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छोटी सी बात का बतंगड़

संपादकीय ब्लॉग

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Sanjay Guptसेनाध्यक्ष वीके सिंह के उम्र संबंधी विवाद के सामान्य से मुद्दे के इतना अधिक उलझने पर हैरत जता रहे हैं संजय गुप्त


सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह की उम्र को लेकर उपजे विवाद ने उनके साथ-साथ सरकार को भी सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। इस विवाद के चलते सरकार को किस तरह कुछ सूझ नहीं रहा, यह प्रधानमंत्री के इस बयान से पता चलता है कि यह बहुत संवेदनशील मसला है और इस पर कुछ कहना ठीक नहीं। प्रधानमंत्री के बाद रक्षामंत्री एके एंटनी ने जिस तरह यह विवाद सुलझाने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट पर डाल दी उससे बीच-बचाव की रही-सही संभावनाएं भी खत्म हो गईं। जनरल वीके सिंह अपनी उम्र संबंधी विवाद को सुलझाने के लिए जिस तरह सुप्रीम कोर्ट गए उससे उनके और सरकार के बीच की अविश्वास की खाई तो नजर आई ही, लोगों के जहन में वह विवाद भी कौंध गया जो राजग शासन के समय में एडमिरल विष्णु भागवत को लेकर उभरा था और जिसकी परिणति उनकी बर्खास्तगी के रूप में हुई थी। सरकार और सेनाध्यक्ष के बीच विवाद की स्थिति इसके पहले भी कई बार उत्पन्न हो चुकी है और वह सार्वजनिक भी हुई है, लेकिन यह पहली बार है जब कोई सेनाध्यक्ष सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गया हो। यह सामान्य मामला नहीं, लेकिन कोई नहीं बता पा रहा कि इसकी नौबत क्यों आई?


हालांकि कांग्रेस समेत सभी दल यह मान रहे हैं कि वीके सिंह का मामला संवेदनशील है, लेकिन इसके लिए विपक्षी दल सरकार को कठघरे में खड़ा करने से चूक नहीं रहे। इससे देश को यही संदेश जा रहा है कि सरकार ने अपनी अकर्मण्यता से अपने लिए एक मुसीबत मोल ले ली। एक तरह से देखा जाए तो जनरल वीके सिंह की उम्र का मामला साधारण सा है, लेकिन अब वह सरकार के गले की हड्डी बन गया है। वीके सिंह का दावा है कि उनकी वास्तविक जन्मतिथि 10 मई 1951 है और हाईस्कूल सर्टिफिकेट एवं अन्य दस्तावेज भी इसकी पुष्टि करते हैं, लेकिन सेना के दस्तावेजों में उनकी जन्मतिथि 10 मई 1950 दर्ज है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि सेना में भर्ती का उनका आवेदन उनके शिक्षक ने भरा और उन्होंने गलती से उसमें जन्मतिथि 10 मई 1950 दर्ज कर दी। कायदे से इस गलती को प्रारंभ में ही सुधार लिया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया और वह भी तब जब सेना में जन्मतिथि का बहुत महत्व होता है। सैन्य अधिकारियों की वरिष्ठता-कनिष्ठता के निर्धारण में एक दिन का अंतर भी मायने रखता है। यह आश्चर्यजनक है कि इस गलती को ठीक करने का काम तब भी नहीं किया गया जब वीके सिंह को पदोन्नति मिलनी शुरू हो गई। वे एक के बाद एक पदोन्नति 10 मई 1950 की जन्मतिथि के आधार पर पाते गए। हद तो तब हो गई कि उनकी दो जन्मतिथियों का मामला तब भी सुलझाने की जरूरत नहीं समझी गई जब उन्हें सेनाध्यक्ष बनाया गया।


सेनाध्यक्ष का चयन करते समय संबंधित सैन्य अधिकारी के कॅरियर को हर तरह से जांचा-परखा जाता है और जो समिति सेनाध्यक्ष का चयन करती है उसके मुखिया प्रधानमंत्री होते हैं। इस समिति के सामने वीके सिंह की दो जन्मतिथियों का मामला उठा भी था। जिस तरह सेना के पास इस सवाल का जवाब नहीं कि वीके सिंह की दो जन्मतिथियों का मामला समय रहते क्यों नहीं सुलझा उसी तरह सरकार यह नहीं बता पा रही कि उन्हें सेनाध्यक्ष बनाते समय भी उनकी जन्मतिथि से जुड़े मामले की अनदेखी क्यों की गई? यह सवाल इसलिए और अधिक रहस्यमय हो गया है, क्योंकि वीके सिंह का दावा है कि उन्होंने अपनी दो जन्मतिथियों का मामला सुलझाने का आग्रह किया था, लेकिन उन्हें 1950 को ही जन्मतिथि मानने के लिए विवश किया गया। उनके दावे को खारिज करना कठिन है, लेकिन यह भी समझना मुश्किल है कि आखिर इतने शीर्ष सैन्य अधिकारी को दबाव में कैसे लिया जा सकता है? इससे भी बड़ा सवाल यह भी है कि वह जन्मतिथि संबंधी विवाद सुलझे बगैर पदोन्नतियां क्यों स्वीकार करते रहे? यदि उन्होंने सेनाध्यक्ष बनते समय 10 मई 1950 की जन्मतिथि को स्वीकृति दी थी तो फिर अब वह उसमें बदलाव क्यों चाहते हैं? यदि उनका जन्म वर्ष 1951 है और उन्होंने 1950 के आधार पर पदोन्नतियां हासिल कीं तो इसका मतलब है कि वह समय से पहले लाभान्वित होते रहे। इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि यदि उन्होंने 1950 के आधार पर पदोन्नतियां हासिल नहीं की होतीं तो शायद जनरल बनते ही नहीं। वह 1951 को अपना जन्म वर्ष माने जाने पर जोर दे सकते हैं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि 1950 के आधार पर उन्होंने पदोन्नतियां हासिल कर अन्य अधिकारियों के जनरल पद की दावेदारी प्रभावित की। अब यदि उनकी जन्मतिथि 1951 मानी जाती है और इसी आधार पर वह सेवानिवृत्त होते हैं तो वह फिर से कुछ सैन्य अधिकारियों के जनरल पद की दावेदारी को प्रभावित करने का काम करेंगे। सच्चाई जो भी हो, इस सवाल का जवाब सामने आना चाहिए कि क्या वीके सिंह को सेनाध्यक्ष बनाते समय उनकी जन्मतिथि को ठीक करने का कोई आश्वासन दिया गया था? यदि ऐसा आश्वासन दिया गया था तो वह पूरा क्यों नहीं किया गया?


हालांकि वीके सिंह इस आरोप को खारिज करते हैं कि वह जन्मतिथि ठीक कराकर एक और वर्ष तक सेनाध्यक्ष बने रहना चाहते हैं, लेकिन उनके इस तर्क को स्वीकार करना भी कठिन है कि यह मामला उनके सम्मान का है। आखिर जब वह सेना के सर्वोच्च पद पर हैं और इस रूप में उनकी ओर से किए गए कायरें पर कोई विवाद-बहस नहीं तो फिर जन्मतिथि का मामला सम्मान का सवाल कैसे बन सकता है? यदि वह इस मसले को नहीं उठाते तो कोई विवाद भी पैदा नहीं होता और वह ससम्मान जनरल के पद से रिटायर भी हो जाते। उन्हें अपना जन्म वर्ष 1951 न माने जाने का मलाल इसलिए नहीं होना चाहिए, क्योंकि 1950 के आधार पर उन्होंने वे सारे लाभ अर्जित किए, जो शायद उन्हें उनकी असली जन्म तिथि के आधार पर नहीं मिलते।


अब जब सरकार ने हाथ खड़े करते हुए सब कुछ सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया है और उसने वीके सिंह के उम्र विवाद को लेकर दाखिल की गई एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए उनकी मूल याचिका पर सुनवाई के संकेत दे दिए हैं तब फिर सभी को उसके फैसले का इंतजार करना होगा। वैसे केंद्र सरकार इन असुविधाजनक सवालों से बच नहीं सकती कि एक साधारण से मामले को संवेदनशील मसला क्यों बना दिया गया? अब यह मामला सेनाध्यक्ष की जन्मतिथि संबंधी विवाद भर का नहीं रह गया है, बल्कि सेनाध्यक्ष और सरकार के बीच के अविश्वास का भी बन गया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे जो हो और सरकार अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए वीके सिंह के कार्यकाल के बारे में चाहे जो निर्णय ले, संकट आसानी से समाप्त होता नहीं दिखता।


इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं


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