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“अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार”

Shishir Ghatpande Blogs

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सस्ती एवं त्वरित लोकप्रियता हासिल करने की लालसा, काम, पैसे की चाहत के चलते चन्द लोगों ने संविधान द्वारा प्रदत्त, स्वतन्त्र-स्वैच्छिक-निर्भीक जीवन यापन के प्रेरक इस ख़ूबसूरत अधिकार पर कालिख पोतने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखी है…
अब तो जैसे चलन ही हो गया है कि “बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम नहीं होगा” की तर्ज़ पर जानबूझकर विवादास्पद या सनसनीखेज़ काम (हरक़त) करो, सुर्ख़ियाँ बटोरो, Negative Publicity हासिल करो वगैरह-वगैरह…
मज़ाक़ उड़ाने और अपमान करने के बीच बहुत महीन रेखा होती है.. और वैसे सच पूछा जाए तो मज़ाक़ उड़ाने का अधिकार केवल उसी को है जो मज़ाक़ के पात्र से ज़्यादा क़ाबिलीयत रखता हो…रही बात तन्मय भट्ट की तो तन्मय भट्ट की इतनी क़ाबिलीयत भी नही कि वो भारत के दो अनमोल “भारत रत्नों” आदरणीय लता जी और माननीय सचिन तेंदूलकर के समक्ष खड़े भी हो सकें…आज से पहले तन्मय भट्ट का नाम तक बामुश्क़िल चुनिन्दा लोगों ने ही सुन रखा होगा…
देश विरोधी नारे भी लगे, देश के टुकड़े किये जाने की बातें भी की गईं लेकिन ऐसा करने वालों का बाल भी बाँका ना हो सका क्योंकि तथाकथित “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार” के तहत देश में किसी को भी किसी व्यक्ति या विषय पर अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है और देश विरोधी नारे लगाना या देश के टुकड़े करने की बात करना अर्थात “केवल मुँह से बोलना” देश विरोधी गतिविधि में सम्मिलित नहीं है……अब अहम सवाल ये उठता है कि क्या देश विरोधी नारे लगाने या देश के टुकड़े करने की बात करने वाले लोगों की मानसिकता देशप्रेम की होगी ? क्या उनके मन में देश के प्रति वफ़ादारी होगी ? और सबसे महत्वपूर्ण ये कि यदि भविष्य में उन्होंने देशद्रोह या देश विरोधी गतिविधि को अंजाम दिया या कभी देशद्रोहियों का साथ दिया तो उसका ज़िम्मेदार कौन होगा ?  आज जो लोग उनके पक्ष में खड़े हैं, क्या वो ज़िम्मेदारी लेंगे ? या फ़िर ठीकरा सरकार के मत्थे फोड़ देंगे ?
तो क्या “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” के नाम पर हमें कुछ भी सहन कर लेना चाहिये ? क्या देश या देश की अनमोल महान विभूतियों के साथ अभद्रता-दुर्व्यवहार करने वालों के खिलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्यवाही नहीं होनी चाहिये ? क्या भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी नहीं जानी चाहिये ?

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