने आए लेकिन अब वह बीजेपी समेत अन्य राजनीतिक पार्टियों के विरुद्ध भी आवाज उठाने लगे हैं जिससे यह स्पष्ट है कि वह किसी के साथ मिलकर नहीं बल्कि अपनी अलग पहचान स्थापित करना चाहते हैं। वह जो भी कार्य करते हैं उसका उद्देश्य अपनी राजनीतिक छवि मजबूत करने तक ही सीमित है। उन्हें समाज सेवा या जनता के हितार्थ किए गए कार्यों की संज्ञा नहीं देनी चाहिए।


वहीं दूसरी ओर बहुत से लोग अरविंद केजरीवाल के कार्यों का समर्थन यह कह कर कर रहे हैं कि राजनीति में आना या ना आना उनका व्यक्तिगत मसला है, लेकिन अगर वह जनता के हित में अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं या करना चाहते हैं तो इसमें बुराई क्या है? महात्मा गांधी ने भी नमक आंदोलन कर जनता को उनका अधिकार दिलवाया था वैसे ही अरविंद ने भी सरकारी बिजली की मार झेल रही आम जनता को साथ लेकर पानी और बिजली के बढ़ते दामों के विरुद्ध आंदोलन किया, उन्होंने जनता से यह आह्वान किया कि बढ़े हुए बिल वह जमा ना करवाए, अब इसमें गलत क्या है? अगर वह केन्द्रीय मंत्रियों द्वारा हो रहे घोटालों और भ्रष्टाचार को जनता के सामने ला रहे हैं तो इसमें जनता की ही भलाई हैं। अगर अरविंद केजरीवाल यह सब अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए भी कर रहे हैं तो अंतत: इससे जनता का ही तो हित हो रहा है। अगर अरविंद केजरीवाल अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाकर लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है। वैसे भी चुनाव के समय जनता को अपना वोट तो डालना ही है अगर वह वोट केजरीवाल एंड पार्टी को डाला जाए तो इसमें क्या हर्ज है?


अरविंद केजरीवाल से जुड़े सभी पक्षों पर विचार विमर्श करने के बाद हमारे जहन में कई सवाल उठते हैं, जैसे:


1. क्या वाकई अरविंद केजरीवाल के सभी आंदोलन राजनीतिक मंतव्यों से प्रेरित हैं?

2. भले ही अरविंद केजरीवाल राजनीति में आने के लिए ही ऐसा कर रहे हों लेकिन अगर इससे आम जनता का भला होता है तो इसमें क्या बुराई है?

3. अंत में एक अहम सवाल कि क्या राजनीति में आने के बाद केजरीवाल अपने सामाजिक आंदोलनों को जारी रखेंगे या फिर यह महज अपनी छवि बनाने का ही एक प्रयास है?


नोट: उपरोक्त मुद्दे पर आप कमेंट या स्वतंत्र ब्लॉग लिखकर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं। किंतु इतना अवश्य ध्यान रखें कि आपके शब्द और विचार अभद्र, अश्लील और अशोभनीय ना हों तथा किसी की भावनाओं को चोट ना पहुंचाते हों।


धन्यवाद

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