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पत्रकारिता का बदलता स्वरूप

Hitendra Pratap Singh Rathore

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स्वतंत्र भारत में सुशासन की स्थापना तथा अधिकारों एवं कर्तव्यों के निर्वहन के लिए संविधान को मूर्त रूप दिया गया। विधिवत लोकतंत्र की सुगठित किया गया। इसकी रक्षार्थ विभिन्न स्तंभों को शक्ति संतुलित किया गया, जिसमें कार्यपालिका,विधायिका एवं न्यायपालिका को पूज्य स्थल के रूप में परिष्कृत किया गया। लेकिन भारतीय समाज के प्रधान पुरुषों एवं सर्वोच्च बुद्धिजीवियों ने उक्त स्तंभों के हाथों लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का निर्वहन कठिन माना तथा इन तीनों की सहायता के लिए मीडिया (पत्रकारिता) को चतुर्थ स्तंभ की सर्वमान्य संज्ञा से विभूषित किया गया। कालांतर में मीडिया ने इस संज्ञा को अक्षरशः चरितार्थ किया। मीडिया की लोकप्रियता एवं विश्वसनीयता का मुख्य कारण इसका प्रहरी के रूप में कार्य करना रहा है।

मीडिया ने समाज के विभिन्न मुद्दों को मुखर रूप से जन सामान्य के मध्य उठाकर लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सामाजिक हाशिए पर स्थित लोगों को उनके अधिकारों से अवगत कराया। उनके लिए कानूनी प्रावधान बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। सामाजिक हित में कार्य करते हुए कई मीडिया कर्मियों ने आत्मोंत्सर्ग भी किया, लेकिन अपनी साख को हमेशा बचाए रखने का प्रयास किया। पत्रकारों द्वारा पत्रकारिता करते करते वंचित लोगों को उनके अधिकार दिलाने के लिए राजनीति का रुख भी किया तो वहां पर सर्वोच्च सैद्धान्तिक राजनीति की तथा राजनेताओं के मध्य मिसाल भी बने।

यह पत्रकारिता का एक दौर था जिसमें ज्ञान तथा सिद्धांतों को पूजनीय माना गया। उनके साथ समझौता सदैव दुर्लंघ्य माना गया। अपने पत्रकारिता के सिद्धांतों का निर्वहन करते करते कईं मीडियाकर्मी मूर्त प्रतिमान बन गए। उस दौर में मीडिया कर्मियों का कार्य समाज के वंचितों के अधिकार दिलाना, सरकारों को पथभ्रान्त होने से बचाना, मौलिक अधिकारों की रक्षार्थ आवाज उठाना, सामाजिक कुरीतियों को मिटाने में सहयोग करना, जन आंदोलन के माध्यम से जन जागरूकता फैलाना, संवेदनशील मुद्दों को जिम्मेदारों की जानकारी में लाना और बहु विमीय पत्रकारिता के माध्यम से जिम्मेदार प्रशासन की स्थापना में सहयोग करते हुए लोकतंत्र तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना हुआ करता था।

ज्यों ज्यों भारतीय लोकतंत्र की उम्र बढ़ती गई देश में विकास की रफ्तार से कई नई विधाओं का प्रचार-प्रसार हुआ, जिससे मीडिया भी अछूता नहीं रहा और मीडिया के भी विविध माध्यम प्रकाश में आए । जिसमें प्रिंट मीडिया के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया आदि। सूचना तीव्र गति से संचारित होने लगी। कई प्रकार के नव बौद्धिक लोग पेशेवर मीडिया कर्मी बनने लगे, जिनके लिए अनुभव, सिद्धांत तथा ज्ञान गौण हो गए । उनके लिए भाषायी वांगमय तथा प्रभावी संप्रेषण के साथ-साथ ‘Good looking factor’ मुख्य आयाम बन गए। विशेष तौर से दृश्य मीडिया (टीवी,सोशल मीडिया) का तीव्र उभार होने लगा। सैद्धान्तिक पत्रकारिता के स्थान पर ‘Professionalism’ (so called) को महत्व दिया जाने लगा, जिससे मीडिया समूह अंकुरित होने लगे जो कॉरपोरेट मीडिया का वाहक बने। पत्रकारिता अब कॉरपोरेशन बनने लगी तो न्यूज़ विज्ञापन की मोहताज हो गई। अब न्यूज़ वही बनने लगी जो विज्ञापन ला सकती है। यानी न्यूज़ के मानक उसकी संवेदनशीलता या सामाजिक सरोकार नहीं होकर अंकगणितीय आंकड़े (TRP) होने लगे।

वंचित समूह के अधिकार द्वितीयक तो धनकुबेरों कि पोपलीला टीवी न्यूज़ चैनलों का मुख्य आकर्षण बनने लगे। कौन सा न्यूज़ चैनल किसी न्यूज़ का शीर्षक कितना अनोखा एवं हैरतअंगेज बना सकता है। इसकी होड़ रहने लगी। खबर अब खबर नहीं रह, वह चटपटी खबर हो गई। खबरों का मूल भाव नदारद हो कर उसमें रोमांच उकेरा जाने लगा। न्यूज़ चैनलों के द्वारा अजीबोगरीब नामों के दैनिक प्रसारण दिखाना आम बात हो गई। टीआरपी की अंधी दौड़ में पत्रकारिता का दैनिक कत्ल होने लगा। वर्तमान मीडिया (टीवी चैनल) के पैमाने कि ,,,,कौन सा संवाददाता कितना तेज और असभ्य बोल सकता है,किसी भी मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष की कितनी बेइज्जती कर सकता है तथा स्वयं कितना जलील हो सकता है,,, आदि हो गए। लोगों में शंका पैदा करना तथा उन को हैरत में डालना आज की खबरों का उद्देश्य है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है।

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं, जागरण डॉटकॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है।

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