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कपड़ों का बोझ

gauravd

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कुछ काम करते करते,

कुछ सूरज के चढ़ते उतरते,

सुबह से शाम, फिर भी हो जाती है,

किसी तरह ठंड में ठिठुरते ठिठुरते।।

 

पीड़ा में बदल जाती है ठिठुरन,

रात के कदम बढ़ते बढ़ते,

कुछ बदन जम जाते हैं,

खुले आसमान में आग तपते तपते।

 

कुछ तन रह जाते हैं,

शोरूम के कपड़े तकते तकते,

कुछ अलमारियां थक जाती हैं,

कपड़ों का बोझ रखते रखते।।

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं, जागरण डॉटकॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है।

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