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शनिवार वाड़ा, पेशवा बाजीराव का किला

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शनिवार वाड़ा, महाराष्ट्र राज्य के पुणे ज़िले में स्थित वह दुर्ग है जिसका निर्माण 1746 में छत्रपति साहू जी के

शनिवारवाडा में बाजीराव पेशवा की प्रतिमा

प्रमुख सरदार, पेशवा बाजीराव  ने अंग्रेजों के साथ अपने तीसरे युद्ध के दौरान करवाया था। ऐसा कहा जाता है कि एक बार पेशवा बाजी राव को यहाँ एक खरगोश के डर से कुत्ते को भागते देख इस जगह पर किला बनाने की प्रेरणा मिली। इस सात मंजिला इमारत के सबसे ऊपरी भाग में पेशवा की अपनी रिहाइश थी जिसे “मेघदंबरी” के  नाम से जाना जाता था। जहां से 17 की.मी. दूर, आलंदी का जनेश्वर मंदिर  साफ़  नजर आता था। हालांकि 1838 में हफ्ते भर तक लगी रही एक
आग से इसकी कई इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गयी थीं, पर बचे हुए हिस्से को संरक्षित कर अब इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर दिया गया है। इस किले की नींव शनिवार के दिन रखी गई थी इसलिए इसका नाम शनिवार वाडा पड़ा। इस पर 1818 तक पेशवाओं की हुकूमत रही। इसके पांच प्रवेश द्वार हैं –

दिल्ली दरवाजा : यह इस किले का सबसे प्रमुख द्वार है, उत्तर दिशा में स्थित यह द्वार इतना ऊँचा और चौड़ा है कि हौदे सहित हाथी निकल सकता है। हमले के वक़्त हाथियों से इस गेट को बचाने लिए इस गेट के दोनों पलड़ो में 12 इंच लम्बे 72 नुकीले कीले लगे हुए है जो कि हाथी के माथे तक की ऊँचाई तक जाते हैं। दरवाज़े के दाहिने पल्ले में एक छोटा द्वार है जो सैनिको के आने जाने के लिए बनाया गया था।
मुख्य द्वार


मस्तानी दरवाजा : यह दरवाज़ा दक्षिण दिशा की ओर खुलता है। बाजीराव  की पत्नी मस्तानी जब किले से बाहर जाती तो इस दरवाज़े का उपयोग करती थी।  इसलिए इसका नाम मस्तानी दरवाज़ा है। वैसे इसका एक और नाम अली बहादुर दरवाज़ा भी है।

मस्तानी दरवाजा


खिड़की दरवाजा : यह पूर्व दिशा में खुलने वाले दरवाज़े में एक खिड़की बनी हुई है, इसलिए इसे खिड़की दरवाज़ा कहा जाता है।


जंभुल दरवाजा : दक्षिण दिशा में स्थित इस द्वार से दास-दासियों का महल में आना-जाना होता था। नारायण राव पेशवा की ह्त्या के बाद उसकी लाश के टुकड़ो को इसी रास्ते से किले के बाहर ले जाया गया था इसलिए इसे नारायण दरवाज़ा भी कहा जाता है।


गणेश दरवाजा : किला परिसर में स्थित गणेश रंग महल के पास दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित होने के कारण  इसे गणेश द्वार का नाम दिया गया है।


जैसा कि अधिकाँश किलों के साथ बर्बर घटनाएं भी जुडी होती हैं इस किले के साथ भी एक षड्यंत्र की कहानी जुडी हुई है। बाजीराव पेशवा के तीन पुत्र थे। विश्वासराव, महादेव राव और नारायण राव। विश्वासराव पानीपत की तीसरी लड़ाई में मारे गए थे। बाजी राव की मृत्यु के पश्चात् महादेव राव राजा बने पर कुछ समय पश्चात् ही उनका भी निधन हो गया तब सिर्फ सोलह साल की आयु में नारायण राव को गद्दी पर बैठना पड़ा। पर जैसाकि राजपरिवारों में होता रहा है, नारायण राव के काका-काकी, रघुनाथ राव और आनंदी बाई, उनके राजा बनाने से खुश नहीं थे उन्होंने षड्यंत्रपूर्वक गार्दी कबीले के लोगों से मिल नारायण राव की ह्त्या करवा दी। कई लोगों का ऐसा भी कहना है कि रघुनाथ राव बालक को मारना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने अपने संदेश में लिखा था  “नारायणराव ला धरा” जिसे उनकी पत्नी ने “नारायणराव ला मारा” कर दिया था।  बालक ने अपने अंतिम क्षणों में अपने काका से अपने को बचाने की गुहार लगाईं, पर होनी हो कर रही। कहते हैं बच्चे नारायण राव की आत्मा आज भी किले में “काका माला बचावा” कहते हुए दौड़ती, सुनाई पड़ती है। इसलिए इस किले को देश के अभिशप्त किलों में शुमार किया गया है।

अब जैसे-जैसे पुणे की आबादी बढती जा रही है, वैसे-वैसे किले के चारों ओर सड़कों, दुकानों का जाल भी बिछता जा रहा है। जरुरत है ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों को गंभीरता से संरक्षण देने की, बचाने की।

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