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चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण ता ऊपर सुल्तान है मत चूके चौहान !

jagate raho

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मत चुके चौहान- यह कविता १२वीं सदी में पृथ्वीराज चौहान के राजकवि चन्द्रबरदाई की सदाबहार रचना है। उस समय हिन्दुस्तान छोटे-छोटे राज्यों में बिखरा हुआ था। राज्य इतने छोटे छोटे थे कि आज की तहसील की सीमा को नाप कर देखा जाय तो वह भी उस जमाने के राज्य से बड़ा निकलेगा। उस समय उत्तर भारत में एक शक्तिशाली राजवंश उभर कर आया जिसकी सीमा दिल्ली से अजमेर तक थी। उसका सम्राट था वीर शिरोमणी पृथ्वीराज चौहान।

पृथ्वीराज चौहान को इनके नाना जी ने गोद लिया था और नाना के बाद वे गद्दी पर बैठे थे। पृथ्वीराज चौहान जहां अपनी जनता की सुख सुविधा का ध्यान रखते थे, किसानों को सरकारी सहायता देकर खेतों में सोना उगा रहे थे। वहीं बाहरी शक्तियों से अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा पर भी कड़ी निगाह रखते थे। दुश्मनों के चक्रव्यू तोड़ने में उन्हें महारत हासिल थी। इसीलिये हिन्दुस्तान के तमाम छोटे बड़े रजवाड़े उनकी छत्र-छाया में शांति से अपने राज्य में विकास कार्यों को अंजाम दे रहे थे। लेकिन कुछ अपने मतलब को सिद्ध करने वाले कनौज जैसे राज्य भी थे, जो दिल्ली सम्राट के वैभव समृधि से जलते थे और पड़ोसी राज्यों के साथ लड़ते थे।

उधर, मोहम्मद गौरी गौर देश का सुलतान अपने देश की भूखमरी से निजात पाने के लिए बार-बार भारत की धन दौलत से आकर्षित होकर अपनी सेना के साथ भारत की सीमाओं पर लूटपाट के इरादे से आता था। सन ११९१ इ० में पृथ्वीराज चौहान और मोहमद गौरी का आमना-सामना हुआ था, जिसमें मोहमद गौरी की हार हुई थी और पृथ्वीराज चौहान के सैनिकों ने उसे कैद कर जेल में डाल दिया था। सच मुच में गौरी के सिपहालासार कोई ट्रेंड सैनिक नहीं थे ये चोर लुटेरे ही थे। इनका देश बहुत गरीब था और देश की जनता अन्न के दाने-दाने को तरसती थी। इसलिए बार बार ये लूट के इरादे से आते थे।

महाराजा पृथ्वीराज चौहान जहां एक सशक्त, वीर दिलावर, रणकौशल महान योद्धा था वहीं एक दयालु सम्राट भी था। मोहम्मद गौरी ने सम्राट से क्षमा याचना की प्राणों की भीख मांगी और सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने उसे प्राण दान दे दिए और कैद से उसे मुक्ति दे दी। वह वापिस अपने देश चला गया कभी वापिस न आने की शपथ लेकर।

इधर, हिन्दुस्तान के कोने कोने तक पृथ्वी राज चौहान के वीर प्रतापी सम्राट होने का समाचार फ़ैल चुका था। कन्नौज के राजा जय चंद की एक पुत्री थी नाम था संयुक्ता। वह बहुत सुन्दर चतुर और होशियार राजकुमारी थी। उसने पृथ्वीराज चौहान की महानता, वीरता और रणकौशल के बारे में सुना था और वह उन्हें ही अपना पति मान चुकी थी। राजकुमारी अपने लिए उपयुक्त वर चुन सके, जयचंद ने स्वयंवर का ऐलान किया। तमाम राज्यों के राजकुमारों को स्वयंवर में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया। लेकिन वैमंस्यवस प्रतापी सम्राट पृथ्वीराज चौहान को जानबूझ कर निमंत्रण नहीं भेजा।

संयुक्ता को जब मालूम हुआ की उसके पिता ने पृथ्वी राज चौहान को निमंत्र्ण नहीं भेजा है तो उसने एक निजी पत्र लिखकर अपने ख़ास विश्वासपात्र सेवक के हाथों पत्र सम्राट को पहुंचा दिया इस अनुरोध के साथ की ‘ वे आएं और अपनी संयुकता को यहां से ले जांय’। निश्चित दिन, सही समय पर पृथ्वीराज चौहान स्वयंबर स्थल पर पहुंचे और राजकुमारी संयुक्ता को सबके सामने अपने अश्व पर बिठाकर नौ दो ग्यारह हो गए। राजधानी दिल्ली पहुंंचकर उन्होंने विधिविधान से राजकुमारी संयुक्ता के साथ शादी की और संयुक्ता को महारानी का उच्च दर्जा देकर सम्मानित किया।

इधर जयचंद इस घटना से अपने को अपमानित महसूस करने लगा और गुस्से में आकर पृथ्वीराज चौहान से बदला लेने के लिए उसने सीधे गौरी से संपर्क कर दिया, और उसे दिल्ली पर आक्रमण करने का निमंत्रण दे दिया। साथ ही इस लड़ाई में गौरी की सेना को मदद देने का भी वचन दिया। गौरी ऐसे अवसर का ही इंतज़ार कर रहा था और ऐसे ही किसी गद्दार हिन्दुस्तानी से संपर्क साधने की चेष्टा कर रहा था। उसने बड़ी सेना लेकर दिल्ली पर अचानक आक्रमण कर दिया। जयचंद ने भी अपने सैनिकों के साथ गौरी का साथ दिया। जयचंद ने पृथ्वीराज चौहान की सेना के आगे बड़ी संख्या में गाय बछिया लगवा दी। अचानक इतनी सारी गाय बच्छियों को सेना के आगे देखकर सेना का मनोबल कमजोर पड़ गया, गायों को कोई नुकसान न पहुंचे। इसलिए पृथ्वीराज चौहान के सैनिको ने दुश्मनों पर बाण और गोली चलाना बंद कर दिया।

उधर गौरी की सेना ने मौक़ा पाकर पृथ्वीराज सहित सारी सेना को घेर कर मारना शुरू कर दिया। इस तरह ११९२ इ० का तराई का युद्ध गौरी ने छल और बल से जीता। पृथ्वीराज की सेना बड़ी संख्या में मारी गयी। पृथ्वीराज चौहान अपने राज कवि चंद्र्वरदाई के साथ कैद कर लिए गए। सम्राट पृथ्वीराज चौहान की दोनों आंखें निकलवा दी गईं। इतिहास कहता है कि पृथ्वीराज चौहान लड़ाई में शहीद हो गए थे और महारानी संयुक्ता पति के साथ सती हो गयी थीं। लेकिन, पृथ्वीराज चौहान नाम से एक पिक्चर बनी थी, जिसमें दिखाया गया था की गौरी ने लड़ाई जीतने के उपलक्ष में एक समारोह का आयोजन किया, जिसमें उसने अपने सैनिकों और वफादार मददगारों को पारितोषिक और इनाम देकर सम्मानित किया। सबको कुछ न कुछ मिला।

अब बारी आई जयचंद की, जयचंद को उम्मीद थी की सुलतान गौरी उसे कोई बड़ी जागीर या इज्जतदार ओहदा देकर सम्मानित करेगा। वह गौरी के सामने पेश हुआ अपना इनाम लेने के लिए। गौरी ने कहा, “तुमने मुझे दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए बुलाया, अपनी सेना और रसद द्वारा हमारी मदद की। मुझे हिन्दुस्तान बुलाकर तमने अपने लड़की और दामाद के साथ-साथ अपने देश, कौम और अपनी जनता को ही धोखा दे दिया। वास्तव में तुम्हें तो इस गद्दारी के लिए बड़ा इनाम मिलना चाहिए। सुलतान ने अपने गुलाम को तलवार देते हुए कहा, “दे दो इस गद्दार को इनाम इसकी गर्दन उतार कर “। इस तरह जयचंद को अपनी गद्दारी का उचित इनाम दिया गया।

हां तो सबको कुछ न कुछ देकर अपने गुलाम कुतुबद्दीन को दिल्ली की गद्दी पर बिठाकर, सुलतान मोहमद गौरी पृथ्वीराज चौहान और कवि चन्द्रवरदाई को लेकर सेना के साथ गौर देश लौट गया बहुत सारा धन दौलत के साथ। वहां उसे पता चला की पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण चलाने में माहिर है। भारत में अभी तक तीन ही शब्दभेदी बाण चलाने वालों का वर्णन मिलता है। त्रेतायुग में चक्रवर्ती सम्राट महाराज दशरथ, जिन्होंने जंगल में शिकार खेलते वक्त सरवण कुमार पर जो अपने अंधे मां पिता के लिए पानी भर रहा था। उसे मृग समझ कर शब्दभेदी वाण चला कर मार डाला था। उसके मां पिता जी ने ही चक्रवर्ती सम्राट को शाप दिया” जा जैसे हम अपने पुत्र के वियोग में तड़प-तड़प कर मर रहे हैं वैसे ही तुम भी तड़प तड़प पुत्र वियोग में मरोगे “।

दूसरा द्वापर में एक भील ने मृग समझ कर शब्दभेदी वाण श्री कृष्ण भगवान के पांव के छते पर मारा था, जिससे भगवान के शरीर का रक्त बड़ी तेज गति से निकल गया था और बाद में उसी के कारण श्री कृष्ण भगवान बैकुण्ठ चले गए थे। जब भील को पता लगा की उसने गलती से भगवान श्री कृष्ण के पांव पर शब्दभेदी वाण मारा है तो उसे बड़ी ग्लानि, उसने भगवान के चरणों में अपना सिर रख कर माफी मांगी। भगवान ने कहा “नहीं तुम्हारी कोई गलती नहीं है तुमने केवल अपना बदला मुझसे लिया है”। भील को सुनकर बड़ा अटपटा सा लगा, उसने पूछा, “भगवन एक नाचीज, चिड़िया जैसे निष्पाप प्राणियों को मार कर उदर पूर्ती करने वाला भील भला साक्षात भगवान से क्या बदला ले सकता है ?” तब भगवान ने कहा, “त्रेता में मैं राम अवतार के रूप में धरती पर आया था, तुम बाली थे।

तुमने ब्रह्मा जी की अटूट तपस्या की थी और उन्होंने तुम्हे वरदान दिया था की जो भी तुम्हारा दुश्मन तुम्हारे साथ आमने सामने होकर लडे़गा उसकी आधी शक्ति तुम्हारे पास आ जाएगी। क्यों की तुमने अपने छोटे भाई सुग्रीब की पत्नी को उससे छीन कर अपनी पत्नी बनाकर बड़ा घोर पाप किया था और बिना अफ़राध के सुग्रीब को अपने राज्य से निकाल बाहर किया था, सुग्रीव मेरा मित्र था, उसकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य था। सामने से मैं वार कर नहीं सकता था और तुम्हे दंड देना भी आवश्यक था, इसलिए जब तुम दोनों भाई ‘बाली सुग्रीब’ आपस में लड़ रहे थे मैंने छिप कर वाण मारा और तुम्हे यमलोक पहुंचा दिया । आज उसी का बदला तुमने मुझसे लेकर हिसाब बराबर कर दिया है “।

इस कलयुग में तीसरा शब्दभेदी बाण चनाने वाला था प्रतापी सम्राट पृथ्वीराज चौहान। गौर देश में पृथ्वीराज चौहान अपने शब्दभेदी बाण चलाने का इम्तहान देने जा रहे थे। मोहम्मद गौरी एक बहुत ऊंचे स्थान पर बैठा था। पृथ्वीराज चौहान और उनके राजकवि चन्द्रवरदाई उनके साथ ही नीचे जमीन पर बैठे हुए थे। २५ गज ऊंचाई पर घंटा टंगा हुआ था। महाराज पृथ्वीराज चौहान अंधे कर दिए गए थे। उन्हें केवल घंटे की आवाज पर ही निशान लगाना था। पूरी दूरी डिग्री, बांये-दाहिने का हिसाब लगाकर कवि ने सबको सुनाकर अपने सम्राट पृथ्वीराज चौहान को यह जानकारी दी, “चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण ता उपर सुलतान है मत चुके चौहान”।

चौहान ने अपनी अंगुलियों में गणना की और जैसे ही घंटा बजा बजाय घंटे के सीधे सुलतान को ही निशाना बना दिया। धनुष से शब्दभेदी बाण छूटा और जा कर सीधे लगा सुलतान मोहम्मद गौरी के सीने पर। बाण लगते ही गौरी अपने तख़्त से लुढ़कर सीधे नीचे आ गया और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। उसके मरते ही उसकी सेना में हलचल मच गयी और पुलिस और सेना पृथ्वीराज और चन्द्रवरदाई को मारने उनकी ओर भागने लगे, लेकिन उनके आने से पहले ही दोनों ने छुरियों से जो पहले ही उनहोंने अपने पास तैयार रखी थी एक दूसरे के सीने पर घोंप दी और इससे पहले की किसी तुर्क का हाथ उन तक पहुंचता वे दोनों स्वर्गवासी हो गए। उसी दिन से यह मिशाल चल पड़ी “मत चुके चौहान”।
जयहिंद – जय भारत । हरेंद्रसिंह रावत (अमेरिका से )

 

डिस्क्लेमर- उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉटकॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।   

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