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मेरी आवाज़

awaaz
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मेरे पैदा होने पर ये गम के साये क्यों है,
मेरे होठो की हंसी में ये दर्द की आहे क्यों है,
मेरी आजादी में भी बेड़ियो जैसी जकड़न क्यों है,
मेरे आखों के आसुंओ में किसी के दिल का सुकून क्यों है
मेरी सिसकिया लोगो को कर्णप्रिय संगीत लगाती क्यों है,
मेरी खमोशी में भी भयानक हाहाकार क्यों है,
मेरे चारो तरफ भीड़ होते हुए भी मेरी अंतरात्मा तन्हा क्यों है,
मेरी सुबह में भी अमावस की रात जैसा अंधकार क्यों है,
मेरे जिंदा होने पर भी मुझे हर पल मुर्दा होने का अहसास क्यों है,
मेरे मन पे लगे घाव किसी के अंहकार का पोषण क्यों है,
मेरा स्वाभिमान मेरे घमंडी होने का प्रतिक क्यों है
मेरी सर उठा कर जीने की चाह हर युग में बेदर्दी से कुचली क्यों है,
मेरे अरमानो का गला सम्मान इज्ज़त की तलवारों से हर बार कटा क्यों है,
मेरे को सहनशील का तवगा देकर हर जुर्म सहने को बाध्य किया क्यों है,
मेरे को सीता जैसी पूजनीय कहा कर अग्निपरीक्षा की बेदी चढ़ाया क्यों है,
मेरी ही रिश्तो के नाम हर बार बलि दी क्यों है
मेरी स्वतंत्र के नाम पर मुझे पर ही पहरे लगाये क्यों है,
मेरा अपने हको के लिए आवाज़ उठाना मेरी उदंडता समझी जाती क्यों है,
मेरे चरित्र चंद चिथड़ो के पैमानो का मोहताज क्यों है,
मेरे तन से हर व्ह्शी को खिलवाड़ करने का अधिकार क्यों है,
मेरे पर हुये अत्याचार का मुझे ही दोषी ठहरते क्यों है,
मेरे साथ हुए दुष्कर्म के लिए मुझे ही अपराधबोध करते क्यों है,
मेरी जीती जागती मूरत को पैरो तले रोंध कर मंदिर में मेरी पत्थर की मूरत को पूजते क्यों है,
मेरे को बोझ कहा कर मरते हो फिर मेरी खरीद फरोख्त का शोक पला क्यों है,
मेरे से ही स्रष्टि का अस्तित्व है फिर अपने अस्तित्व के लिए हर पल मुझे लड़ना क्यों है,
मेरे पैदा होने पर ये गम के साये क्यों है,
मेरे होठो की हंसी में ये दर्द की आहे क्यों है,
आज में फिर खुद से यह वादा करुगी,
अपनी अंतरात्मा की आवाज़ अब और न दबाने दुगी,
अपने अस्तित्व के लिए मैं पूरी हिम्मत से लडूगी,
अपनी अहमियत इस पुरुष-प्रधान समाज को समझाऊगी
अपना सम्मान अब किसी को न रोधने दुगी,
अपने अरमानो का अब और न गला घोटूगी,
स्रष्टि का केंद्र हूँ में यह सब को बताऊगी,

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