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राज्य सरकारों का बेसुरा राग

संपादकीय ब्लॉग

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एनसीटीसी पर राज्यों और विशेष रूप से भाजपा शासित राज्यों के रवैये पर हैरत प्रकट कर रहे हैं राजीव सचान


यदि राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र यानी एनसीटीसी काम करना शुरू कर देता है तो वह क्या करेगा और कैसे करेगा, फिलहाल इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। केंद्र सरकार की दलील है कि यह आतंकी रोधी केंद्र राज्यों के सहयोग से काम करेगा और उसे आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने और उन्हें गिरफ्तार करने का अधिकार होगा वहीं राज्यों का तर्क है कि यदि यह केंद्र उनकी अनुमति के बिना उनके यहां कार्रवाई करता है तो इससे उनके अधिकारों का उल्लंघन होगा। पता नहीं किसका पक्ष अधिक मजबूत है-केंद्र का या राज्यों का, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि एनसीटीसी को सक्रिय होने का अवसर नहीं मिला तो सबसे ज्यादा आनंदित और उत्साहित होंगे किस्म-किस्म के आतंकी संगठन। यदि कोई यह जानना चाहे कि एनसीटीसी का विरोध कर रहे राज्य किसे राहत दे रहे हैं तो इसका जवाब होगा आतंकियों को। इसी तरह यदि कोई यह समझना चाहे कि एनसीटीसी के मामले में राज्यों को आपत्ति किस पर है तो यही जवाब सामने आएगा कि उन्हें एक तरह से आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई होने पर एतराज है।


क्या इससे विचित्र और कुछ हो सकता है कि राज्य सरकारें आतंकियों के खिलाफ संभावित कार्रवाई का विरोध कर रही हैं? राज्य सरकारों की आपत्ति का आधार यह है कि पुलिस राज्यों का विषय है। नि:संदेह ऐसा ही है, लेकिन राज्य सरकारें पुलिस का नियमन किस तरीके से कर रही हैं, यह पुलिस सुधारों संबंधी सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों पर दिखावटी अमल से समझा जा सकता है। एक-दो राज्यों को छोड़कर किसी ने भी इन निर्देशों पर सही ढंग से अमल नहीं किया है। इतना ही नहीं, पुलिस के आधुनिकीकरण के मामले में भी राज्यों का रवैया उदासीनता भरा है। इस उदासीनता का परिचय तब दिया जा रहा है जब आतंकी गुट, नक्सली संगठन और किस्म-किस्म के माफिया तत्व मजबूत होते जा रहे हैं। राज्य सरकारों के आपस में अथवा केंद्र और राज्यों में कानून एवं व्यवस्था के मामले में सहयोग और तालमेल की क्या स्थिति है, इसे नक्सली संगठनों की निरंकुशता से समझा जा सकता है। नक्सलियों पर नकेल कसने के नाम पर राज्यों को केंद्र सरकार से पैसा, संसाधन और केंद्रीय सुरक्षा बल तो चाहिए, लेकिन उन्हें केंद्र के निर्देश मानने में कठिनाई होती है। नक्सलवाद पर लगाम लगाने के लिए अब तक न जाने कितनी बार मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई जा चुकी है, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला है।


एनसीटीसी को लेकर विरोध का झंडा ओड़िसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने उठाया है। इस पर आश्चर्य नहीं कि ममता बनर्जी और जयललिता ने उनके सुर में सुर मिलाने में देर नहीं की, लेकिन यह समझना कठिन है कि भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री इस बेसुरे राग का अलाप क्यों कर रहे हैं? आखिर यह वही भाजपा है जो आतंकवाद के खिलाफ केंद्र की कथित नरमी के लिए उसे कोसती रहती है। भाजपा यह मांग करती रही है कि आतंकवाद के खिलाफ कठोर कानून बनाए जाने के साथ सख्त रवैया अपनाने की जरूरत है। एनसीटीसी एक हद तक उसकी मांगों की पूर्ति करने वाला है। यह भी आश्चर्यजनक है कि भाजपा इस तथ्य की अनदेखी क्यों कर रही है कि नवीन पटनायक एनसीटीसी के विरोध के बहाने तीसरे मोर्चे को जिंदा करने की कोशिश कर रहे हैं? उन्होंने बिना किसी लाग लपेट कहा है कि यदि संप्रग भ्रष्ट है तो राजग सांप्रदायिक छवि वाला। बावजूद इसके भाजपा उनकी ओर से शुरू किए गए अभियान को मजबूती देने में लगी हुई है। यह सही है कि केंद्र सरकार न केवल कमजोर, बल्कि ढुलमुल है और उसकी अलोकप्रियता भी बढ़ती जा रही है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उसके हर कदम का विरोध किया जाए। भाजपा का एनसीटीसी के खिलाफ खड़ा होना विरोध के लिए विरोध का ही एक और उदाहरण है। भाजपा ने ऐसा ही उदाहरण तब पेश किया था जब उसने भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते का विरोध किया था।


एनसीटीसी के खिलाफ राज्य सरकारें इस आधार पर भी शोर मचा रही हैं कि कानून एवं व्यवस्था देखना उनका काम है। नि:संदेह यह उनका ही काम है, लेकिन क्या किसी को इसमें संदेह है कि वे यह काम सही तरह से नहीं कर पा रही हैं। प्रत्येक आतंकी हमले के बाद राज्य सरकारें केंद्र पर दोष मढ़ती हैं। यदि राज्य सरकारें कानून एवं व्यवस्था को नियंत्रित करने में सफल-सक्षम हैं तो फिर आतंकी हमले होने पर वे केंद्र पर दोषारोपण क्यों करती हैं? राज्य सरकारें यह समझने से जानबूझकर इंकार कर रही हैं कि आतंकी संगठन नौकरशाही की तरह काम नहीं करते। राज्यों को यह भी अच्छी तरह पता है कि आतंकी संगठनों ने अपना नेटवर्क देशभर में फैला लिया है। हाल के आतंकी हमलों में यह देखने में आया है कि साजिश किसी राज्य में रची जाती है और उसे अंजाम किसी अन्य राज्य में दिया जाता है। कई बार इस साजिश को अंजाम देने वाले किसी तीसरे राज्य के होते हैं। ऐसे आतंकी संगठनों पर कोई भी राज्य सरकार लगाम नहीं लगा सकती। यदि केंद्र सरकार राज्यों के सहयोग-समर्थन से आतंकवाद पर लगाम लगाना चाहती है तो इसमें किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? सहयोग-समर्थन के तौर-तरीकों पर तो विचार-विमर्श हो सकता है, लेकिन यदि राज्य सरकारें यह चाह रही हैं कि केंद्र सरकार आतंकवाद से निपटने के मामले में केवल आर्थिक स्तर पर सक्रियता दिखाए तो इसका मतलब है कि वे ईमानदार नहीं हैं। एनसीटीसी को लेकर संघीय ढांचे से छेड़छाड़ का जो शोर मचाया जा रहा है उसका भी कोई मतलब नहीं। भारत संघीय व्यवस्था वाला देश अवश्य है, लेकिन वह अमेरिका की तरह राज्यों से बना देश नहीं है। देश पहले है और राज्य बाद में, लेकिन राज्य सरकारें ऐसा व्यवहार कर रही हैं मानों राज्य पहले हैं और देश बाद में।


लेखक राजीव सचान दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं


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