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झूठ बेचते सितारे !

kuchhalagsa.blogspot.com

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यह युग विज्ञापन का है। अखबार, टी.वी., पत्रिकाएं, सड़कों पर के खंभे, दीवालें, वाहन, ऐसा क्या है, जिसका उपयोग इनके लिए नहीं होता ! विज्ञापन वह फंदा या जाल है जिसका उपयोग बाजार द्वारा उपभोक्ता को फंसाने के लिए किया जाता है। जिसका एकमात्र लक्ष्य उपभोक्ताओं की जेब में सेंध लगाना है अधिकांश विज्ञापनों का संबंधित वस्तु की गुणवत्ता से कोई सरोकार नहीं होता, यह कई-कई बार सिद्ध हो चुका है। आज हर चीज की गुणवत्ता परखने की सुविधा, उसके गुण-दोषों की जानकारी सब कुछ आसानी से उपलब्ध होने के बावजूद भी लोग झांसे में आते चले जाते हैं। क्योंकि बाजार ने इंसान के मनोविज्ञान को समझ उसकी इच्छाओं-कामनाओं-कमजोरियों की नस पकड़ रखी है। इस श्रेणी में अति विशाल जनसंख्या वाला मध्यम-वर्ग ही ज्यादा आता है। साथ ही उत्पादक दाताओं को यह भी मालूम है कि अगर बेचने वाले की साख समाज में हो तो उसका गहरा असर पडता है क्योंकि लोगों की अपने नायकों-नायिकाओं के प्रति ऐसी आस्था है कि वे समझते हैं कि हमारा नायक या नायिका कभी झूठ नहीं बोलेंगे ! सो वह उत्पाद पर भरोसा कर लेते हैं और उनके इसी भोलेपन के प्रभाव से जो चीज कम या भ्रामक गुणवत्ता की भी हो तो भी वह विज्ञापनों के सहारे निकल पड़ती है। इसीलिए किसी भी क्षेत्र के सितारे हर दूसरे-तीसरे विज्ञापन में नजर आ जाते हैं। यहां तक कि कई तो अपने क्षेत्र में हाशिए पर होने के बावजूद यहां माल कूटते नजर आते हैं। कुछ तो अपने रसूख के बल पर अपने रिश्तेदारों का भी भला करवा देते हैं।
इश्तिहारों के अन्य माध्यम तो उपभोक्ता नजरंदाज कर भी सकता है पर टी.वी. का क्या ! जो हर दूसरे-तीसरे मिनट अपने दर्शकों पर तोप के गोलों की तरह विज्ञापन दागता रहता है ! जिसमें तो अब कई शालीनता की हद भी लांघने लगे हैं। कुछ जाने-अनजाने समाज के वर्गों में भेदभाव करने तो कुछ अपने उत्पाद का उपयोग ना करने पर उपभोक्ता को पिछड़ा हुआ बताने पर भी नहीं चूकते ! मनघड़ंत त्यौहार, दुर्लभ नक्षत्र, ख़ास दिन, आयातित उत्सव, कीमतों में भ्रामक कमी, दो के साथ एक मुफ्त और ना जाने क्या-क्या दिखा बता कर ग्राहक को ललचा, बहला, उकसा कर बाजार अपने सुरसा जैसी कभी ना ख़त्म होने वाली क्षुधा के लिए ईंधन का जुगाड़ करता रहता है। जिसके लिए ज्यादातर बच्चों को साध उनके अभिभावकों को निशाना बनाया जाता है।
टी.वी पर समाचार या कोई अपना कार्यक्रम देखने वाला तंग हो जाता है, हर पांच मिनट के बाद “बेल्ले” हीरो को झेल, जो दिन भर कुत्ते-बिल्ली की तस्वीर खींचता बैठा है और उसे बिना कैमरे के पता ही नहीं चलता कि उसका कुत्ता बिन नहाए है या उसका जूता मुंह में दबाए भग रहा है। एक और महाशय ने पूरे देश की जुबान को रंगने का ठेका ले सबके दिमाग की ऐसी की तैसी कर धर दी है क्या जिम्मेदार लोग ऐसे बौड़म हैं कि शब्दों की हेरा-फेरी से उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि कौन क्या बेचना चाह रहा है ? ठंडे बोतल बंद पेय पूरी दुनिया में नकारे जा रहे हैं पर हमारे सिरमौर नायक उसके गुण-गान में इतने मग्न हो जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि हाथ में पकड़ी हुई बोतल के बावजूद उनकी जैकेट कैसे उतर जाती है ! एक तो गजबे ही है जो अपनी पहचान अपने काम या नाम से नहीं बल्कि शरीर पर थोपे जाने वाले डेडोरेंट से करवाता है ! वही हाल RO वाले पानी के फ़िल्टर का है जिसके बारे में बार-बार कहा जाता है कि वैसे फ़िल्टर की जरुरत सब जगह नहीं होती पर वह महोदया बिना झिझक उसे सर्वश्रेष्ठ बताती चली आ रही हैं जबकि संवैधानिक पद के कारण उनकी तो समाज के प्रति और भी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। पर क्या कहा जाए ! लगे हुए हैं सब अपनी जून सुधरने में ! ये तो आमजन को सुध लेने की बात है जो जरा सा ध्यान दे और सोचे कि गंजी पहन लेने से ही दिलेरी नहीं आ जाती नाहीं कुछ खा-पी लेने से ताकत या बुद्धि बढ़ सकती है या कुछ लगाने से रंग बदल जाता है और सुंदरता बढ़ जाती है ! इनसे तो वोडाफोन की वे “चिट्टियाँ” गुड़ियाँ लाख दर्जे बेहतर हैं जो संदेश के साथ-साथ हर बार चेहरे पर मुस्कान ला देती हैं।
ऐसा नहीं है कि विज्ञापन बंद ही कर दिए जाएं। कुछ चीजों के बारे में बताना जरुरी भी होता है। बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिनका पता ही ना चले यदि बताया ना जाए। पर बनाने और बताने वाले की नैतिक जिम्मेदारी निश्चित की जानी चाहिए कि वह अतिरेक, गलत या भ्रामक जानकारी ना दे। विज्ञापन को लोकप्रिय बनाने के लिए शालीनता ना लांघे। बच्चों को बच्चा ही समझे अनावश्यक रूप से उनके काँधे पर रख कर बंदूक ना चलाए। हालांकि इन पर भी अंकुश रखने का प्रावधान है पर पतली गलियां भी तो ढेरों हैं !

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