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पेशकश के पीछे का सच

संपादकीय ब्लॉग

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advani11_fix-1_1265735715_mवर्ष 2008 में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रचार के दौरान बराक ओबामा ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान के साथ मिलकर काम करने के लिए वे कश्मीर मसले को सुलझाने के लिए गंभीरता से प्रयास करेंगे। अगर वे चुनाव जीते तो उनके प्रशासन के लिए यह महत्वपूर्ण कामों में से एक होगा। ‘टाइम’ पत्रिका के संवाददाता जो क्लेन के साथ विस्तार से बातचीत करते हुए बराक ओबामा ने कहा था, ”कश्मीर में इन दिनों जैसी दिलचस्प स्थिति है उसमें इस मसले को कब्र से निकालकर हल करने की एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। हमें इस मसले के हल के लिए गंभीरता से प्रयास करना होगा। इसके लिए एक विशेष दूत नियुक्त करना, आंकड़ेबाजी के बजाय सही मायने में प्रयास और खास तौर पर भारतीयों को यह समझाना और इसके लिए तैयार करना होगा कि आज जब आप एक आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हैं तब इस मसले को हल कर इससे क्यों नहीं मुक्त हो जाते? इसी तरह पाकिस्तानियों को यह समझाना होगा कि भारत आज कहां है और आप कहां हैं। आपके लिए कश्मीर मसले पर फंसे रहने से ज्यादा जरूरी है अफगान सीमा की बड़ी चुनौतियों से जूझना। मैं जानता हूं कि यह सब करना और इसमें कामयाब होना इतना आसान नहीं होगा, मगर मुझे उम्मीद है कि यह हो जाएगा।”

पिछले हफ्ते अचानक भारत ने पाकिस्तान को जिस तरह विदेश सचिव स्तर की वार्ता के लिए प्रस्ताव दिया, उसने स्वाभाविक रूप से कई राजनीतिक विश्लेषकों को हैरत में डाल दिया। आज देश यह जानने को इच्छुक है कि जिस तरह अचानक पाकिस्तान को बातचीत का न्योता दिया गया, क्या उसके पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का दबाव है? लोग यह साफ-साफ जानना चाहते हैं कि 26/11 के मुंबई हमले के बाद भारत ने दृढ़तापूर्वक जो ऐलान किया था उसका क्या हुआ? याद कीजिए, तब भारत ने कहा था कि जब तक मुंबई हमले की योजना बनाने वाले साजिशकर्ताओं के खिलाफ पाकिस्तान ठोस कार्रवाई नहीं करता और अपनी धरती से संचालित होने वाले आतंकी नेटवर्क को ध्वस्त नहीं करता तब तक उसके साथ किसी तरह की कोई वार्ता नहीं हो सकती, लेकिन विदेश सचिव स्तर की वार्ता के मसले पर सरकार का यह हालिया यू-टर्न क्या वाशिंगटन के जोरदार दबाव का नतीजा है? गौरतलब है कि पिछले हफ्ते पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी ने मुस्कुराते हुए कहा था कि अंतरराष्ट्रीय दबाव की वजह से ही भारत उसके साथ द्विपक्षीय वार्ता के लिए बातचीत की मेज पर आने को राजी हुआ। 22 फरवरी, 1994 को जम्मू और कश्मीर को लेकर लोकसभा में सर्वसम्मति से जो प्रस्ताव पारित हुआ था उसे आखिरकार संप्रग सरकार कैसे नजरअंदाज कर सकती है! आज वार्ता के लिए पाकिस्तान जिस अकड़ और कुटिलता से भारत की ओर देख रहा है उसके बाद तो संप्रग सरकार के कथित सख्त रवैये की चर्चा करना ही शायद बेमानी है। इसके बाद यह याद करना और भी जरूरी है कि लोकसभा ने जम्मू और कश्मीर मसले पर किस तरह साफ शब्दों में अपना मंतव्य रखा था, जिसे तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया था। उस प्रस्ताव में जो महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई थीं उस पर यहां दोबारा सोचना-विचारना अनुचित न होगा।

”पाकिस्तान जिस तरह अपने कब्जे वाले कश्मीर सहित अपनी सरजमीं के अन्य हिस्सों से आतंकियों को हथियार, धन और गोलाबारुद देकर जम्मू-कश्मीर में तबाही के लिए भेजता है वह इस सदन के संज्ञान में है। पाकिस्तान हथियार, धन और अपने यहां प्रशिक्षण देकर भाड़े के विदेशी लड़ाकों को जम्मू-कश्मीर में अव्यवस्था और अराजकता फैलाने के लिए भेजता है। पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादी हत्या, लूट और अन्य आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हैं और स्थानीय निवासियों को डरा-धमकाकर वहां दहशत भरा माहौल बनाना चाहते हैं। यह सदन जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गतिविधियों, वहां की जनता के शोषण, भयादोहन और वहां के मासूम नागरिकों के साथ जो जघन्य अपराध कर रहे हैं उसकी कड़े शब्दों में निंदा करता है। यह सदन मांग करता है कि पाकिस्तान तत्काल आतंकवादियों का समर्थन करना बंद करे, जो सरासर शिमला समझौते का उल्लंघन है।

याद रहे कि दोनों देशों के बीच किसी भी तरह के तनाव या किसी मसले पर बातचीत के लिए शिमला समझौते को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया गया था। सदन ने इस बात को भी दोहराया था कि भारत का राजनीतिक और लोकतांत्रिक ढांचा और हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक के मानवाधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है।

जम्मू-कश्मीर के लोगों के मानवाधिकारों को लेकर पाकिस्तान की झूठे, बेबुनियाद और दुष्टतापूर्ण आरोपों को हम अस्वीकार करते हैं। पाकिस्तान की भारतविरोधी गतिविधियों और शरारतपूर्ण बयानबाजी निंदनीय है। इस सदन ने इस बात को भी नोट किया है कि पाकिस्तान की उत्तेजक बयानबाजी से राज्य के लोगों की राय दूषित होती है और माहौल में उत्तेजना फैलती है। जम्मू-कश्मीर के लोगों के जनमत को प्रभावित करने, स्थानीय माहौल में तनाव बढ़ाने और जनता को उकसाने के लिए पाकिस्तान लगातार उकसाऊ बयान देता रहता है। यह बेहद अफसोस की बात है कि जम्मू-कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है उस हिस्से में रहने वाले लोगों के मानवाधिकारों और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का वहां हनन हो रहा है। हम भारत के नागरिकों की ओर से पुरजोर ताकत से यह ऐलान करते हैं कि..

– जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग था, अंिवभाज्य अंग है और अविभाज्य अंग रहेगा। इसे देश के बाकी हिस्सों से बांटने और अलग करने के किसी भी तरह के प्रयास का सभी आवश्यक तरीकों से हम विरोध करेंगे।

-भारत ने अपनी एकता, अखंडता और क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा के लिए हर तरीके से मुकाबला किया है और इस पर आंच आने की स्थिति में भविष्य में भी पूरी ताकत से मुकाबला करेगा। हम यह मांग करते हैं कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के जिस भूभाग को कथित रूप से आजाद कश्मीर कहता है उस पर आक्रमण करके उसने अवैध रूप से कब्जा किया हुआ है।

-पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर राज्य के जिन हिस्सों पर जबरन और अवैध रूप से आज तक कब्जा किया हुआ है उसे तत्काल प्रभाव से मुक्त कर देना चाहिए।

-जम्मू-कश्मीर के बारे में किसी तरह की बयानबाजी और षडयंत्रकारी गतिविधियों को भारत अपने आंतरिक मामलों में बेजा दखल मानेगा और उसका पूरी ताकत के साथ मुकाबला करेगा। ”

सरकार, देश और साथ ही दुनिया को इस प्रस्ताव को ध्यान रखना चाहिए।

[लालकृष्ण आडवाणी: लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं]

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