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गठबंधन की राजनीति

संपादकीय ब्लॉग

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लोकसभा चुनाव के लिए भूमिका तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। कांग्रेस और भाजपा दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां अपने-अपने ढंग से अपने-अपने नेताओं की घोषणा कर चुकी हैं और एक-दूसरे के खिलाफ ताल भी ठोंक चुकी हैं। इनके अलावा क्षेत्रीय दल भी अपने ढंग से तैयारी शुरू कर चुके हैं। जिसकी जहां तक दृष्टि जा सकती है वह वहां तक अपनी पैठ बनाने में लग गया है। इसके अलावा तीसरे मोर्चे की संभावना तलाशने में भी कुछ दल जुट गए हैं। ध्यान रहे, इस 15वीं लोकसभा में भी सरकार गठबंधन की ही है, किसी एक पार्टी की नहीं। कई बार कांग्रेस और सरकार के भी जिम्मेदार लोग गठबंधन की सरकार के पास पूरी स्वतंत्रता न होने पर अफसोस जता चुके हैं, लेकिन इससे पहले 14वीं लोकसभा के दौर में भी कांग्रेसनीत गठबंधन की ही सरकार थी और उससे पहले 1989 से ही शुरुआत करें तो ज्यादातर समय गठबंधन या बाहरी समर्थन का ही दौर चला आ रहा है।1निश्चित रूप से किसी एक पार्टी के वर्चस्व वाला दौर अब जा चुका है। बहुत लंबे समय तक देश की सत्ता पर काबिज रही इकलौती, सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के लिए यह एक कड़वा सच है। दो साल पहले तक हर बात के लिए गठबंधन की राजनीति को जिम्मेदार ठहराते रहे कांग्रेसी नेता अब निर्णय लेने की अक्षमता या गलत निर्णय के लिए भी गठबंधन राजनीति को जिम्मेदार नहीं ठहराते। इसकी वजह शायद उनका यह स्वीकार कर लेना ही है कि गठबंधन ही अब अखिल भारतीय राजनीति का सच है। गौर करें तो इसके पहले 13वीं लोकसभा के समय अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपानीत राजग सरकार भी गठबंधन सरकार ही थी और यही सरकार कांग्रेस के लिए पहला झटका भी थी। इसी सरकार ने यह साबित किया कि कांग्रेस के अलावा दूसरे दल भी पूरे पांच साल सरकार चला सकते हैं। कहा जाना चाहिए कि इस सरकार ने गैर कांग्रेसी विकल्प के तौर पर देशवासियों का भरोसा तो मजबूत किया ही, कांग्रेस का भ्रम भी तोड़ा।

निर्धनता पर राजनीति


यह अलग बात है कि जनता ने उसे दोबारा मौका नहीं दिया। वहीं 2009 में संप्रग-एक के शासनकाल में बेतहाशा बढ़ी महंगाई के कारण यह सोचना मुश्किल था कि दोबारा इनकी सरकार आएगी, लेकिन न केवल संप्रग-2 की वापसी हुई, बल्कि इस बार मुख्य दल कांग्रेस को ज्यादा सीटें भी मिलीं। इसके कारणों पर बहुत बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु पर चर्चा कभी नहीं हुई। वह मुद्दा है गठबंधन में शामिल विभिन्न दलों को देखने का आम मतदाता का नजरिया क्या है। अगर गहराई से अध्ययन किया जाए तो पता चलेगा कि गठबंधन और उसमें शामिल दलों और स्वतंत्र रूप से लड़ रहे क्षेत्रीय दलों और उनकी भूमिका को देखने का हर जगह के मतदाता का अपना अलग नजरिया होता है और अलग आधार भी होते हैं। इन आधारों को नजरअंदाज करके चुनावी संभावनाओं के प्रति एक समग्र दृष्टि नहीं बनाई जा सकती।1साढ़े छह दशकों के लोकतंत्र के अनुभव ने मतदाता को इतना सिखा दिया है कि अब वह केवल किसी दल या नेता के वादे पर भरोसा करके अपने कीमती वोट की दिशा तय नहीं कर लेता है। वह स्थानीय मुद्दे, राष्ट्रीय मुद्दे, देश के दूसरे हिस्सों से उसके संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ उसके निजी मुद्दों के आधार पर धारणा बनाता है। इनमें कब कौन सा मुद्दा प्रभावी भूमिका निभाए, कहा नहीं जा सकता। चुनाव बाद के गठबंधन अब भी उसे रास नहीं आ रहे हैं।


वह दलों के आपसी गठबंधन से लेकर प्रधानमंत्री पद के लिए उनका प्रत्याशी तक सब पहले से जान लेना चाहता है और इसका असर भी उसके निर्णय में शामिल होता है। गठबंधन के नेतृत्वकर्ता दल पर केवल अपने स्तर से सभी मुद्दे ही नहीं, गठबंधन में शामिल दलों की स्थिति स्पष्ट करने की जिम्मेदारी भी होती है। कई बार गठबंधन के ही नाते वोटों के घटने-बढ़ने का खेल भी हो जाता है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी पार्टी का एक तरफ यह कहना कि गठबंधन के नाते उसके लिए फैसले लेना मुश्किल हो रहा है और दूसरी तरफ यह कि उनके यहां प्रधानमंत्री पद के लिए पहले से प्रत्याशी घोषित करने की परंपरा नहीं है, मतदाता को असमंजस में डालता है। 1999 में बनी राजग सरकार ने यह बात पहले ही स्पष्ट कर दी थी कि गठबंधन धर्म को निभाते हुए पार्टी अपना घोषणापत्र लागू नहीं कर सकेगी। सरकार चलाने और देश को बेहतर दिशा देने के लिए एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय किया गया। वाजपेयी ने कभी यह नहीं कहा कि अब मुझसे नहीं होगा। उन्होंने अपने किसी फैसले या किसी कमजोरी के लिए सहयोगी दलों अथवा गठबंधन की राजनीति को कभी जिम्मेदार नहीं ठहराया। ऐसा केवल इसलिए नहीं था कि वाजपेयी की मजबूरी थी गठबंधन सरकार चलाना, बल्कि इसलिए भी कि उन्हें मौजूदा राजनीतिक चलन की सही समझ थी। वह शायद यह देख रहे थे कि अब देश वास्तविक संघीय ढांचे की तरफ बढ़ रहा है।1भारत जैसे बड़े देश के सही अथोर्ं में संघीय ढांचे की तरफ बढ़ने का अर्थ ही है कि इसमें कई अस्मिताओं का उभार होगा। इन अस्मिताओं की अपनी अलग-अलग आवश्यकताएं होंगी। सभी क्षेत्रीय अस्मिताओं के बीच राष्ट्रीय एकता को सुरक्षित रखना भी बड़ी चुनौती है। मोदी प्रभाव का असर गली-कूचों से लेकर सोशल मीडिया तक पर साफ देखा जा रहा है। अब इस संबंध में किसी प्रलाप और इन्कार का भी कोई अर्थ नहीं रह गया। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के मुद्दे को लेकर राजग का एक महत्वपूर्ण सहयोगी दल जदयू पहले ही गठबंधन से बाहर हो चुका है, बावजूद इसके कि भाजपा राजग में शामिल दलों को हमेशा पूरा महत्व देती आई है। बहरहाल, अब यह बात साफ है कि गठबंधन में मौजूद सभी दलों को प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार के रूप में मोदी मंजूर हैं। दूसरी तरफ, कांग्रेसनीत संप्रग में अभी इस मसले को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है। इन हालात में जनता किस बात को कितनी अहमियत देगी, यह तो समय ही बताए


इस आलेख के लेखक निशिकांत ठाकुर हैं


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