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अगर कर्ण धरती को मुट्ठी में नहीं पकड़ता तो अंतिम युद्ध में अर्जुन की हार निश्चित थी

हिन्दुओं का एक प्रमुख काव्य ग्रंथ महाभारत, भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ है जिसे विश्व का सबसे लंबा साहित्यिक गंथ माना गया है. इस काव्य के अंदर निभाए गए हर एक किरदार, श्लोक, ज्ञान आदि आज भी प्रत्येक भारतीय के लिए एक अनुकरणीय स्रोत रहे हैं. अगर किरदारों की बात की जाए तो हिंदुओं के इस प्रसिद्ध ग्रंथ में अंतरयामी भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर जिन दो पात्रों की अहम भूमिका रही है वह हैं विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कर्ण और अर्जुन.


Mahabharat


वैसे इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा और अंतिम दिनों में कौरवों की सेना के सेनापति कर्ण अपने प्रतिद्वंदी अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्धर थे जिसकी तारीफ भगवान श्रीकृष्ण ने भी की, लेकिन ऐसी क्या वजह रही कि युद्ध के अंतिम दिनों में कुंती पुत्र कर्ण निर्बल और असहाय हो गए?

सूर्य पुत्र कर्ण ने अपने जिंदगी के शुरुआती दिनों में ज्ञान, शक्ति, नाम और अधिकार प्राप्त करने के लिए काफी संघर्ष किया. ‘सूत-पुत्र होने की वजह से उनका हर जगह तिरस्कार किया गया. इन बाधाओं के बावजूद कर्ण ने तय कर लिया कि वह विश्व के श्रेष्ठतम धनुर्धर बनकर दिखाएंगे और अपना सम्मान हासिल करके रहेंगे, लेकिन अपने इसी जद्दोजहद के बीच वह कई बार गलतियां भी करते गए. उनकी इन्ही गलतियों ने कौरवों और पांडवों के युद्ध में उनको कमजोर बना दिया था.


आइए जानते हैं कर्ण की उन गलतियों को जिनसे वह लगातार कमजोर होते चले गए.

गुरु परशुराम से श्राप:


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जगह-जगह तिरस्कार के बाद सूर्य पुत्र कर्ण ब्राह्मण के भेष में शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरु परशुराम के पास गए. कर्ण की योग्यता को देखते हुए महर्षि परशुराम ने उन्हें शिक्षा देने का निर्णय लिया.


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शिक्षा के अन्तिम चरण में एक दिन परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर विश्राम कर रहे थे. कुछ देर बाद कहीं से एक जहरीला बिच्छू आया और कर्ण की दूसरी जंघा पर काट कर घाव बनाने लगा. गुरु परशुराम का विश्राम भंग ना हो इसलिए कर्ण बिच्छू को दूर ना हटाकर उसके डंक को सहते रहे. कुछ देर में गुरुजी की निद्रा टूटी, और उन्होंने देखा की कर्ण की जांघ से बहुत रक्त बह रहा है. वह काफी हैरान हो गए. उन्होंने कहा कि केवल किसी क्षत्रिय में ही इतनी सहनशीलता हो सकती है कि वह बिच्छू डंक को सह ले, ना कि किसी ब्राह्मण में.


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उन्हें कर्ण पर शक हुआ. कर्ण ने जब सत्य बताया कि वह ब्राह्मण नहीं हैं तो परशुरामजी ने उन्हें मिथ्या भाषण के कारण श्राप दिया कि जब भी कर्ण को उनकी दी हुई शिक्षा की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, उस दिन वह उनके काम नहीं आएगी. हालांकि कर्ण को क्रोधवश श्राप देने पर परशुराम को ग्लानि हुई पर वे अपना श्राप वापस नहीं ले सकते थे. तब उन्होंने कर्ण को अपना ‘विजय’ नामक धनुष प्रदान किया और ये आशीर्वाद दिया कि उन्हें वह वस्तु मिलेगी जिसे वह सर्वाधिक चाहते हैं. वैसे कुछ लोककथाओं में माना जाता है कि बिच्छू के रूप में स्वयं इन्द्र थे, जो उनकी वास्तविक क्षत्रिय पहचान को उजागर करना चाहते थे.


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परशुराम के इस श्राप के कारण कर्ण कुरुक्षेत्र के निर्णायक युद्ध में ब्रह्मास्त्र चलाना भूल गए थे नहीं तो वह युद्ध में अर्जुन का वध करने के लिए अवश्य ही अपना ब्रह्मास्त्र चलाते. उधर अर्जुन भी अपने बचाव के लिए अपना ब्रह्मास्त्र चलाते जो पूरी पृथ्वी के विनाश का कारण बनता.


पृथ्वी माता से श्राप

लोक कथाओं के अनुसार एक बार कर्ण कहीं जा रहे थे, तब रास्ते में उन्हें एक कन्या मिली जो अपने घडे़ से घी के बिखर जाने के कारण रो रही थी. जब कर्ण ने उसके सन्त्रास का कारण जानना चाहा तो उसने बताया कि उसे भय है कि उसकी सौतेली मां उसकी इस असावधानी पर रुष्ट होंगी. कृपालु कर्ण ने तब उससे कहा कि बह उसे नया घी लाकर देंगे. तब कन्या ने आग्रह किया कि उसे वही मिट्टी में मिला हुआ घी ही चाहिए और उसने नया घी लेने से मना कर दिया. तब कन्या पर दया करते हुए कर्ण ने घी युक्त मिट्टी को अपनी मुठ्ठी में लिया और निचोड़ने लगा ताकि मिट्टी से घी निचुड़कर घड़े में गिर जाए. इस प्रक्रिया के दौरान उसने अपने हाथ से एक महिला की पीड़ायुक्त ध्वनि सुनी. जब उसने अपनी मुठ्ठी खोली तो धरती माता को पाया. पीड़ा से क्रोधित धरती माता ने कर्ण को श्राप दिया कि एक दिन उसके जीवन के किसी निर्णायक युद्ध में वह भी उसके रथ के पहिए को वैसे ही पकड़ लेंगी जैसे उसने उन्हें अपनी मुठ्ठी में पकड़ा है, जिससे वह उस युद्ध में अपने शत्रु के सामने असुरक्षित हो जाएगा.


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कुरुक्षेत्र के निर्णायक युद्ध में यही हुआ. उस दिन के युद्ध में कर्ण ने अलग-अलग रथों का उपयोग किया, लेकिन हर बार उसके रथ का पहिया धरती मे धंस जाता. इसलिए विभिन्न रथों का प्रयोग करके भी कर्ण धरती माता के श्राप से नहीं बच सका और युद्ध हार गया.


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असहाय पशु को मारने पर श्राप

परशुरामजी के आश्रम से शिक्षा ग्रहण करने के बाद, कर्ण कुछ समय तक भटकते रहे. इस दौरान वह शब्दभेदी विद्या सीख रहे थे. अभ्यास के दौरान कर्ण ने एक गाय के बछड़े को कोई वनीय पशु समझ लिया और उस पर शब्दभेदी बाण चला दिया और बछडा़ मारा गया. तब उस गाय के स्वामी ब्राह्मण ने कर्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार उसने एक असहाय पशु को मारा है, वैसे ही एक दिन वह भी मारा जाएगा जब वह सबसे अधिक असहाय होगा और जब उसका सारा ध्यान अपने शत्रु से कहीं अलग किसी और काम पर होगा.

इसके अलावा कर्ण ने अपने मित्र दुर्योधन के साथ रहकर कई अधर्म कृत्य किए जो कुरुक्षेत्र के निर्णायक युद्ध में असहाय और अस्त्र विहीन होने की वजह बन गए.


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