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‘सामंजस्य’

Shishir Ghatpande Blogs

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‘सामंजस्य’, पढ़ने-बोलने में तो साढ़े ५ अक्षरों का ये शब्द बेहद साधारण सा लगता है लेकिन शायद संसार के सबसे महत्वपूर्ण, अर्थपूर्ण, बेहद ज़रूरी और यथार्थ रूप में अंगीकार किये जाने वाले अनिवार्य शब्दों में से एक है. अब ज़रा इसे विस्तार से समझें:

दुनिया भर के देशों के बीच,
देशों में राज्यों के बीच,
राज्यों में शहरों के बीच,
शहरों में गाँवों के बीच,
समाज में समुदायों के बीच,
समुदायों में जातिगत वर्णों के बीच,
परिवार में सदस्यों के बीच,
आपस में मित्रों के बीच,
सरकारों और जनता के बीच,
कारोबार में साझेदारों के बीच,
अधिकारियों और कर्मचारियों बीच,
यदि सामंजस्य ना हो तो क्या होगा? ‘विध्वंस’….

ख़ैर, ये तो विस्तार से समझाने मात्र के लिये था, आज मैं बात करुँगा केवल ‘पारिवारिक सामंजस्य’ की.
अपने माता-पिता, बहन-भाईयों, संगी-साथियों, इष्टजनों, घर के प्यार-लाड़-दुलार को सदा के लिये छोड़कर लड़की जब ब्याहकर ससुराल आती है तो उसकी यही अपेक्षा रहती होगी कि अपने इस नए घर-परिवार, नवजीवन में उसे सबकुछ बिल्कुल वैसा ही मिले, जो वो पीछे छोड़ आई है. शायद यही कामना करती होगी कि माता-पिता के रूप में सास-ससुर मिलें, बहन के रूप में ननद मिले, भाई के रूप में जेठ-देवर मिलें, सहेलियों के रूप में जेठानी-देवरानी मिलें. और होना भी बिलकुल ऐसा ही चाहिये, क्योंकि जिस घर-परिवार-अपनों ने उसे लाड़-प्यार-दुलार से पाल-पोसकर बड़ा किया, उसे और अपनी सुमधुर स्मृतियों को एक ही झटके में अचानक छोड़कर चले आना इतना आसान नहीं होता.

इसीलिये, उसके इस नए घर के सदस्यों, नए परिवार का ये दायित्व बन जाता है कि उसके साथ बिल्कुल वैसा ही व्यवहार करें, जैसा कि वो अपने परिवार की बहन-बेटियों के साथ करते हैं. तो अब बेहद महत्वपूर्ण सवाल ये उठता है कि क्या वो ऐसा नहीं करते? तो इस सवाल का जवाब फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी होगा. क्योंकि हमें हमारे आस-पास ही दोनों तरह के उदाहरण मिल जाएँगे जहाँ बहू को सिर्फ़ बहू का और बहू को बेटी का दर्जा भी दिया गया है.

तो आख़िरकार ये असमानता-विषमता-भिन्नता या भेदभाव क्यों? और इसका ज़िम्मेदार कौन? वो नव कुलवधु, उसका नया परिवार अथवा नए परिवार के सदस्य?

दरअसल जब लड़की ब्याहकर अपने नए घर-परिवार में आती है तो उसके मन में यही इच्छा या भावना होती है कि यहाँ भी उसे वही माहौल, वही स्वतन्त्रता मिले जो मायके में मिलते थे. तो दूसरी ओर ससुराल में उससे ये अपेक्षा की जाती है कि वो स्वयं को ‘पूरी तरह’ इस घर के तौर-तरीक़ों, रीति-रिवाजों, रहन-सहन और माहौल के अनुरूप ढाल ले. और कई बार ये महीन-बारीक़ सी बात भी वर्चस्व और अहम् की लड़ाई बनकर विकराल रूप धारण कर लेती है, जिसका अंत होता है ‘पारिवारिक विध्वंस’ के रूप में.

बस!! यहीं इस शब्द ‘सामंजस्य’ की महत्ता सामने आती है. यदि दोनों ही पक्ष इस बात की गहराई को समझ लें कि घर-परिवार की सुख-समृद्धि-ख़ुशहाली के लिये बेहद ज़रूरी है, शान्ति. और घर-परिवार की शान्ति के लिये बेहद ज़रूरी है, अपने अहम् और अपनी अनावश्यक ज़िदों का त्याग. मसलन रीति-रिवाजों, रहन-सहन, परम्परा-सभ्यता-संस्कृति, घर के माहौल-वातावरण के नाम पर होने वाली कुछ अनावश्यक या ग़ैर ज़रूरी बातों का बोझ कुछ कम करते हुए ससुराल पक्ष द्वारा यदि परिवार की नई सदस्य को भी घर की बेटी के रूप में अपनाकर, वही रियायतें  सहूलियतें दी जाएँ जो सदा से घर की बेटियों को दी जाती रही हैं तो वहीं दूसरी ओर नई सदस्य भी नए परिवार के सदस्यों को वही मान-सम्मान, आदर-अपनापन दे जो वो अपने मायकेवालों को देती रही है, उनकी इच्छाओं और भावनाओं का सम्मान करते हुए घर के कुछ महत्वपूर्ण रीति-रिवाजों, सभ्यता-संस्कृति-परम्पराओं, रहन-सहन और वातावरण के अनुसार स्वयं को ढालने का प्रयास करे तो शायद कोई समस्या ही न रहे. और फिर इसी को तो ‘सामंजस्य’ कहते हैं.

शिशिर भालचन्द्र घाटपाण्डे
०९९२०४ ००११४, ०९९८७७ ७००८०
ghatpandeshishir@gmail.com

 

डिस्‍क्‍लेमर: उपरोक्‍त विचारों के लिए लेखक स्‍वयं उत्‍तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्‍य की पुष्टि नहीं करता है।

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