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रेपिस्ट के जुर्म की सजा उसके परिवार को भी मिलनी चाहिए?

जागरण जंक्शन फोरम

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पांच साल की मासूम बच्ची के साथ बेहद दर्दनाक तरीके से रेप को अंजाम देने वाले अपराधी मनोज के माता-पिता का उनके गांववालों ने हुक्का पानी बंद कर दिया है। गांव के सभी लोगों ने मनोज के माता-पिता या उसके किसी भी रिश्तेदार के साथ किसी भी तरह का वास्ता रखने से इंकार करते हुए उनके ऊपर हर तरह की पाबंदी लगा दी है। क्योंकि उनका कसूर यह है कि उनका बेटा मनोज एक खौफनाक मानसिकता वाला व्यक्ति है जिसने एक मासूम बच्ची के साथ बेहद अमानवीय तरीके से बलात्कार किया। इससे पहले ‘निर्भया’ के अपराधी राम सिंह के परिवार, जो कि वर्तमान में तो दिल्ली में ही रहता है, को भी उनके पैतृक गांव में आने से रोक दिया गया था। उनका भी कसूर यही था कि वह राम सिंह के अभिभावक हैं। ऐसा सिर्फ मनोज या राम सिंह के ही परिवार वालों के साथ नहीं हुआ बल्कि अधिकांशत: यही देखा जाता है कि जब भी कोई व्यक्ति किसी अपराध को अंजाम देता है तो उसके लिए उसके पूरे परिवार को दोषी ठहराया जाता है और सामुदायिक तौर पर उन्हें ना सिर्फ सजा का हकदार समझा जाता है बल्कि उन्हें ऐसी सजा दी भी जाती है जो उन्हें तो आजीवन भुगतनी ही पड़ती है लेकिन कभी-कभार तो उनकी आने वाली पीढ़ियां भी उस सजा को सहन करने के लिए मजबूर हो जाती हैं। हमारा पारंपरिक समाज ऐसी सजा को ही अपराधी के लिए उपयुक्त करार देता है जबकि जनतंत्र और आधुनिक न्याय के पैरोकार इससे ठीक उलट केवल व्यक्तिगत आधार पर ही सजा देने के पक्ष में अपनी आवाज उठाते हैं, जिसके चलते यह एक बहस का विषय बन गया है कि क्या किसी अपराधी के कृत्य के लिए सिर्फ अपराधी को ही सजा का पात्र बनाया जाना चाहिए या फिर उसके साथ उसके पूरे परिवार को ही सजा का पात्र करार दिया जाना चाहिए?




पारंपरिक तौर पर सजा दिए जाने की मांग करने वाले लोगों का कहना है कि परिवार का दायित्व होता है अपने बच्चे को सही शिक्षा और अच्छे संस्कार देना। अगर परिवार ऐसा नहीं कर पाता जिसके परिणामस्वरूप उनका बच्चा कोई गलत कदम उठा लेता है तो इसमें गलती अकेले उस व्यक्ति की नहीं जिसने अपराध किया है बल्कि उसके परिवार की भी है जो उस पर निगरानी रख पाने में अक्षम साबित हुए। अगर कोई व्यक्ति गलत करता है तो इसके पीछे उसका परिवेश, पारिवारिक वातावरण बहुत ज्यादा उत्तरदायी होता है इसीलिए अपराधी का अपराध केवल उसका अकेले का नहीं बल्कि हर वो व्यक्ति उसमें शामिल होता है जो उस सदस्य से नजदीकी तौर पर जुड़ा होता है। व्यक्तिगत तौर पर नहीं बल्कि सामुदायिक तौर पर सजा देने की पैरवी करने वाले लोगों का यह भी कहना है कि सजा अगर अपराधी को ही दी जाए तो उसके इस सजा से प्रभावित होने या फिर भविष्य में सुधार करने की संभावना कम होती है जबकि अगर उसके साथ उसके परिवार वालों को भी सजा दी जाए तो उस अपराधी को यह ज्यादा प्रभावित करता है।




वहीं दूसरी ओर आधुनिक न्यायप्रणाली और जनतांत्रिक व्यवस्था के पैरोकार केवल व्यक्ति को ज्यादा प्रमुखता देते हुए व्यक्तिगत तौर पर ही सजा दिए जाने के पक्ष में हैं और इसी को आधार बनाकर सजा सुनाने को सही मानते हैं। इनके अनुसार गलती व्यक्ति की है इसके लिए उसके समस्त परिवार को दोषी ठहराना किसी भी हाल में न्यायसंगत नहीं है। हालिया केस में बच्ची के साथ यौनअपराध करने वाले युवक शराब के नशे में चूर होकर एक पोर्न फिल्म देख रहे थे। उस फिल्म में उसी तरह का कृत्य देखकर उन्होंने भी उस मासूम के साथ वही किया, अब उनके इस कृत्य में दोष उनका है ना कि परिवार का। आधुनिक न्यायप्रणाली के अनुसार भले ही संस्कार और परवरिश व्यक्ति के जीवन को सकारात्मक या नकारात्मक तौर पर प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं लेकिन अगर कोई इंसान कुछ गलत करता है तो इसके लिए सिर्फ और सिर्फ वही दोषी है। उसके परिवार को इस दायरे में लाना न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि इससे हम समाज को मध्ययुगीन मानसिकता की ले जाते हैं।




सजा के तरीकों से जुड़े उपरोक्त दोनों पक्षों को समझने और विचार करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं, जैसे:



1. व्यक्ति के अपराध के लिए उसके साथ उसके परिवार को भी सजा का हकदार बताकर क्या वाकई हम उस अपराधी के भीतर सुधार की उम्मीद कर सकते हैं?


2. जब गलती किसी एक ने की है तो उसके लिए सजा भी उसे मिलनी चाहिए, परिवार वालों पर जुल्म ढाना कितना न्यायसंगत है?


3. परिवार का कर्तव्य है अपने सदस्य पर निगरानी रखना, उसे सही संस्कार देना। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता तो उसे सजा क्यों ना दी जाए?


4. ऐसा माना जाता है कि बलात्कारी एक मानसिक रूप से विकृतचित्त अपराधी होता है तो ऐसे में उसके परिवार का क्या दोष?



जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


रेपिस्ट के जुर्म की सजा उसकेपरिवार को भी मिलनी चाहिए?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “परिवार की जिम्मेदारी” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व परिवार की जिम्मेदारी – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार


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