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महजब के नाम

awaaz
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महजब के नाम पर मचा कोहराम कैसा है,
देश के बंटवारे का आगाज कैसा है.

 

 

दंगों में अपनों को जलाने का अंदाज कैसा है,
खून की नदियांं बहने पर आकाल कैसा है.

 

 

गूंगी जबानों की आंंखों का संवाद कैसा है,
बंद कमरों की सिसकियों का हाहाकार कैसा है.

 

 

सुबह के उजाले में रात के अंधरे का अधिकार कैसा है,
प्यार में छुपा नफ़रत का आवेश कैसा है.

 

 

नयी पीढ़ी के कंधोंं पर महजब का अनचाहा भार कैसा है,
घर के चिराग से घर (देश) के जलने का आभास कैसा है.

 

 

महजब के नाम पर मचा कोहराम कैसा है,
देश के बंटवारे का आगाज कैसा है.

 

 

 

नोट : यह लेखक के निजी विचार हैं और इसके लिए वह स्‍वयं उत्‍तरदायी हैं। इससे संस्‍थान का कोइ लेना-देना नहीं है।

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