Menu
blogid : 25529 postid : 1336512

नारी प्रतिशोध की पहली मिसाल, शूर्पणखा

kuchhalagsa.blogspot.com

  • 110 Posts
  • 6 Comments
रामायण एक महाग्रंथ है इसमें दो राय नहीं है नाहीं हो सकती हैं। इसकी लोकप्रियता इतनी है कि कई भाषाओं के अलावा इसका बौद्ध, जैन तथा सिख धर्म के ग्रंथों में रूपांतरण हो चुका है। यहां तक की भारत के बाहर कम्बोडिया, बर्मा, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस जैसे देशों में भी इसकी लोकप्रियता चरम पर है। हालांकि इसके कथानक में समय और परिवेश के अनुसार कुछ बदलाव भी आते चले गए हैं पर मूल कथानक सदा की तरह अपनी तमाम अच्छाइयों के साथ मानव को सत्यमार्ग पर चलने की सीख देता आ रहा है।
इस महाकाव्य की खासियत यह भी है कि इसमें पुरुषों के साथ-साथ कई स्त्री पात्र भी ऐसे हैं जिनकी पूरे कथानक में बहुत ही सशक्त व अहम भूमिका रही है। ऐसा ही एक चरित्र है राक्षसराज रावण की बहन

शूर्पणखा का। महाकाव्य पढ़ने से ऐसा लगता है कि राम-रावण युद्ध का मुख्य कारण शूर्पणखा ही है पर कुछ रचनाकारों का मत कुछ अलग भी है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। उनके अनुसार शूर्पणखा का राम और लक्ष्मण के पास जा प्रणय निवेदन करना सिर्फ एक दिखावा था असल में वह रावण के समूल नाश की एक भूमिका थी।

शूर्पणखा ऋषि विश्रवा और उनकी दूसरी पत्नी कैकेसी की सबसे छोटी संतान थी। जो अपनी माँ के सामान ही सुंदर और रूपवती थी। अपनी सुंदर आँखों के कारण उसका नाम मीनाक्षी रखा गया था। बचपन से ही वह उच्चश्रृंखल थी। बड़ी होने पर उसने गुप्-चुप तरीके से कालकेय दानव विद्युतजिह्वा, जिसका दूसरा नाम दुष्टबुद्धि भी था, के साथ विवाह कर लिया था। दानव जाति का राक्षसों से बहुत पुराना बैर चला आ रहा था। इसलिए रावण इस विवाह से खुश नहीं था और वह दोनों को दंडित करना चाहता था पर पत्नी मंदोदरी के समझाने पर उसने दोनों को माफ़ ही नहीं किया बल्कि विद्युतजिह्वा को अपने  उच्च पद भी दे दिया। पर विद्युतजिह्वा, जिसका एक और नाम दुष्टबुद्धि भी था, का शूर्पणखा से विवाह करने का मुख्य मकसद रावण का वध कर उसके राज्य पर आधिपत्य करना था। रावण को जब उसकी असलियत का पता चला तो उसने अपने बहनोई का वध कर

डाला। शूर्पणखा को सच्चाई का पता नहीं था इसलिए उसने मन ही मन रावण के विनाश की कसम खा डाली। पर रावण की शक्ति के सामने वह कुछ भी नहीं थी। इसके लिए किसी बहुत शक्तिशाली माध्यम की जरुरत थी जिसके लिए उसे राम वनवास तक इन्तजार करना पड़ा।


श्री राम ने जब अपने वनवास के दौरान राक्षसी ताड़का, जो शूर्पणखा की नानी थी, और सुबाहू को मार डाला तो शूर्पणखा को अपना बदला लेने की एक आशा नजर आई। फिर भी उसने श्री राम की शक्ति को आंकने के लिए अपने भाइयों खर और दूषण, जो पराक्रम में रावण के सामान थे, को सैंकड़ों सैनिकों के साथ उनसे लड़ने के लिए भेजा और उनके हश्र को देख उसने एक योजना बनाई जिसके तहत उसने दोनों भाइयों को उकसा कर अपने नाक-कान कटवा लिए। अपनी बहन का यह अपमान रावण सह नहीं पाया और उसने सीता का अपहरण कर अपने और लंका के पराभव की नींव रख दी।

इस तरह शूर्पणखा ने बिना सत्य जाने अपने भाई-भतीजों के साथ-साथ पूरी राक्षस जाति को उसके अंत तक पहुंचा दिया। कई विद्वानों का मत है कि महासमर के बाद वह अपने भाई विभीषण और उनकी पत्नी कुम्बिनी के साथ लंका में रहने लगी थी। पर कुछ वर्षों के बाद एक दिन उसका और उसकी भाभी के शव समुद्र से बरामद हुआ था जिसके कारण का कहीं उल्लेख नहीं मिलता।

पर ब्रह्मवैवर्तपुराण में एक कथा आती है, जिसके अनुसार भले ही किसी दूसरी योजना के तहत वह राम-लक्ष्मण से मिली थी पर श्री राम के अनुपम रूप ने उसे मोह लिया था। इसलिए महासमर के बाद उसने पुष्कर तीर्थ में ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर अगले जन्म में श्री राम को अपने पति के रूप में पाने का वर प्राप्त किया। जिसके तहत त्रेता युग में उसका जन्म कुब्जा के रूप में हुआ जिसे श्री कृष्ण जी ने रोग मुक्त कर अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

Read Comments

Post a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *