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मुंशी प्रेमचंद जिंदगी भर प्यार के लिए तरसे, अंत में जब प्यार मिला तो बवाल मच गया

‘आज दस साल से जब्त कर रहा हूं. अपने नन्हे से हृदय में अग्नि का दहकता हुआ कुंड छिपाए बैठा हूं. संसार में कहीं शांति होगी, कहीं सैर- तमाशे होंगे, कहीं मनोरंजन की वस्तुएं होगी. मेरे लिए तो अब ये अग्निराशि है और कुछ नहीं. जीवन की सारी अभिलाषाएं इसी में जलकर राख हो गई. अब किससे अपनी मनोव्यथा कहूं? फायदा ही क्या? जिसके भाग्य में रूदन, अंनत रूदन हो, उसका मर जाना ही अच्छा…’



munshi premchand birthday

ये पंक्तियां है मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी ‘विद्रोही’ की. बचपन से आज तक उनकी कितनी ही कहानियां पढ़ी हैं और कितनी ही कहानियां पढ़ना बाकी है, लेकिन उनकी कुछ कहानियां ऐसी हैं जो आज भी जहन में ताजा हैं. उनकी कहानियां सिर्फ कहानियां नहीं, बल्कि समाज का वो आईना है, जिससे हम भागते फिरते हैं.




munshi ji

आज अगर हिंदी के कहानीकारों, लेखकों, कवियों की बात करें, तो वक्त के साथ हम कई लेखकों की लेखनी को पढ़ चुके हैं लेकिन स्कूल के दिनों में सबसे पहले मुंशी प्रेमचंद की कहानियों से ही रूबरू हुए थे. साहित्य की दुनिया में एक अमिट लकीर खींचने वाले प्रेमचंद का आज जन्मदिवस है, आइए, इस मौके प्रेमचंद की जिंदगी के पन्नों को एक बार फिर से पलटते हैं.



8 साल की उम्र में मां का देहांत

प्रेमचंद का बचपन का नाम धनपतराय था. बचपन ना सिर्फ घोर गरीबी में बिता बल्कि प्यार और ममता की छांव का भी अभाव रहा. मां उस वक्त गुजर गई जब 8 साल की उम्र में प्रेमचंद को मां होने के मायने भी नहीं पता थे. पिताजी ने दूसरी शादी कर ली. दूसरी मां पिताजी की पत्नी तो बन गई लेकिन नन्हे प्रेमचंद की कभी मां नहीं बन पाई. घर में गरीबी और तंग हालातों को लेकर आए दिन झगड़ा होता रहता था.



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प्रेमचंद की पहली शादी और प्रेम का अभाव

‘उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी. जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया. उसके साथ-साथ जुबान की भी मीठी न थी.  उन्होंने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है, ‘पिताजी ने जीवन के अंतिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया. मेरी शादी बिना सोचे समझे कर डाली. प्रेमचंद ने अपनी एक कहानी में अपने जीवन के इस कड़वे अनुभव को कुछ इन शब्दों में उकेरा है.



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बाल विधवा से की दूसरी शादी, मच गय था बवाल

प्रेमचंद सिर्फ समाज के पतन और बदलाव की कहानियां ही नहीं लिखते थे बल्कि उन्होंने खुद अपने जीवन में भी एक ऐसा कदम उठाया था, जो उस वक्त के समाज के लिए किसी अपराध से कम नहीं था. 1905 के आखिरी दिनों में प्रेमचंद ने बाल विधवा हो चुकी शिवरानी देवी से शादी करने का फैसला लिया. शिवरानी से शादी के बाद कई समाजों ने उनका बहिष्कार भी किया लेकिन उन्होंने अपने फैसले को नहीं बदला. शिवरानी से शादी का फैसला उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव लेकर आया. उनकी जिंदगी में पहली बार प्यार की दस्तक हुई और घर एक स्वर्ग जैसा बन गया.

प्रेमचंद के नाम के आगे मुंशी क्यों लगाया जाता है इसके बारे में कुछ दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता लेकिन माना जाता है कि प्रेमचंद अध्यापक थे, उन दिनों अध्यापकों को मुंशी कहकर सम्बोधित किया जाता था. वहीं कुछ लोगों का ये भी मानना है कि प्रेमचंद कायस्थ थे इसलिए उन्हें प्यार से सम्बोधित करते हुए मुंशी कहा गया. …Next


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