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विवाह पूर्व यौन संबंध में स्त्री विवेक – क्या है आपकी राय?

जागरण जंक्शन फोरम

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सामाजिक परिप्रेक्ष्य में एक अहम फैसला देते हुए दिल्ली की एक अदालत ने विवाह के वादे के आधार पर किसी पुरुष से शारीरिक संबंध बनाने और बाद में पुरुष द्वारा शादी से मुकर जाने को बलात्कार की श्रेणी में अपराध मानने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट का कहना है दुनिया का कोई भी धर्म शादी पूर्व शारीरिक संबंध बनाने की इजाजत नहीं देता। ऐसे में अगर कॉरपोरेट ऑफिस में काम करने वाली, स्व-विवेक से अपना हर फैसला लेने वाली महिला किसी पुरुष से सिर्फ इसलिए यौन संबंध बनाने को राजी हो जाती है कि वह उससे शादी करेगा तो यह उसकी स्वयं की जिम्मेदारी होगी क्योंकि परिपक्वता के साथ काम करती हुई वह महिला स्वयं समझदार होती है और ऐसे हर कृत्य को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट के इस फैसले का जहां कई मायनों में स्वागत हो रहा है वहीं इसके विरोध में स्वर भी मुखर हो रहे हैं।


नए सामाजिक खुलेपन के पैरोकार और स्त्री-पुरुषों को समान आधार पर देखने वाले कोर्ट के इस फैसले को आदरणीय व नए सामाजिक मानकों के अनुकूल मानते हैं। इनका मानना है कि महिला सशक्तिकरण की बातों के साथ महिलाएं हर जगह पुरुषों से कदम मिलाकर चलना चाहती हैं और चल रही हैं लेकिन जब भी स्त्री-पुरुष संबंधों की बात आती है महिलाएं कमजोर भावनात्मक पक्ष का लाभ ले जाती हैं। इनकी शिकायत होती है कि खुली मानसिकता के साथ आज लघु उद्योग से लेकर बड़े औद्योगिक जगत में भी सुबह 8 से रात के 7 और दोपहर के 12 से रात के 2 बजे तक भी काम करने में नहीं हिचकिचाने वाली, खुद को पुरुष के सहारे के बिना संबल मानने वाली, सेक्स और प्रेम संबंधों में बेझिझक बात करने वाली, अपना हर फैसला आत्मविश्वास के साथ करने वाली महिला अगर हर फैसले में खुद को स्वावलंबी साबित करती है, पुरुषों के समकक्ष मानती है तो ऐसे किसी भावनात्मक पक्ष में कमजोर और बहकाए जाने की बात कर अपने स्व-विवेक को कमतर आंके जाने की पहल खुद ही क्यों करती है? इनकी नजर में सामाजिक मान्यताओं का फायदा अपने पक्ष में करने और पुरुषों पर दबाव प्रेषित करने का यह उनका तरीका होता है जिसे दिल्ली कोर्ट ने समझा और फैसला दिया है।


दूसरी ओर महिला सशक्तिकरण के पुरोधा इसके विरोध में यह सवाल कर रहे हैं कि महिलाएं भले ही सामाजिक रूप से खुद को सशक्त बनाने की कोशिश में जुटी हैं और हर कदम वे अधिकांशत: आज पुरुषों के समकक्ष चलने भी लगी हैं लेकिन प्राकृतिक रूप से (स्वभावतः) महिलाएं पुरुषों की तुलना में भावुक होती हैं। महिलाएं आज चांद पर ही क्यों न पहुंच गई हों लेकिन कहीं न कहीं हमारा समाज आज भी पुरुष सत्तात्मक है और महिलाएं उन्हें अपना सुरक्षा कवच मानती हैं। अत: कार्यप्रणाली में स्व-विवेकी होने के बावजूद जब भी पुरुष की बात आती है वह भावनात्मक कमजोरी की चपेट में आ जाती हैं। पुरुष उसकी इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए उससे शादी का वायदा कर उसका शारीरिक शोषण करते हैं। इसलिए कोर्ट का फैसला पुरुषवादी इस रवैये को बल देगा और महिलाओं का शोषण करेगा।


उपरोक्त मुद्दे के दोनों पक्षों पर गौर करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने आते हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना नितांत आवश्यक है, जैसे:

1. क्या कोर्ट का यह फैसला आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य के अनुकूल है या यह स्त्री-हितों को खतरा पैदा करेगा?

2. क्या शादी पूर्व यौन सबंध बदलते सामाजिक परिदृश्य की मांग हैं?

3. क्या शादी पूर्व यौन संबंधों में पुरुष द्वारा स्त्री को भरमाए जाने की आशंका हो सकती है?

4. आज की सशक्त महिला को भावनात्मक कमजोरी का आधार देकर पुरुष द्वारा भरमाए जाने का कथन कितना मान्य हो सकता है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


विवाह पूर्व यौन संबंध में स्त्री विवेक – क्या है आपकी राय?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हैं तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक ‘कोर्ट का फैसला’ है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व कोर्ट का फैसला – Jagran Junction Forum लिख कर जारी कर सकते हैं।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार

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