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रथयात्रा – मोक्ष की ओर प्रयाण

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रथयात्रा का शाब्दिक अर्थ है- रथ में बैठकर घूमने निकलना। समग्र भारत में यह उत्सव खूब उत्साह और उमंग से मनाया जाता है। भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण अथवा जगन्नाथ और श्रीराम की प्रतिमा को रथ में रखा जाता है। इस रथ को बहुत ही भक्तिभावपूर्वक श्रद्धालु खींचते हैं, और उसे लक्ष्मीजी, राधिकाजी अथवा सीताजी के मंदिर ले जाया जाता है। अंत में वह जगन्नाथ पुरी के गुंडिया मंदिर में ले जाया जाता है। जहाँ भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभाद्रा की काष्ठ की प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं।

रथयात्रा असाढ़ सुद द्वितीया के दिन शुरू होती है और आठ दिनों तक चलती है। यह भारत के चार बड़े धामों में से एक है। इस जगन्नाथपुरी में यह उत्सव सबसे अधिक धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलराम और बहन सुभाद्रा के साथ तीन अलग-अलग रथों पर पुरी के मार्गों पर नगरयात्रा करने निकलते हैं। इस अवसर पर पूरे विश्व से एकत्र हुए हजारों यात्रियों द्वारा इस रथ को खींचा जाता है।

पुरी के इस उत्सव की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसे सभी जातियों के लोग रथ खींचने का अधिकार रखते हैं। पूजा और अन्य धार्मिक विधियाँ संपन्न होने के बाद सबेरे यह रथ धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। पुरी के राजा गजपति सोने के झाड़ू से मार्ग साफ करते हैं। रथ को विविध रंगों के कपड़ों से सजाया जाता है और उनके अलग-अलग नाम रखे जाते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ का ‘नंदिघोष’, बलराम के रथ का ‘तालध्वज’ तथा सुभाद्राजी के रथ का ‘दर्पदलन’ नाम रखा जाता है। नंदिघोष का रंग लाल और पीला, तालध्वज का रंग लाल और हरा तथा दर्पदलन का रंग लाल और नीला रखा जाता है। पुरी में देवी सुभाद्रा की पूजा होने पर भी उन्हें हिंदू पुराणों में देवी नहीं कहा गया है। मात्र महाभारत में सुभाद्रा भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की प्रिय बहन होने का उल्लेख किया गया है।

पुरी की ये तीनों प्रतिमाएँ भारत के सभी देवी – देवताओं की तरह नहीं होतीं। वे आदिवासी मुखाकृति के साथ अधिक साम्यता रखती हैं। पुरी का मुख्य मंदिर बारहवीं सदी में राजा अनंतवर्मन के शासनकाल के दौरान बनाया गया है। उसके बाद जगन्नाथजी के १२० मंदिर बनाए गए हैं। रथयात्रा शुरू होने से पहले सभी रथों को उचित ढंग से आयोजित किया जाता है। सर्व प्रथम बड़े भाई बलराम का ४४ फुट ऊँचा रथ, उसके बाद देवी सुभाद्रा का ४३ फुट ऊँचा रथ और अंत में ४५ फुट ऊँचा श्री जगन्नाथजी का रथ सुबह से नगरयात्रा पर निकलकर पूरे दिन शहर के मार्गों पर घूमता रहता है और गडिया मंदिर की तरफ धीमी गति से आगे बढ़ता रहता है। और शाम को मंदिर में रथ का आगमन होता है।

ये तीनों आठ दिनों तक आराम करते हैं और नौवें दिन सुबह पूजा विधि करने के बाद वे वापस मंदिर में आते हैं। रथयात्रा के पहले दिन सभी रथों को मुख मार्ग की तरफ उचित क्रम में संयोजित किया जाता है। रथ वापस लौटने की यात्रा को उड़िया भाषा में ‘बहुदा यात्रा’ कहा जाता है, जो सुबह शुरू होकर जगन्नाथ मंदिर के सामने पूरी होती है। श्रीकृष्ण, बलराम और सुभाद्रा तीनों को उनके रथ में स्थापित किया जाता है और एकादशी तक उनकी पूजा की जाती है। उसके बाद पुनः उन्हें अपने-अपने स्थान पर मंदिर में बिराजमान किया जाता है।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर की एक विशेषता यह है कि मंदिर के बाहर स्थित रसोई में २५००० भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं। भगवान को नित्य पकाए हुए भोजन का भोग लगाया जाता है। परंतु रथयात्रा के दिन एक लाख चौदह हजार लोग रसोई कार्यक्रम में तथा अन्य व्यवस्था में लगे होते हैं। जबकि ६००० पुजारी पूजाविधि में कार्यरत होते हैं। उड़ीसा में दस दिनों तक चलनेवाले एक राष्ट्रीय उत्सव में भाग लेने के लिए दुनिया के कोने-कोने से लोग उत्साहपूर्वक उमड़ पड़ते हैं। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रसोई में ब्राह्मण एक ही थाली में अन्य जाति के लोगों के साथ भोजन करते हैं, यहाँ जात-पाँत का कोई भेदभाव नहीं रखा जाता। श्रीक्षेत्र पुरी में कोई जातिवाद नहीं है। सभी भगवान जगन्नाथ की संतानें हैं और उनकी नजर में सभी एक समान हैं।

प्रतिवर्ष तीनों रथ लकड़ी से बनाए जाते हैं, जिसमें लोहे का बिलकुल उपयोग नहीं किया जाता। बसंत पंचमी के दिन लकड़ी एकत्र की जाती है और तीज के दिन रथ बनाना शुरू होता है। रथ यात्रा के थोड़े दिन पहले ही उसका निर्माण कार्य पूरा होता है।

जगन्नाथ मंदिर कला और शिल्प स्थापत्य का अद्वितीय नमूना है। २१४ फुट ऊँचा यह मंदिर भुनेश्वर के शिव मंदिर या लिंगराज मंदिर जैसा लगता है।

यहाँ एक बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि प्रतिवर्ष नया रथ बनता है, परंतु भगवान की प्रतिमाएँ वही रहती हैं। परंतु ८ से १९ वर्ष में असाढ़ अधिक मास आने पर तीनों मूर्तियाँ नई बनाई जाती हैं। इस प्रसंग को ‘नवकलेवर’ अर्थात् ‘नया शरीर’ कहा जाता है। तब पुरानी प्रतिमाओं को मंदिर के अंदर स्थित कोयली वैकुंठ नामक स्थान में जमीन में गाड़ दी जाती है।

इस वर्ष रथयात्रा १३ जुलाई को शुरू होगी और २२ जुलाई को संपन्न होगी। इस समयावधि को शुभ कार्यों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

डॉ. सुरेन्द्र कपुर

http://ganeshaspeaks.com/pracharya_surendra_kapoor.jsp

सेलिब्रिटी एस्ट्रोलॉजर

गणेशास्पीक्स टीम


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