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दूसरों के प्रेरणास्त्रोत क्यों बने आत्मघाती ?

Shishir Ghatpande Blogs

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पिछले कुछ दिनों में दो बड़ी हस्तियों ने स्वयं ही अपनी इहलीला समाप्त कर ली. तरीक़ा भी एकजैसा ही अपनाया. ये वो हस्तियाँ थीं जो दूसरों के लिये प्रेणास्त्रोत थीं, दूसरों की मार्गदर्शक थीं, दूसरों के मानसिक-बौद्धिक-शारीरिक स्तर को ऊँचा उठाने में सराहनीय योगदान देने के लिये जानी जाती थीं. जी हाँ, मुम्बई पुलिस के जाँबाज़ अधिकारी हिमांशु रॉय और प्रसिद्द आध्यात्म गुरु उदय देशमुख “भय्यू महाराज”. हिमांशु रॉय अपनी ईमानदारी, निडरता, अनुशासन, सद्चरित्रता और कर्तर्व्यानिष्ठा के लिये जाने जाते थे. अपने दैनिक जीवन में भी वो बेहद अनुशासनप्रिय थे. शराब, सिगरेट, तम्बाखू सहित किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से दूरी बनाए रखने वाले सुडौल-हृष्ट पुष्ट हिमांशु रॉय की दिनचर्या में व्यायाम अनिवार्य रूप से शामिल था.

 

 

३ वर्षों तक ब्लड कैंसर जैसी घातक बीमारी से जूझने के बाद अन्ततः ११ मई को उन्होंने स्वयं को गोली मारकर अपने यशस्वी जीवन का करुणामई अन्त कर लिया. सोचे-समझे बग़ैर और उनकी मानसिक स्थिति की कल्पना और अध्ययन किये बिना ही दबी ज़ुबान में कुछ लोगों ने उनके इस क़दम को कायरतापूर्ण, चुनौतियों से हार मान लेने वाला करार दिया. समझना बेहद ज़रूरी है कि हिमांशु रॉय ने अपना सम्पूर्ण जीवन जाँबाज़ी, निडरता के साथ अपनी शर्तों पर जीया. उन्होंने कभी किसी का सहारा नहीं लिया बल्कि हमेशा दूसरों को सहारा देने के लिये जाने जाते रहे. ऐसे में ब्लड कैन्सर की जकड़ में आ जाने के बाद निश्चित रूप से कहीं न कहीं उनके दिलो-दिमाग़ में ये बात घर कर गई होगी कि अब मैं दूसरों पर बोझ बन गया हूँ, मेरी वजह से दूसरों को तक़लीफ़-परेशानी या कष्ट झेलने पड़ रहे हैं. दूसरों का सारा ध्यान, सारा परिश्रम मुझ पर ही केन्द्रित हो गया है और मेरी वजह से वो स्वयं के लिये कुछ नहीं कर पा रहे हैं या अपना जीवन खुलकर नहीं जी पा रहे हैं. एक जाँबाज़, निडर, ख़ुद्दार, मज़बूत इन्सान को ये सब कतई मंजूर नहीं था. और इसीलिये उनकी मानसिक अवस्था को समझते हुए मेरी दृष्टी में ये आत्महत्या नहीं बल्कि अपने प्रियजनों के लिये स्वयं के जीवन का बलिदान है… श्री हिमांशु रॉय जी को शत-शत नमन, विनम्र श्रद्धान्जलि…

 

भय्यू महाराज के नाम से जाने वाले उदय देशमुख अपने हज़ारों अनुयायियों के लिये आध्यात्मिक, गुरु, युवा सन्त, मार्गदर्शक, प्रेरणास्त्रोत, आदर्श, सभी कुछ थे. अनाथ बच्चों के लिये माता-पिता तो असहाय वृद्धाजनों के लिये पुत्र की भूमिका में सदैव तत्पर रहने वाले भय्यू महाराज ने रेडलाइट एरिया में काम करने वाली महिलाओं के उन बच्चों को अपनाया जिन्हें तथाकथित सुसभ्य-सुसंस्कृत संसार हिकारत भरी दृष्टी से देखता था. देश के अन्नदाता किसानों के हितों की रक्षा के लिये भी भय्यू महाराज हमेशा प्रयत्नशील रहे.

 

कुछ लोगों ने उनके आत्मघाती क़दम को कायरतापूर्ण कहा लेकिन वो लोग ये भूल जाते हैं कि आख़िर भय्यू महाराज के सीने में धड़कने वाला दिल इन्सान का ही था, उनका मन-मस्तिष्क भी इन्सान का ही था, भय्यू महाराज भी एक आम इन्सान ही थे. और जब इसी आम इन्सान ने जीवन में कुछ नये रिश्ते, कुछ अपने रिश्ते बनाने चाहे तो उन्हें किसी अपने का साथ नहीं मिला. वो बेहद तन्हा और अकेले पड़ गए. दुश्वारियाँ बढ़ती चली गईं, यहाँ तक कि ख़ुद के ही घर के भीतर की चारदीवारी में भी कोई उनका अपना न रहा. ऐसा अपना जिससे वो अपने दिल और मन की बात कर सकें, अपना बोझ हल्का कर सकें. जिनसे इन्सान को सबसे ज़यादा उम्मीद हो, जिन पर इन्सान को सबसे ज़्यादा भरोसा हो, जब वो ही साथ छोड़ दें तो इस भीड़ भरी दुनियाँ में भी इन्सान बिल्कुल अकेला हो जाता है, टूट जाता है.

 

शायद भय्यू महाराज के मन में इसी बात के दुःख ने घर बना लिया कि लोग मार्गदर्शक समझकर मेरे पास आते हैं, लोग अपनी परेशानियाँ-चिन्ता-तनाव-दुःख दूर करने मेरे पास आते हैं, लोग आत्मविश्वास-आत्मबल प्राप्ति हेतु मेरे पास आते हैं, लोग मुझे अपना आदर्श मानते हैं और मैं अपने ही घर के भीतर की समस्याएँ सुलझा पाने में असमर्थ साबित हो रहा हूँ. बस !! अन्दर ही अन्दर दुःख के इस बीज ने पनपकर दानवाकार ले लिया और !!!!!

विनम्र श्रद्धान्जलि…

 

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