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ये ‘रेस’ तो बहुत स्लो निकली

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कभी-कभी परिस्थितिवश कुछ ऐसा हो जाता है जो करने की जरा भी इच्छा न हो ! ऐसा ही पिछले शुक्रवार को हुआ जब सलमान की “रेस 3” देखने का मौका बना। समय काटने की मजबूरी और बाहर बेतहाशा गर्मी ना पड़ रही होती तो मैं बीच में ही फिल्म छोड़ उठ आया होता। ऐसी बिना सिर-पैर की लचर फिल्म इसके पहले कब देखी याद नहीं पड़ता। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है इसका डायरेक्शन, जिसे पता नहीं किसने, क्यों और

क्या देख कर अब्बास-मस्तान जैसे सक्षम निर्देशकों को हटा कर, रमेश गोपी नायर यानी #रेमो_डिसूजा को सौंप दिया। जिन्हें शुरू से लेकर अंत तक यही समझ में नहीं आया कि कहानी, उसके पात्रों और खासकर सलमान  को कैसे पेश किया जाए ! इसीलिए कभी उसे बैट मैन, कभी रैंबो, कभी कमांडो और कभी जेम्स बॉन्ड की तरह दिखाने की नाकाम कोशिश करते रहे।  बाकी संभालने के चक्कर में भी कभी कोई किसी का भाई बन जाता है या स्पाई, कभी बाप कभी दुश्मन, कभी रकीब। एक डायलॉग से या एक ठूंसे हुए सीन से पहले से ही लचर कहानी और भी हिचकोले खाती रहती है।रेमो किसी भी चीज को ढंग से  “हैंडल”  नहीं कर पाए, सिवाय नाच-गाने के दृश्यों के, जो उनका वास्तविक काम है। पर वे भी म्यूजिक वीडियो की तरह लगते हैं। इसीलिए कहा गया है कि जिसका काज उसी को साजे, नहीं तो …………..!
जैसा कि सलमानी फिल्मों में होता है यह भी पूरी तरह उन्हीं के कंधों पर लदी हुई है। उनके आभामंडल से आतंकित रेमो कभी उन्हें हजार फीट की मीनार पर खड़ा करवा देते हैं तो कभी “विंगसूट” पहना उड़वा देते हैं और तो और एक कार को उड़ाने में जहां बाकी फिल्मों में पिस्तौल की एक गोली काफी होती है उसके लिए रेमो जी चार बैरल को रॉकेट लांचर, बजूका, थमा देते हैं हीरो को, वह भी उसके उपयोग के गलत तरीके के साथ ! कारों के टकराव-धमाके-विस्फोट-आग-धूँआ सब रोहित शेट्टी की याद दिलाता है। लंबे समय के बाद वापसी कर रहे बॉबी को देखना अच्छा तो लगा, पर फिल्म का हश्र उसके लिए क्या तोहफा लाएगा यह तो वक्त की बात है। वैसे तो इस फिल्म में वह सब कुछ है जो इस तरह की फिल्मों में होता है, भव्य सेट, कार रेस, एक्शन, आगजनी, कैट-फाइट, धूम-धड़ाका, नायकों के वैसलीन पुते, उघडे तन-बदन की स्लो मोशन में लंबी-लंबी झड़पें ! पर नहीं है तो किसी भी चीज पर निर्देशक की पकड़।

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