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राजनीति का मकड़जाल

संपादकीय ब्लॉग

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Sanjay Guptजाति-मजहब की राजनीति से प्रभावित उत्तर प्रदेश के चुनावों को मतदाताओं के लिए एक परीक्षा मान रहे हैं संजय गुप्त


पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर में मतदान संपन्न होने के बाद अब देश की निगाहें उत्तर प्रदेश पर टिकी हुई हैं। उत्तर प्रदेश में दो दौर का मतदान हो चुका है। अच्छी बात यह है कि इन दोनों चरणों में मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर मतदान किया। चुनाव आयोग और साथ ही राजनीतिक दलों को इस पर प्रसन्नता होनी चाहिए कि देशवासी बड़ी संख्या में अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए आगे आ रहे हैं। एक समय था जब पचास प्रतिशत से भी कम मतदान होता था। इसके चलते कम प्रतिनिधित्व वाले राजनीतिक दल भी सत्ता में आ जाते थे। अब स्थितियां बदलती दिख रही हैं। इसका एक कारण चुनाव आयोग की ओर से मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए की जाने वाली पहल भी है और युवा मतदाताओं की भागीदारी भी। चुनाव आयोग निष्पक्ष तरीके से चुनाव कराने में सफल रहने के बावजूद चुनाव में धनबल का इस्तेमाल समाप्त नहीं कर पा रहा है। राजनीतिक दल भी इस मामले में शुतुरमुर्गी रवैया अपनाए हुए हैं। चुनाव आयोग ने पंजाब और उत्तर प्रदेश में करोड़ों रुपये की ऐसी धनराशि जब्त की है जिसका चुनावों में इस्तेमाल होने की आशंका थी। बड़े पैमाने पर धन की इस जब्ती के बाद भी चुनाव आयोग को यह अंदेशा है कि चुनावों में धनबल का इस्तेमाल पूरी तौर पर रोकना संभव नहीं हो पाएगा। बावजूद इसके अभी तक चुनाव आयोग ने धनबल के इस्तेमाल पर किसी भी राजनीतिक दल के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। राजनीतिक दलों की समस्या यह है कि निर्धारित खर्च सीमा में उनके लिए चुनाव लड़ना नामुमकिन है, जबकि रैलियों और चुनाव प्रचार में खर्च बढ़ता जा रहा है।


भले ही इस खर्च को नियंत्रित करना संभव हो, लेकिन धन के जरिये मतदाताओं को खरीदने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना मुश्किल होता जा रहा है। राजनीतिक दल मतदाताओं को रिझाने के लिए धन भी खर्च करते हैं और शराब भी बांटते हैं। विडंबना यह है कि देश में तमाम मतदाता ऐसे हैं जो प्रलोभन में आकर अपने वोट का इस्तेमाल करते हैं। इन मतदाताओं में जागरूकता आने में अभी समय लगेगा। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक चुनाव आयोग को सतर्कता बरतनी होगी, लेकिन चुनाव आयोग और राजनीतिक दल चाहें तो चुनाव के वाजिब खर्च पर नए सिरे से विचार कर सकते हैं। हालांकि इस मुद्दे पर चर्चा तो बहुत हुई है, लेकिन किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सका है। परिणाम यह है कि जब भी चुनाव होते हैं तब धनबल का इस्तेमाल देखने को मिलता है। जब राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए अनुचित रूप से धन का इस्तेमाल करते हैं तो इससे कहीं न कहीं कालेधन और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। एक ऐसे समय जब भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना कथित तौर पर राजनीतिक दलों की प्राथमिकता है तब फिर यह आवश्यक कि वे चुनाव खर्च सीमा को वाजिब बनाएं। ऐसा न करना एक प्रकार से चुनाव सुधारों से बचना और कालेधन की राजनीति को बढ़ावा देना है।


उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतने के लिए विभिन्न दलों के नेता जैसे बयान देने में लगे हुए हैं वे हकीकत से परे हैं। भले ही नेतागण खुद को जाति-मजहब की राजनीति से परे बता रहे हों, लेकिन यथार्थ यह है कि वे इसी आधार पर मतदाताओं का धु्रवीकरण करने की कोशिश कर रहे हैं। सभी दलों ने अपने प्रत्याशियों का चयन भी इसी आधार पर किया है। एक तरह से राजनीतिक दलों के खाने के दांत और हैं तथा दिखाने के और। जाति-मजहब की इस राजनीति के लिए एक हद तक मतदाता भी जिम्मेदार हैं। उत्तर प्रदेश की तमाम समस्याओं के लिए यही राजनीति जिम्मेदार है। जाति-मजहब की इसी राजनीति के जरिये सपा-बसपा के साथ-साथ कांग्रेस और भाजपा भी चुनाव जीतने के लिए पूरा जोर लगाए हुए हैं। ज्यादातर सीटों में चतुष्कोणीय मुकाबला होने के कारण किसी नतीजे पर पहुंचना मुश्किल हो रहा है। सभी दल मतों के बंटवारे में खुद के लाभ में होने का दावा कर रहे हैं, लेकिन बढ़े मतदान प्रतिशत ने इन दावों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। भाजपा का मानना है कि कांग्रेस की मजबूती सपा-बसपा के वोटों में कटौती का कारण बनेगी और इसका लाभ उसे मिलेगा। कांग्रेस राहुल गांधी के आक्रामक प्रचार के जरिये यह मान रही है कि पिछले 22 सालों से राज्य की जनता सपा-बसपा और भाजपा को परख चुकी है, इसलिए इस बार उसकी दावेदारी मजबूत है। दूसरी ओर सपा-बसपा का यह दावा है कि क्षेत्रीय दल होने के नाते मतदाताओं के बीच उनकी ही पकड़ सबसे मजबूत है। आम धारणा है कि पहले नंबर की लड़ाई सपा-बसपा के बीच है।


एक आकलन यह भी है कि बसपा को सत्ताविरोधी प्रभाव का सामना करना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश के बारे में किसी भी आकलन को अंतिम इसलिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यहां की राजनीति जाति और मजहब के इर्द-गिर्द घूम रही है। इस बार जाति के आधार पर भी लोगों को रिझाने की कोशिश की जा रही है और मजहब के आधार पर भी। सपा, बसपा और कांग्रेस में मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की जबरदस्त होड़ इसलिए है, क्योंकि यह वर्ग थोक रूप में वोट देता है। कांग्रेस ने मुसलमानों को रिझाने के लिए पहले साढ़े चार प्रतिशत अल्पसंख्यक आरक्षण की घोषणा की, फिर केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने इस आरक्षण को नौ प्रतिशत तक बढ़ाने का वायदा किया। जब चुनाव आयोग ने इसके लिए उनकी निंदा की तो उन्होंने बाटला कांड भुनाने की कोशिश की। 2008 में दिल्ली में हुए इस कांड को लेकर कांग्रेस के अंदर दो मत हैं। जहां प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पुलिस की कार्रवाई को सही मानते हैं वहीं दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद इस कार्रवाई को फर्जी करार दे रहे हैं। यह चुनाव बाद ही पता चलेगा कि कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने में सफल रही या नहीं? इसी तरह चुनाव परिणाम ही यह तय करेंगे कि किस राजनीतिक दल ने जातीय समीकरणों को अच्छी तरह समझा?


पिछले चुनाव में बसपा की जीत में जातीय समीकरणों की बड़ी भूमिका रही थी। दलित और सवर्ण मतदाताओं को अपने पक्ष में करके उसने अकेले दम सरकार बनाई थी। इस बार भी वह इसी कोशिश में है, लेकिन ऐसी ही कोशिश अन्य दल भी कर रहे हैं। जब सभी दल जातियों को गोलबंद करने में लगे हुए हैं तब फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल है कि उत्तर प्रदेश के मतदाता जाति-मजहब से ऊपर उठकर अपने वोट का इस्तेमाल करेंगे। वैसे उन्हें यह समझना होगा कि उनके द्वारा चुना जा रहा प्रत्याशी जाति-मजहब का नहीं, बल्कि सत्तापक्ष-विपक्ष का प्रतिनिधित्व करेगा। उनके लिए यह जरूरी है कि वे राजनीतिक दलों के तौर-तरीकों, नीतियों और शीर्ष नेतृत्व के आधार पर वोट दें। इस सबके अतिरिक्त उन्हें प्रत्याशी विशेष की छवि को भी ध्यान में रखना होगा। यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनके लिए राजनीतिक दलों के मकड़जाल से निकलना और उत्तर प्रदेश को विकास के रास्ते पर ले जाना मुश्किल होगा।


इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं


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