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शरद यादव और नीतीश कुमार के सामने नई चुनौतियां?

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हरेश कुमार

बिहार में हालांकि, कांग्रेस और निर्दलियों के समर्थन से जनता दल यूनाइटेड सरकार विश्वास मत प्राप्त करने में सफल हो गया है, लेकिन उसके सामने अब नई-नई चुनौतियां आने लगी है, जिसका सामना उसे निकट भविष्य में करना होगा? शरद यादव अब ना तो एनडीए संयोजक पद पर रहे और ना ही अपने निर्वाचन क्षेत्र में मजबूत भारतीय जनता पार्टी को झेलने की कूबत इनमें है। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी का इस क्षेत्र में अच्छा जनाधार है।

शरद यादव के सामने जो दूसरी सबसे बड़ी समस्या है वह है जनता दल यूनाइटेड के एक अन्य सांसद आर सी पी सिन्हा के साथ 2जी स्पेक्ट्रम स्कैम के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति में हैं और वे सदा से ही कांग्रेस विरोधी स्टैंड के लिए जाने जाते रहे हैं। वे, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, सुशील मोदी, अश्विनी चौबे, राम विलास पासवान जैसे कई नेता आपातकाल की उपज हैं। राजनीतिक जरूरतों को भांपते हुए लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान ने तो कांग्रेस के साथ गठबंधन भी किया और अभी तक ये नेता गण कांग्रेस के साथ जुड़े हैं। हालांकि प्रधानमंत्री, मनमोहन सिंह और कांग्रेस उपाध्यक्ष, राहुल गांधी ने नीतीश कुमार को धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट देते हुए उस स्थापित सत्य को एक बार फिर से उद्धृत किया है कि राजनीति में ना तो कोई स्थायी दोस्त होता है और ना ही कोई दुश्मन!

वैसे देखा जाये तो नीतीश कुमार और कांग्रेस का साथ होने से सबसे ज्यादा झटका लालू प्रसाद यादव को लगने वाला है। हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि कांग्रेस का बिहार में कोई मजबूत जनाधार रहा नहीं और पिछले कई चुनावों से वह कभी लालू के साथ तो कभी विरोधी दल के तौर पर चुनावों में उतर चुका है, लेकिन किसी मजबूत नेता के अभाव में बिहार की जनता कांग्रेस को वह भाव नहीं दे रही है जो 1989 के पहले था।

अब देखना बाकि है कि शरद यादव अपने बातों पर खड़े उतरते हैं या वे भी राजनीतिक अंदाज में अपनी ही बातों से मुकर जाते हैं, यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा? जैसा कि शरद यादव ने कहा था कि कांग्रेस के साथ जाने से अच्छा है कि जहर खा लूंगा या फिर शरद यादव की गति जॉर्ज फर्नांडीस (जॉर्ज फर्नांडीस ने ही नीतीश कुमार और अन्यों के साथ मिलकर समता पार्टी की स्थापना की थी, जो बाद में जनता दल यूनाइटेड बना) की तरह होती है। सबको पता है कि किस तरह से जॉर्ज फर्नांडीस अपने लोकसभा चुनाव क्षेत्र, मुजफ्फरपुर से लड़ना चाहते थे, लेकिन नीतीश कुमार ने उनके स्थान पर, जय नारायण निषाद को टिकट दिया और वे जेडीयू से लोकसभा में पहुंचे। बाद में फजीहत होने के बाद, फर्नांडीस को राज्यसभा से भेजा गया। यहां सवाल यह उटता है कि अगर, जॉर्ज फर्नांडीस बीमार और अशक्त थे और लोकसभा में कार्य के योग्य नहीं थे, तो राज्यसभा में किस तरह से यही योग्य हो गए? इस पूरे प्रसंग में नीतीश ने किस तरह से कुटिल चालें चली, राजनीति का ककहरा जानने वाले सभी समझ सकते हैं।

एक तरफ, शरद यादव के सामने अपने को नए सिरे से स्थापित करने की चुनौती है (इससे पहले शरद यादव, बिहार में लालू प्रसाद के राजनीतिक गुरु थे, जैसा कि लालू प्रसाद यादव 1989 के बाद से कहा करते थे तथा लालू यादव ने ही उन्हें मधेपुरा जैसे यादव बहुल क्षेत्र, जिसे यादवों का रोम भी कहा जाता है, लोकसभा में भेजा था, बाद में दोनों में ऐसी शत्रुता हुई कि दोनों एक-दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि आने वाले समय में वे फिर से एक-दूसरे के साथ आ जायें।

अगर कांग्रेस, नीतीश कुमार के साथ जाती है तो लालू प्रसाद को भी नए सिरे से अपनी पार्टी को खड़ा करने एवं केंद्र में एक मजबूत नेता की जरूरत होगी जो उनकी बातों को दमदार तरीके से रख सके और शरद यादव में यह गुण है।) तो दूसरी तरफ, नीतीश कुमार उनसे भी बड़ी समस्याओं को आने वाले समय में झेलने वाले हैं। पार्टी के अंदर से कई विधायक अपने लिए बेहतर पद चाहते हैं। पार्टी का एक धड़ा, राजपूत वोट पर मजबूत दावेदारी के लिए, कृषि मंत्री, नरेंद्र सिंह को सुशील मोदी के स्थान पर उप-मुख्यमंत्री का पद चाहता है। इस धड़े का मानना है कि राजपूत वाटों को राष्ट्रीय जनता दल की ओर जाने से रोकने के लिए वर्तमान में इससे अच्छा चेहरा पार्टी के पास नहीं है। इसके समर्थन में महाराजगंज में हुए उपचुनाव में जेडीयू की हार को उदाहरण के तौर पर पेश किया जा रहा है, जहां राजपूत मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या है। दूसरा धड़ा जेडीयू के बाहुबली और भूमिहार वोटों पर पकड़ रखने वाले एवं नीतीश कुमार के नज़दीकी, अनंत कुमार सिंह को मंत्री पद पर देखना चाहता है तो एक अन्य धड़ा विजेंद्र यादव को डिप्टी सीएम के पद पर देखना चाहता है। यानि जितनी मुंह उतनी बातें।

अब नीतीश कुमार को अपने विधायकों को साथ रखना एक नई चुनौती होगी, इससे पहले वे भाजपा के 91 विधायकों के कारण इन सबको टरकाने में सक्षम थे, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में हालत बदल गए हैं। सो, अब किसी भी विधायक की मांगों को अनसुना करना नीतीश कुमार के लिए पहले की तरह आसान नहीं होगा।

अभी तो शुरुआती झलक है, देखते रहिए आगे-आगे होता है क्या? राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, समर्थन देने वाले एक निर्दलीय विधायक ने अपने लिए इस आधार पर गृह मंत्रालय की मांग तेज कर दी है कि वह पहले पुलिस-इंस्पेक्टर रह चुका है। भाजपा के पास संयुक्त सरकार में वित्त, स्वास्थ्य, सड़क निर्माण, पशुपालन विभाग, मत्स्य और पर्यटन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय था। अब दोनों दलों में राजनीतिक तौर पर तलाक के बाद से जेडीयू के पास इन मंत्रालयों को संभालने के लिए अनुभवी नेताओं की कमी है। इससे पहले, राष्ट्रीय जनता दल से आए नेताओं को नीतीश कुमार ने कई महत्वपूर्ण मंत्रालय का दायित्व दे रखा था।

ऐसा लगता है कि अनुभवी मंत्रियों की कमी से राज्य में नौकरशाही हावी होगी, जिसका डर पहले से कई लोगों को सता रहा है और इस कारण से विकास कार्य भी प्रभावित होने की पूरी संभावना है।

अब देखना बाकि है कि नीतीश कुमार आने वाले समय में किस तरह से अपनी सरकार को बचाते हुए पार्टी की जड़ों को मजबूत करते हैं या उनका हाल भी अन्य नेताओं की तरह होने वाला है, यह तो वक्त ही बतायेगा? जो धूमकेतु की तरह उगते तो हैं, लेकिन बाद में कहां जाते हैं किसी को ख़बर तक नहीं होती। लेकिन नीतीश कुमार जैसे मंजे हुए राजनीतिक खिलाड़ी के लिए अभी से कुछ भी कहना जल्दीबाजी होगी?

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